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यह एक अजीब संयोग है कि हमारा देश जो दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को अपने में समेटने का दम भरता है वहां लोकतंत्र की आड़ में कुछ भी किया जा सकता है। दुख इस बात का है कि यह सब राष्ट्रपति के कंधों पर सियासत रखकर किया जाता है। अचानक भारत में क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले और दुनिया के सबसे बड़े रिकार्डधारी सचिन तेंदुलकर को राज्यसभा में लाए जाने का ऐलान कर दिया जाता है और अगले ही पल 1980 के दशक की जबर्दस्त चर्चित अभिनेत्री रेखा को राज्यसभा में लाए जाने के लिए राष्ट्रपति की ओर से नामांकित कर दिए जाने की खबर आती है। परिणाम यह निकलता है कि देश में एक बहस छिड़ जाती है। लोग कहते हैं कि राज्यसभा जो लोकतंत्र की सबसे ऊंची सीढ़ी है वहां सियासत की कोई पिच नहीं होनी चाहिए, सियासत का कोई मंच नहीं होना चाहिए, वहां जब चाहें सचिन से बल्लेबाजी करवा ली या फिर रेखा से अभिनय करवा लिया।
पूरे देश में हर राजनेता इस गर्मागर्म मामले पर सियासत जरूर कर रहा है। ऐसा लगता है कि हमारे देश में किस तरह हर मुद्दे को राजनीतिक रंग देने में महारथ हासिल कर ली गई है। किसी शख्सियत को राष्ट्रपति के कोटे से राज्यसभा में भेजना सरकार का विशेषाधिकार है। सचिन के मामले में इस विशेषाधिकार पर सवाल उठाने का इसलिए कोई मतलब नहीं कि वह हर लिहाज से राज्यसभा का सदस्य मनोनीत होने के पात्र हैं। आखिर राज्ससभा सदस्य के रूप में सचिन को मनोनीत करने के सरकार के फैसले पर अगर-मगर करने वाले यह कैसे भूल सकते हैं कि उन्हें भारत रत्न देने की मांग हो रही थी? सरकार के इस फैसले पर असहमति और आश्चर्य के सुर इसलिए निरर्थक हैं, क्योंकि सचिन राज्यसभा का सदस्य बनने को सहर्ष तैयार है जिस तरह यह कहा गया कि यदि सचिन को राज्यसभा भेजने का फैसला लिया गया तो सौरव गांगुली की अनदेखी क्यों की गई उससे यही लगता है कि अनावश्यक विवाद पैदा किया गया? कुछ ऐसा ही मकसद इस आपत्ति में भी नजर आता है कि क्रिकेट को संरक्षण देने के फेर में अन्य खेलों की उपेक्षा न हो।
हम पूछना चाहते हैं कि क्या यह विचित्र नहीं कि पहली बार एक क्रिकेटर को राज्यसभा में मनोनीत किए जाते ही इस तरह के सवाल उठाए जाने लगे? क्या कोई इससे इन्कार कर सकता है कि अन्य खेलों के मुकाबले क्रिकेट ने भारतीय जनता को रोमांचित और उल्लासित होने के सबसे अधिक मौके दिए हैं? क्रिकेट हमारे देश में एक ऐसा खेल बन गया है, जो सारे देश को एक सूत्र में भी जोड़ता है। इस तरह के मामलों में छिद्रान्वेषण करने का कहीं कोई औचित्य नहीं।
हम कहना चाहते हैं कि सरकार ने चाहे जिस इरादे से सचिन को राज्यसभा भेजने का फैसला किया, लेकिन इस फैसले का स्वागत किया जाना चाहिए। इस फैसले के संदर्भ में इस तरह के कयास लगाना निरर्थक हैं कि सरकार सचिन के जरिए राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश कर रही है अथवा भविष्य में ऐसा करेगी। यह बहुत कुछ सचिन पर निर्भर करेगा कि वह राज्यसभा सदस्य के रूप में सरकार का नेतृत्व करने वाले दल अर्थात कांग्रेस के साथ अपने जुड़ाव का प्रदर्शन करते हैं या नहीं। यदि वह कांग्रेस के साथ जुड़ाव का प्रदर्शन करते हैं तो भले ही यह कुछ लोगों को ठीक न लगे, लेकिन इसका फैसला करने का अधिकार तो उन्हें ही दिया जाना चाहिए। पता नहीं क्यों लोग अभी से इस बारे में सचिन को सलाह देने में लग गए हैं? नि:संदेह सचिन राष्ट्रीय नायक सरीखे हैं और उनके प्रशंसकों की कमी नहीं, लेकिन इसका यह भी अर्थ नहीं कि हर कोई उन्हें हर मामले में सलाह देना जरूरी समझे। इसमें दो राय नहीं कि राष्ट्रपति के कोटे से राज्यसभा में मनोनीत होने वाले राज्यसभा सदस्यों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे दलगत राजनीति से दूर रहें, लेकिन यह कोई नियम भी नहीं कि ऐसा ही किया जाए। कोई नहीं जानता कि दल विशेष के प्रति अपनी निष्ठा प्रदर्शित करने के मामले में सचिन क्या करेंगे, लेकिन यदि कांग्रेस ऐसा कुछ सोच रही है कि वह सचिन को राज्यसभा में भेजकर कुछ राजनीतिक लाभ हासिल कर सकती है तो यह एक दिवास्वप्न ही है।
सब लोग अपना-अपना मंतव्य जाहिर कर रहे हैं और दिलचस्प बातें भी उठने लगी हैं। कहा जा रहा है कि सचिन को राज्यसभा भेजने के बजाय भारत रत्न दिया जाना चाहिए। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने ट्विटर पर लिखा, मुझे लगता है कि उन्हें राज्यसभा की सदस्यता के बजाय भारत रत्न दिया जाना चाहिए था। केंद्रीय मंत्री विलासराव देशमुख का कहना था कि मुझे पूरी उम्मीद है कि सचिन को भारत रत्न जरूर मिलेगा। शिवसेना सांसद संजय राउत ने सचिन को भारत रत्न देने की वकालत करते हुए उन्हें राज्यसभा में भेजने की टाइमिंग पर सवाल खड़े किए। उनका कहना था कि सचिन अभी खेल रहे हैं, रिटायर नहीं हुए हैं। ऐसे में उनका नाम भारत रत्न के लिए आगे क्यों नहीं किया जा रहा है? कांग्रेस सचिन का इस्तेमाल मौजूदा समस्याओं से ध्यान हटाने के लिए कर रही है। कांग्रेसी सांसद सत्यव्रत चतुर्वेदी ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि कोई एक व्यक्ति न तो किसी पार्टी या सरकार को बना सकता है न ही उसके भाग्य को नष्टï कर सकता है। राजठाकरे ने कहा कि नामिनेशन स्वीकार करने का मतलब यह नहीं माना जाना चाहिए कि सचिन कांग्रेस में शामिल होने जा रहे हैं।
कमेंटेटर हर्ष भोगले का कहना था कि सक्रिय सांसद के रूप में सचिन को देखने की बात है तो उनके पास इसका अनुभव नहीं है। सचिन की लाइफ में बस क्रिकेट है।
क्रिकेट का जैंटलमैन खेल जिस तरह सियासत की भेंट चढ़ा है हम कहना चाहते हैं कि इसी सियासत की पिच पर हमारे देश में बहुत बड़ी-बड़ी हस्तियां राज्यसभा पहुंच चुकी हैं जिनमें से बहुचर्चित सुनील दत्त रहे हैं। इस कड़ी में दारा सिंह, हेमामालिनी, शबाना आजमी, वैजयंती माला, नर्गिस दत्त, पं. रविशंकर, एमएफ हुसैन, मैथलीशरण गुप्त, खुशवंत सिंह, डा. राजारमन्ना, आरके नारायणन, पृथ्वी राज कपूर, डा. मैलकम इत्यादि भी राज्यसभा में लिए जा चुके हैं, लेकिन पहली बार अब सदस्यों को चुने जाने को लेकर जबर्दस्त बहस छिड़ी है तो इसके पीछे कारण यह है कि इस बार राजनीति खुले तौर पर हो रही है क्योंकि जया बच्चन को अगर सपा ने मौका दिया है तो फिर अमिताभ बच्चन का काउंटर करने के लिए यह दाव खेला है। हालांकि योगगुरु बाबा रामदेव ने भी बढ़-चढ़कर अपनी टिप्पणी रखी है, परन्तु हम स्पष्टï कर देना चाहते हैं कि भविष्य में राजनीति के कर्ताधर्ताओं को सोच-समझकर फैसले लेने होंगे, क्योंकि आज की तारीख में देश का हर नागरिक विशेषकर युवा वर्ग सब कुछ समझता है और अगर आप देश को लोकतंत्र में एक शानदार उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करना चाहते हैं तो फिर सियासत छोडऩी ही होगी। |