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आतंकवाद को लेकर जितना हो-हल्ला हमारे यहां मचता आ रहा है, यकीनन यह हमारी व्यवस्था पर एक करारा तमाचा है। दुनिया के नक्शे पर आतंकवाद की सबसे ज्यादा मार झेलने वाले भारत में आतंकवाद और आतंकवादियों पर अब तक काबू नहीं पाया, तो कसूर किसका है? दुख इस बात का है कि एक के बाद एक आतंकी हमले हुए, लेकिन केंद्र सरकार ने सबक नहीं सीखा। हाल ही में एक बार फिर मीडिया में सुर्खियों के रूप में पाकिस्तान के आतंकी कारनामे उभरे। सन् 1965 और 1971 में भारत के हाथों युद्घ में भारी शिकस्त के बाद पाकिस्तान ने आतंकवाद का सहारा लिया। रह-रहकर पाकिस्तान ने कभी जम्मू-कश्मीर के रास्ते से, तो कभी नेपाल मार्ग से, तो कभी पंजाब बार्डर से आतंकवादियों को हमारी जमीं पर खूनखराबे के लिए भेजा। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक भारत की खूबसूरती का जिक्र कम और आतंकवाद का उल्लेख ज्यादा होता है।
देश के किस कोने में लोग आतंकवाद से रूबरू नहीं हुए और व्यवस्था के नाम पर, सुरक्षा के नाम पर हमारी सरकार ने क्या किया? लालकिला अटैक, संसद पर हमला और मुंबई अटैक के अलावा हजारों बम धमाके देश भर में अलग-अलग घटनाओं के रूप में देशवासियों ने झेले हैं। अभी चार दिन पहले अबू जिंदाल, अबू हमजा, जबियुद्दीन, रियासत अली, जियाकत अली जैसे 26 नामों वाले एक आतंकवादी की गिरफ्तारी को लेकर अगर केंद्र सरकार के गृहमंत्री पी. चिदंबरम अपनी पीठ थपथपा सकते हैं, तो यह एक बेहद शर्मनाक स्थिति है कि इस आतंकवादी को हमने सऊदी अरब से प्रत्यर्पण संधि के तहत प्राप्त किया है। जिस अजमल कसाब को भारत सरकार ने मुंबई में कैदी के रूप में सहेजकर रखा है, उसके बारे में देश का बच्चा-बच्चा जानता है कि वह मुंबई अटैक का एकमात्र हमलावर जीवित आतंकी है। अब उसका यह साथी भी हत्थे चढ़ गया है। विभिन्न बम विस्फोटों में उसके लिप्त होने की खबरें आ रही हैं। सवाल पैदा होता है कि हमारी सरजमीं पर लोगों के खून की होली खेलने वाला अजमल कसाब अब तक सुरक्षित है तो क्यों? अगर अमरीका में किसी बम विस्फोट में लिप्त आतंकवादी वहां की पुलिस के हत्थे चढ़ा होता तो क्या उसे जेलों में महफूज रख लिया जाता।
हमारी सरकार ने वोटों की राजनीति में सारी व्यवस्था को खुद ही पांव तले रौंद रखा है। आतंकवादियों को पता है कि हम जब चाहें, जहां चाहें, जिस बार्डर से भारत में आ सकते हैं और कुछ भी कर सकते हैं, तो फिर उनका हौसला इसलिए बढ़ रहा है कि भारत सरकार न पहले कुछ करती थी, न अब कुछ कर रही है। यह जानते हुए भी कि पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) में आतंकी ट्रेनिंग शिविर आईएसआई की शह पर पाकिस्तान के फौजी कमांडर चला रहे हैं और मुंबई हमले को अंजाम देने वाले आतंकियों ने भी इसी पाक अधिकृत कश्मीर में ट्रेनिंग ली थी। अब अगर सरकार इस सफलता से खुद को कूटनीतिक मोर्चे पर नंबर वन मानती है, तो यह उसकी गलतफहमी है। पी. चिदम्बरम एक बेहद कमजोर गृहमंत्री सिद्घ हुए हैं। कहां तो सरदार पटेल जैसे उदाहरणीय गृहमंत्री थे और अब कहां चिदंबरम जैसे गृहमंत्री हैं, जिनकी आस्तीन भ्रष्टाचार में डूबी हुई है। दुख इस बात का है कि उधर सरकार चुप है और इधर गृहमंत्री सुरक्षा नीति को लेकर एकदम चुप हैं। कई बार अपने आप से ही पूछता हूं कि यह देश चल कैसे रहा है? न कोई सुरक्षा, न कोई नीति। वाह! चिदंबरम और वाह री सरकार!
हम लोग यह चाहते हैं कि अब इन आतंकवादियों का हश्र सारे देश के सामने एक उदाहरण के साथ प्रस्तुत किया जाना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा। यह ठीक है कि अबू जिंदाल की गिरफ्तारी से लश्कर-ए-तैयबा और इंडियन मुजाहिद्दीन के नेटवर्क को ध्वस्त करने में सफलता मिल सकती है, परंतु हमने व्यावहारिक रूप से तो कुछ नहीं किया, जो कि बेहद चिंतनीय पहलू है। चौंकाने वाली एक और बात यह भी है कि लश्कर का मुखिया हाफिज मोहम्मद सईद आज भी पाकिस्तानी फौज को और सरकार को जब चाहे दबाता है और जो काम चाहे करवाता है। उसकी अमरीका ने परवाह नहीं की और उसकी धमकियों को भी अमरीका ने नेस्तनाबूद कर डाला है। भारत अगर चाहता तो अमरीका की तरह पाकिस्तान पर धाक जमा सकता था। वह जिंदाल, अफजल गुरु और अजमल कसाब जैसों को जब जेलों में सुरक्षित रखेगा, तो फिर सईद जैसे आतंकी कमांडर भारत के लिए सिरदर्द ही बनेंगे।
देशवासी न्याय चाहते हैं, लेकिन विशेष अदालत के निर्देश के बावजूद अफजल गुरु और अजमल कसाब को अभी तक फांसी नहीं दी गई, बल्कि राजनीतिक रूप से फाइलें राष्ट्रपति भवन तक अपना असर इस कदर दिखा रही हैं कि संसद और कैबिनेट में बैठे लोग एकदम लुंजपुंज दिखाई दे रहे हैं। इस मामले में मैं भाजपा की प्रशंसा करना चाहूंगा कि उसने इन आतंकियों के खिलाफ विशेष अदालत का फैसला लागू किए जाने की मांग तो बुंलद की है। उधर आज की तारीख में सुना है कि सईद पाक सेना के रवैये से नाखुश है। उसका मानना है कि सेना के सामरिक हितों के लिए उसने किसी भी अन्य आतंकी संगठन से कहीं अधिक काम किया है, लेकिन उसे काम के अनुरूप पारितोषिक नहीं मिला है। उसके समूह ने न केवल कश्मीर में जिहादियों को प्रशिक्षित किया है, बल्कि भारत में कुछ भयावह आतंकी हमलों को अंजाम देने में भी अहम भूमिका निभाई है। इसके अलावा लश्कर-ए-तैयबा, तालिबान और अन्य आतंकी समूहों को प्रशिक्षण भी देता रहा है।
पाक सेना से सईद की सबसे बड़ी शिकायत यह है कि अंतर्राष्ट्रीय दबाव में आकर वह उसे फिलहाल गतिविधियां सीमित रखने को कह रही है। इसके जवाब में सईद ने न केवल भारत, बल्कि अमरीका के खिलाफ भी जिहाद का आह्वान किया है। अप्रैल 2012 में सईद ने अमरीका को उसे गिरफ्तार करने की खुली चुनौती दे डाली। एक बड़ी सभा को संबोधित करते हुए सईद ने कहा कि अमरीका मेरे नाम से खौफ खाता है। अमरीका को पाकिस्तान और अफगानिस्तान को शांति से जीने देना चाहिए और तब हम उन पर गोली दागने के बजाय उन्हें इस्लाम कबूलने का न्यौता देंगे...।
सईद ने अब 40 आतंकी गुटों के समूह दिफा-ए-पाकिस्तान की कमान संभाल ली है। वह देशभर में सभाएं आयोजित कर रहा है तथा भारत और अमरीका के खिलाफ जहर उगलने के साथ-साथ वाशिंगटन के प्रति नरम रुख अपनाने के कारण इस्लामाबाद को भी निशाने पर ले रहा है। उसने नाटो की सप्लाई लाइन फिर से शुरू करने के पाक सरकार के फैसले का भी विरोध किया है। इस प्रकार उसने पाकिस्तान के सैन्य और असैन्य नेतृत्व के सही राजनीतिक कदम का विरोध किया है। नेशनल एसेंबली को लिखे खुले पत्र में सईद ने आरोप लगाया है कि अमरीका ने पाकिस्तान के साथ अपने किसी भी समझौते का सम्मान नहीं किया है। खैर, हमने पाकिस्तान का उदाहरण सईद के मामले में इसलिए दिया है कि आतंकवादी परंपरा को वहां के सरगना बढ़ावा देते हैं, लेकिन हमारे यहां आतंकवादियों को पालने-पोसने और सुरक्षित रखने की परंपरा का निर्वाह गृहमंत्री पी. चिदंबरम की शह पर हो रहा है तो प्रधानमंत्री इस मामले पर चुप क्यों हैं? आज नक्सलवाद इसी आतंकवाद के रास्ते पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र को अपनी लपेट में ले चुका है, तो इसके पीछे चिदंबरम की वे नीतियां हैं जो आतंकवादियों और नक्सलवादियों को रास आ रही हैं। वक्त आ गया है कि अब हमें तुरंत संभल जाना चाहिए। जिस मुंबई अटैक को लेकर देश के गृहमंत्री शिवराज पाटिल को हटा दिया गया, तो आज जो देश के गृहमंत्री हैं उनके शासन में आतंकवादियों को महफूज रखकर देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है, लेकिन चिदंबरम सुरक्षित हैं। कोई उन्हें हटाना नहीं चाहता। यह व्यवस्था बदलनी होगी। अमरीका से सीखना होगा। पाकिस्तानी आकाओं के इरादों को समझना होगा। आतंक का जवाब गोली ही है, तभी बात बनेगी। तभी आप आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई और कूटनीति में महारत हासिल कर सकते हैं। |