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हमारे देश में बड़े-बड़े नेता देश के लिए बहुत योगदान दे चुके हैं। आज हमारे देश का राजनीतिक हिसाब-किताब बदल चुका है। आज हमारा देश घोटालों का देश बन चुका है। दु:ख इस बात का है कि यह घोटाले भी बड़े-बड़े नेताओं ने ही किए हैं। अचानक देश के ईमानदार और अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री ने पिछले दिनों एक वक्तव्य दिया कि अगर मुझ पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप सिद्ध हो जाएंगे तो मैं राजनीति से संन्यास ले लूंगा। प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन ङ्क्षसह के कार्यकाल में जितने घोटाले हुए उनकी कालिख को यह देश कैसे साफ करेगा, यह विचारणीय प्रश्र है। बात आदर्श सोसाइटी घोटाला, टू-जी स्पैक्ट्रम घोटाला, कोयला आवंटन घोटाला या कामनवैल्थ खेल घोटाले की नहीं है बल्कि कत्र्तव्यप्रायणता, चरित्र और नैतिकता की है। मनमोहन सिंह ने राजनीति से संन्यास लेने संम्बधी बयान टीम अन्ना के आरोपों के सामने आने के बाद दिया। टीम अन्ना ने बाकायदा 14 केन्द्रीय मंत्रियों और प्रधानमंत्री के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगाकर पूरा चिठ्ठा सार्वजनिक किया था। जिसमें कोयला ब्लाक आवंटन में पीएम को सीधे-सीधे निशाने पर लिया गया। टीम अन्ना ने स्पष्ट किया कि कल तक अपने पीएम के बारे में कोई टिप्पणी नहीं की थी लेकिन अब सबूत मिल जाने के बाद ही उन्होंने घोटालों के पीछे पीएम के हाथ को उजागर किया है।
प्रिय पाठको! हमारा देश जिसे न्यायपालिका ही चला रही है, उसे न्याय के मंदिर में हर अपराधी बार-बार यही कहता है कि अगर मेरे खिलाफ आरोप सिद्ध हो जाए तो मैं सजा भुगतने को तैयार हूं। लेकिन समय आता है और उनके खिलाफ आरोप सिद्ध हो जाते हैं। इसके बाद उन्हें जेल का रास्ता दिखाया जाता है। इस प्रधानमंत्री ने कोयला आवंटन और स्पैक्ट्रम के मामले में बाकायदा सारी जानकारी अपने कैबिनेट सहयोगियों से ले रखी थी। आज तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए. राजा सलाखों के बाहर आ चुके हैं। और अब कोयला आवंटन में पीएम के चेहरे पर कालिख पुत चुकी है। केन्द्रीय सरकार अब बचाव पर उतर आई है। जिस व्यक्ति का घोटालों में हाथ अब सामने आ चुका है, वह पीएम हो या कोई और, उसे अब संन्यास लेने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए बल्कि कहा जाना चाहिए कि आपने आपराधिक कार्रवाई की है और आपको संन्यासी नहीं बनने दिया जाएगा बल्कि ऐसे व्यक्ति को सीधे जेल भेजना चाहिए। पूरा देश इस समय एकजुट हो जाए और प्रधानमंत्री को जवाब दे कि कोयला आवंटन में आप संलिप्त रहे हैं। बाकायदा अनियिमितताएं बरती गई हैं। कैग की रिपोर्ट के बाद सरकार कठघरे में है। हालांकि जांच सीबीआई के पास पहुंच चुकी है, परन्तु सब जानते हैं कि सीबीआई किसके अधीन है। सरकार अब जो कर रही वह दिखावे के लिए कर रही है। वह हर सूरत में अपने पीएम को बचाएगी।
बेहतर हो कि केन्द्र सरकार पहले यह तय कर ले कि कोयला ब्लाक आवंटन की प्रक्रिया और उस पर सामने आई कैग की रपट पर उसका दृष्टिकोण क्या है, क्योंकि हर दिन अलग तरह की प्रतिक्रिया से आम जनता को यही संदेश जा रहा है कि वस्तुस्थिति को छिपाने की कोशिश की जा रही है। विगत दिवस प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री वी. नारायणसामी ने जिस तरह पहले इस घोटाले में गडकरी के शामिल होने का आरोप लगाया और जिस तरह पहले इस घोटाले में गडकरी के शामिल होने का आरोप लगाया और फिर यह कहने लगे कि उन्होंने ऐसा कुछ कहा ही नहीं उससे तो केन्द्र सरकार के प्रति संदेह और बढ़ रहा है। बेहतर हो कि केन्द्र सरकार के नीति-नियता यह समझ लें कि नित नए बयान जारी करने से बात बनने वाली नहीं है।
हम इस मामले में टू-जी घोटाले को याद करना चाहते हैं कि किस प्रकार मनमोहन सिंह की सरकार ने गृहमंत्री पी. चिदम्बरम को बचाने की कोशिश की। वरना इस सरकार ने तो इस घोटाले के पीछे भी एनडीए सरकार के हाथ बता दिया। बाकायदा कहा गया कि यह कांड तो एनडीए की पहले आओ, पहले पाओ की नीति का परिणाम है और अब कोयला ब्लाक आवंटन के मामले में भी कुछ ऐसे ही तर्क दिए जा रहे हैं। हो सकता है कि इन तर्कों में कुछ दम हो, लेकिन यदि राजग शासन की नीति सही नहीं थी तो संप्रग ने उसे बदलने की जरूरत क्यों नहीं समझी? यह किसी निष्पक्ष जांच से ही पता चलेगा कि कोयला ब्लाक आवंटन में वास्तव में कोई घोटाला हुआ है या नहीं, लेकिन इतना तय है कि यह मामला केन्द्र सरकार की साख के लिए एक बड़ा खतरा बन गया है। इस प्रकरण में खुद प्रधानमंत्री भी सवालों के घेरे में हैं, क्योंकि बड़े पैमाने पर कोयला ब्लाकों का आवंटन तब हुआ जब कोयला बड़े पैमाने पर कोयला ब्लाकों का आवंयन तब हुआ जब कोयला मंत्रालय खुद उनके अधीन था। इस मामले की सीबीआई जांच का नतीजा कुछ भी हो, आशंका इस बात की है कि जिस तरह 2-जी घोटाले के बाद देश का सबसे तेजी से बढ़ता टेलीकाम उद्योग मुश्किलों में घिर गया वैसी ही दशा कोयला क्षेत्र और उस पर आधारित उद्योगों की भी न हो। सच तो यह है कि इस आशंका ने सिर उठश लिया है। इस संदर्भ में इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि पिछले कई महीनों से कोयले की आपूर्ति सही तरह से नहीं हो पा रही है और इसके चलते कोयला आधारित बिजली संयंत्रों के साथ-साथ अन्य उद्योग भी प्रभावित हो रहे हैं।
इससे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण और कुछ नहीं हो सकता कि विभिन्न क्षेत्रों में अनियमितताओं के चलते एक ओर जहां अर्थव्यवस्था को तगड़ी चोट पहुंच रही है वहीं दूसरी ओर घपले-घोटाले के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई होती नहीं दिख रही है। इन्कार करना अपराधी की फितरत है परन्तु मनमोहन ङ्क्षसह ने तो राजनीति संन्यास लेने की सशर्त बात जांच से पहले ही करके सिद्ध कर दिया है कि दाल में कुछ काला है और चोर की दाढ़ी में तिनका।
दु:ख इस बात का है कि यह सरकार घोटालों पर केवल लीपापोती कर रही है। पैट्रोल के कीमतें और अन्य खाद्य पदार्थ तथा कपड़ा, दूध के मूल्य आसमान पर पहुंच चुके हैं। आटो भाड़ा हो या विमान का किराया सब तरफ आग लगी हुई है। बेचारा आम आदमी जाए तो जाए कहां। अर्थव्यवस्था तो पूरी तरह से रसातल में जा चुकी है और इस पर शोशा यह है कि देश का प्रधानमंत्री अर्थशास्त्री है। अब केन्द्र सरकार के पास दो वर्ष से भी कम समय बचा है और अर्थव्यवस्था की चुनौतियां बढ़ती ही जा रही हैं। मौजूदा समय देश के आर्थिक-राजनीतिक हालात ऐसे हैं कि संप्रग सरकार अगले आम चुनाव में सत्ता विरोधी लहर से शायद ही बच सके। संप्रग के सहयोगी दलों को यह समझ लेना चाहिए कि कड़े आर्थिक निर्णयों के बिना न तो अर्थव्यवस्था की हालत सुधरने वाली है और न ही उनकी चुनौती नैया पार होने वाली है। यह समय भारी-भरकम सब्सिडी जारी रखने अथवा मनरेगा जैसी लोक-लुभावन योजनाओं के जरिये आम जनता को तात्कालिक संतुष्टि प्रधान करने को नहीं, बल्कि उत्पादन और निवेश बढ़ाने का है। ऐसी दूरगामी सोच रखकर ही अर्थव्यवस्था को वापस पटरी पर लाया जा सकता है। विपक्षी दलों को भी आर्थिक समस्याओं पर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने से बचना चाहिए। पैट्रोल के मूल्यों में वृद्धि के खिलाफ राजग और अन्य दलों ने भारत बंद का जो आयोजन किया उसकी कहीं कोई आवश्यकता नहीं थी। आवश्यकता इस बात की है कि राजनीतिक दल पैट्रोलियम पदार्थों के मूल्यों को तर्कसंगत बनाने के संदर्भ में आम सहमति से किसी नतीजे पर पहुंचें। इसी तरह यदि संप्रग सरकार अपनी निर्णयहीनता से बाहर निकलने की स्थिति में नहीं तो फिर उसके लिए बेहतर यही होगा कि वह मध्यावधि चुनावों कासामना करे। मध्यावधि चुनाव एक महंगा विकल्प अवश्य है, लेकिन यह भी सही है कि संप्रग सरकार की अकर्मण्यता के कारण यह आशंका गहराने लगी है कि कहीं भारतीय अर्थव्यवस्था ऐसे दलदल में न फंस जाए जिससे निकलने में उसे बरसों लग जाएं।
हम भी अर्थव्यवस्था के मामले से बाहर आकर एक बार फिर घोटालों पर केन्द्रित करते हुए पूछना चाहते हैं कि यह कैसे सम्भव है कि कोयला आवंटन के मामले पर प्रधानमंत्री को न पता हो। खुद प्रधानमंत्री ने इस पर हस्ताक्षर किए हैं तो अब जब सफाई पीएमओ खुद दे रहा हो तो समझ लो की घोटाला तो हुआ है। और अब देश को बचाना है, घोटालों की कालिख को साफ करना है तो प्रधानमंत्री को अपना चेहरा पाक-साफ साबित करना होगा और उन्हें जांच का सामना करना होगा। उनके खिलाफ जांच आयोग बैठाया जाए, किसी भी कीमत पर उन्हें संन्यासी बनने की इजाजत न दी जाए बल्कि इस अपराधिक घोटाले के लिए बाकायदा एक आम अपराधी की तरह उनके खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए। अब सवाल पीएम के संन्यासी बनने का नहीं बल्कि कार्रवाई का सामना करने का है। जो 'अपराध' उन्होंने किया है अब उसकी सजा उन्हें मिलनी चाहिए, यही देश और समय की मांग है। अब पुष्टि हो चुकी है कि हमारे बड़े-बड़े नेता भ्रष्टाचार भी पूरी ईमानदारी के साथ करते हैं। कत्ल करते हैं और छींटे भी नहीं पडऩे देते। |