विशेष लेख
Date : 07-August-2012
अन्ना की अधूरी क्रांति...
आदित्य चोपड़ा
देश यह सोच रहा था कि टीम अन्ना देश में व्याप्त भ्रष्टाचार को जड़-मूल से खत्म करने के लिए अपने सशक्त क्रंाति के माध्यम से सत्ता की जड़ें हिला देगी लेकिन समाजसेवी गांधीवादी अन्ना हजारे के नेतृत्व में चलाया जा रहा आंदोलन राह से भटक गया। कभी जेपी ने सम्पूर्ण व्यवस्था बदलने का आह्वïान किया था और उनका आह्वान काफी हद तक सार्थक भी रहा क्योंकि नागरिकों के मौलिक अधिकार छीनने और आपातकाल लगाने वाली श्रीमती इंदिरा गांधी को सत्ता से उखाड़ फैंका था। अफसोस जेपी की सम्पूर्ण क्रांति भी अधूरी रही। उनके साथ जितने भी लोग चले थे वे कांग्रेस की कोख से निकले थे। सत्ता में आते ही कुर्सी मोह के कारण वे अपने मकसद से भटक गए थे। यहां तो अन्ना टीम आंदोलन के दौरान ही भटक गई।
मनमोहन सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ टीम अन्ना के सदस्य जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठ गए थे। वे मजबूत लोकपाल के साथ एक नई मांग जोड़कर केन्द्र सरकार के पन्द्रह मंत्रियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच की मांग पर भी जोर दे रहे थे। अन्ना हजारे भी अनशन पर बैठ गए। इस बार आंदोलन स्थल पर समर्थकों की पहले जैसी भीड़ नहीं दिखी। अन्ना को उम्मीद है कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध आक्रोश प्रकट करने के लिए जन समुदाय फिर उमड़ेगा। आने वाले दिनों में देखना होगा कि ऐसा होता है अथवा नहीं। अन्ना टीम किस तरह ठोस सबूतों के बिना राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री पर निशाना साधकर गम्भीर आक्षेप लगा रही है, उससे उसके इरादों पर संदेह होना स्वाभाविक है। टीम अन्ना का एक सदस्य राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को भ्रष्ट कहता है तो अन्ना हजारे उन्हें ईमानदार बताते हैं। जंतर-मंतर के मंच पर अन्ना और रामदेव गले मिलते हैं लेकिन अगले ही दिन दोनों पक्षों में विवाद हो जाता है। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी से मुलाकात को लेकर टीम अन्ना रामदेव से नाराज हो जाती है। इस स्थिति को विरोधाभासी नहीं तो और क्या कहा जाएगा? इससे टीम अन्ना के प्रति जनता में गलत संदेश जाएगा। अन्ना ने जिन उद्देश्यों को लेकर आंदोलन शुरू किया है, उससे राजनीति में व्याप्त भ्रष्टाचार कम होगा लेकिन यह चंद दिनों में सम्भव नहीं होगा।
अन्ना के अनशन शुरू करने के बाद भीड़ जरूर दिखाई दी। इसका अर्थ यही था कि अन्ना का सम्मान देशवासी करते हैं लेकिन उनकी टीम अभी तक लोगों के दिल में जगह नहीं बना सकी। अंतत: जब सरकार और विपक्षी दलों ने भी कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई तो अन्ना टीम को मुंह दिखाने के लिए अनशन खत्म करना पड़ा और राजनीतिक दल बनाकर संसद में पहुंचने की घोषणा करनी पड़ी। इससे अन्ना टीम की स्थिति हास्यास्पद बन गई।
मुझे शक है कि जन्तर-मन्तर पर सुविधानुसार कभी भारत माता की जय और कभी सरदार भगत सिंह से लेकर महात्मा गांधी की जय बोलने वाले लोगों को भारतीय संविधान या इसके तहत चलने वाली भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था के बारे में कोई ज्ञान है। ये लोग भ्रष्टाचार को ऐसे ले रहे हैं जैसे आग लगने पर कोई आग बुझाने वाली दमकल गाड़ी हो। इसमें उनका कोई दोष नहीं है क्योंकि उनका बौद्धिक स्तर और सोच व समस्या से निपटने का नजरिया इस बुराई को केवल कानून व्यवस्था की नजर से देखता है, मगर हकीकत में यह समस्या कानून-व्यवस्था की नहीं है यह राजनीतिक संस्कृति की है। अत: इसे दुरुस्त करने की जिम्मेदारी भी राजनीतिक तन्त्र की है और ऐसा केवल संसद के माध्यम से ही हो सकता है। संसद को भारत के संविधान की पवित्रता और लोकतन्त्र में लोगों को मिले सर्वोच्च अधिकार का सम्मान करते हुए ही यह काम करना होगा और वह अधिकार है अपनी मनपसन्द की सरकार चुनना जिसका मुखिया प्रधानमन्त्री होता है और वह संसद के प्रति जवाबदेह होता है। उसकी जवाबदेही न तो संसद से इतर किसी अन्य संस्था या व्यक्ति के प्रति तय की जा सकती है। अत: लोकपाल के अधिकार संसद की सर्वोच्चता के दायरे में ही तय करने होंगे और इतनी बुद्धि सड़क पर बैठे चन्द आन्दोलनकारियों के पास किसी कीमत पर नहीं हो सकती क्योंकि उनकी अपनी जवाबदेही केवल अपने प्रति ही है जबकि संसद की जवाबदेही पूरे देश के करोड़ों लोगों के प्रति है। उनके अधिकारों की रक्षा करने का पहला दायित्व संसद का ही बनता है।
बेशक पिछले चालीस सालों से लोकपाल का मामला धक्के खा रहा है। इसकी वजह यही है कि संविधान में जनता की चुनी हुई सरकारों को ही सर्वोच्च अधिकार प्रदान करते हुए सरकार चलाने वालों के भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना है। इसके लिए हम किसी भी कीमत पर आम आदमी को मिले अधिकार की कुर्बानी नहीं दे सकते क्योंकि पांच साल बाद या बीच में ही उसे किसी भी सरकार को हटा कर अपनी मनमर्जी की सरकार बनाने का अधिकार मिला हुआ है। जिस दिन किसी भी कानून के माध्यम से इस अधिकार को काटा-छांटा या सीमित करने का प्रयास किया गया उसी दिन इस देश में तानाशाही का बीज रोप दिया जायेगा। लोकपाल विधेयक फिलहाल प्रवर समिति के विचाराधीन है। उसे इस पर विस्तार से विचार करके फैसला करने का पूरा हक है। हमें कोई हक नहीं है कि हम संसदीय प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश करें। संसद को लोकपाल विधेयक तैयार करने के लिए मजबूर किया जा सकता था, वह काम हो चुका है। अब संसद को अपना काम करने देना चाहिए और विधेयक को जन लोकपाल या खाली लोकपाल कह कर इस देश की जनता और संसद का अपमान नहीं करना चाहिए।
मैं व्यक्तिगत तौर पर अन्ना टीम के राजनीतिक दल बनाने का विरोधी नहीं हूं क्योंकि यहां किसी को भी राजनीतिक दल बनाने का अधिकार है। अन्ना हजारे ने खुद कोई पद नहीं लेने और भ्रष्टाचार के खिलाफ जनजागरण करने की घोषणा की है लेकिन उन्हें यह भी देखना होगा कि चुनौतियों का सामना करने के लिए उनके पास प्रभावी नीति हो और लाखों समर्पित कार्यकर्ताओं के अलावा योग्य नेतृत्व हो।
राजनीति काजल की कोठरी है इसमें प्रवेश करने वाले हर आदमी के सफेद कुर्ते पर काला धब्बा लगता ही है। इसलिए राजनीतिक दल बनाना और चुनाव लडऩा वर्तमान राजनीति में आसान नहीं है। बेहतर होगा अन्ना और उनकी टीम भ्रष्टाचार के खिलाफ जनजागरण करे और देश को वोट की शक्ति से भ्रष्टï तंत्र को उखाड़ फैंकने के लिए तैयार करे। आरोप-प्रत्यारोपों की राजनीति में न पड़ कर उन्हें देश में राष्ट्रवाद की अलख जगानी चाहिए। उन्हें यह भी समझना होगा कि केवल सभी को भ्रष्टाचारी बताने से काम नहीं बनने वाला।
अन्ना टीम भंग कर दी गई है। मुख्य बात यह है कि क्या अन्ना पूरे देश को इन सवालों का जवाब देंगे कि-
1. अन्ना चुनाव नहीं लड़ेंगे लेकिन चुनाव बाद वे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की तरह यह तो नहीं कहेंगे कि मैं तो ईमानदार हूं मेरी टीम भ्रष्ट है तो मैं क्या कंरू।
2. अन्ना देशवासियों से यह वायदा करें कि चुनावों बाद वे किसी सरकार में शरीक होने के लिए गठबंधन नहीं करेंगे। किया तो मौजूदा एनडीए और यूपीए से उनके गठबंधन में अन्तर क्या होगा?
3. अन्ना को यह वायदा भी करना चाहिए कि अन्य दलों की तरह उनकी टीम की पार्टी औद्योगिक घरानों से चन्दा नहीं लेंगे?
4. अन्ना को वायदा करना चाहिए कि उनकी टीम सत्ता के लिए दल बदल नहीं करेगी?
5. अन्ना को यह भी वायदा करना चाहिए कि वे उसी पार्टी को बाहर से समर्थन देंगे जो उनका जन लोकपाल लाएंगे।
6. भ्रष्टाचार के आरोपों, आपराधिक पृष्ठभूमि वाले जिस दल के साथ होंगे उसका समर्थन अन्ना नहीं करेंगे?
7. अन्ना जिन उम्मीदवारों का चुनाव में समर्थन करेंगे उनके चुनाव खर्चे की पाई-पाई का हिसाब देशवासियों को दिलाएंगे।
 
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