विशेष लेख
Date : 08-May-2012
बढ़े घोटाले और भ्रष्टाचार, चुप क्यों है सरकार
आदित्य चोपड़ा
यह एक अजीब इत्तेफाक है कि यूपीए सरकार सत्ता में अपनी दूसरी पारी के दौरान कुछ खास नहीं कर रही। पिछले आठ सालों के दौरान सत्ता पर रहते हुए यूपीए ने देश के कुछ खास नहीं किया। अगर हम सत्ता की दूसरी पारी के तीन वर्षों को गिनें तो हाथ में निराशा ही लगती है। श्री पी. चिदम्बरम आज गृहमंत्री हैं तो देश की सुरक्षा दाव पर है और इससे पहले जब वे वित्त मंत्री थे तो उन्होंने देश की अर्थव्यवस्था और करैंसी को लुटाने का करवाया। एक के बाद एक घोटाले हुए, यहां तक की उनका पुत्र कार्ति चिदम्बरम तक अनेक घोटालों में लिप्त है। अगर सुरक्षा की बात करें तो देश के सेना अध्यक्ष जनरल वी.के. सिंह तक को टाट्रा ट्रक डील में खुद को 14 करोड़ की रिश्वत के आरोप लगाने पड़े। केन्द्रीय प्रतिरक्षा मंत्री ए.के. एंटनी सुरक्षा मामलों में एकदम असहाय हैं। राष्ट्रपति चुनावों को लेकर सबसे काबिल राजनीतिज्ञ प्रणव मुखर्जी को विपक्ष की तुलना में कांग्रेस की लाबी निबटाना चाहती है। यूपीए की चेयरपर्सन श्रीमती सोनिया गांधी कुछ नहीं कर पा रहीं और देश के ईमानदार प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी होठ सिकर काम कर रहे हैं। पिछले तीन सालों में हमने कभी आदर्श सोसाइटी घोटाला, टूजी स्पैक्ट्रम घोटाला, कामनवैल्थ घोटाला देखा। और अब एक के बाद एक पुराने नेता चाहे वे कांग्रेस के सुखराम हों या भाजपा के बंगारू लक्ष्मण, को रिश्वतखोरी में सलाखों के पीछे जाते हुए देखा है। यह सब कुछ पिछले तीन साल में देखने को मिला। ऐसी सूरत में यूपीए को कौन बचाएगा यह सवाल राजनीतिक विश्लेषक उठा रहे हैं।
लोकसभा चुनाव अभी दो साल दूर हैं। आमतौर पर यह समय सरकार की उपलब्धियों का डंका पीटने का होता है। लेकिन वास्तविकता यह है कि इस समय सरकार के विरोधियों का डंका बज रहा है। सरकार को कोई खतरा नहीं है पर सरकार सुरक्षित भी नहीं नजर आती। सरकार चल रही है पर चलती हुई नजर नहीं आ रही। पार्टी और सरकार का शीर्ष नेतृत्व तय नहीं कर पा रहा कि पार्टी सरकार को ताकत दे या सरकार पार्टी को। मनमोहन सिंह अपने अतीत की छाया नजर आते हैं। 2004 में प्रधानमंत्री पद त्यागने से बना सोनिया गांधी का आभामंडल सरकार के घोटालों और राज्यों के चुनावों की हार की भेंट चढ़ गया है। अमेठी में राहुल गांधी को विरोध के नारे सुनने पड़ रहे हैं। देश की आर्थिक स्थिति की तुलना 1990-91 के हालात से होने लगी है। ऐसे में सरकार को अपनी तीन साल की उपलब्धियों की टोकरी खाली नजर आ रही है। जिस सरकार और प्रधानमंत्री के सत्ता में लगातार आठ साल पूरे होने जा रहे हों वहां ईद की बजाय मुहर्रम का माहौल है। वह भी ऐसे समय में जब विपक्ष अपनी ही परेशानयों से जूझ रहा हो। 2009 के लोकसभा चुनाव में देश के मतदाता ने कांग्रेस को उम्मीद से ज्यादा दिया। प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह की साख को जनादेश की ताकत दी। लेकिन साल भर बीतते-बीतते 2-जी स्पैक्ट्रम घोटाले से मामला शुरू हुआ तो ऐसा लगने लगा कि सरकार सिर्फ घोटाले ही कर रही थी। सड़क से सुप्रीम कोर्ट तक सरकार पिटती रही। ऐसा लग रहा है जैसे पार्टी और सरकार दोनों दिशाभ्रम का शिकार है। नागर समाज के लोगों से कैसा व्यवहार किया जाए यह सरकार तय नहीं कर पाई। अन्ना हजारे और उनके साथियों की पहले उपेक्षा की, फिर दुत्कारा उसके बाद गले लगाया और अब दोनों परस्पर विरोधी खेमे में खड़े हैं। यही स्वामी रामदेव के साथ हुआ। अकेले सुब्रह्मण्यम स्वामी पूरी सरकार पर भारी नजर आ रहे हैं।
मौजूदा हालत को देखकर कहा जा सकता है कि इस सरकार का दोस्त कौन है और दुश्मन कौन, यह समझना मुश्किल है। वित्त मंत्रालय के आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु ने सरकार की निर्णय लेने की क्षमता के बारे में जो कुछ कहा उससे अंदर की बात बाहर आ गई। दुनिया की सबसे बड़ी रेटिंग एजैंसियों में से एक स्टैंडर्ड एंड पुअर्स ने भारतीय अर्थव्यवस्था का दृष्टिकोण नकारात्मक करार दिया है। इसके साथ ही एजैंसी के विश्लेषक तकाहिरा ओगावा ने सरकार की राजनीतिक स्थिरता पर भी सवाल उठाया है। रिजर्व बैंक के गर्वनर डी. सुब्बाराव ने तो प्रधानमंत्री की मौजूदगी में ही पूछा कि क्या हम 1991 की स्थिति की ओर बढ़ रहे हैं? उन्होंने कहा कि 1991 में राजकोषीय घाटा सात फीसदी था। चालू वित्तीय वर्ष में इसके 5.9 फीसदी होने का अनुमान है। चालू खाते का घाटा उस समय तीन फीसदी था जो अब 3.6 फीसदी है। जितने भी आर्थिक विशेषज्ञ हैं उन्हें भारतीय अर्थव्यवस्था की ताकत पर तो भरोसा है पर सरकार की निर्णय लेने की क्षमता पर नहीं। उद्योग जगत का मानना है कि सरकार की निर्णय लेने की क्षमता को लकवा मार गया है। सहयोगी दलों को अपनी ही सरकार के नेतृत्व और नीयत पर भरोसा नहीं है। गैर कांग्रेस शासित दलों के मुख्यमंत्री केन्द्र सरकार के खिलाफ लामबंद हो रहे हैं। सरकार के मंत्री जमीकी हकीकत को समझने की बजाय हवा में तलवार भांज रहे हैं।
मई 2009 में मनमोहन ङ्क्षसह ने जब दूसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी तो उनका इकबाल बुलंदी पर था। वह देश के पहले गैर राजनीतिक प्रधानमंत्री थे जिन्हें अमरीका से परमाणु करार के बाद चाणक्य कहा जाने लगा था। चुनाव के दौरान उन्हें कमजोर प्रधानमंत्री कहने वाले लालकृष्ण अडवानी नतीजे आने के बाद अपने घाव सहला रहे थे। सोनिया गांधी आयरन लेडी के रूप में नजर आ रही थीं। उनके और मनमोहन सिंह के बीच तालमेल को मिसाल के तौर पर पेश किया जा रहा था। राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद से महज एक इशारे की दूरी पर नजर आ रहे थे। तीन साल में सब कुछ रेत के महल की तरह ढह गया। 2-जी स्पैक्ट्रम घोटाले में कपिल सिब्बल के कहे अनुसार घाटा शून्य रहा हो या नहीं पर सरकार का रसूख रसातल में चला गया है। गैर राजनीतिक होना मनमोहन सिंह की ताकत थी, आज उनकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गई है। सरकार का इकबाल चला गया है। देश के सबसे ईमानदार प्रधानमंत्री को नौकरशाही से अपील करनी पड़ रही है कि बिना डरे फैसले लें। उत्तराखंड में अपनी पसंद का मुख्यमंत्री बनवाने के लिए सोनिया गांधी को हरीश रावत के सामने झुकना पड़ता है। राहुल गांधी उत्तर प्रदेश ही नहीं अमेठी में भी अजनबी से हो गए हैं। समस्या यह नहीं है कि हालात बुरे हैं। सरकार और कांग्रेस के लिए चिंता की बात यह है कि कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही है।
यह सवाल इसलिए क्योंकि करोड़ों इधर-उधर करने वालों का बाल बांका होता नहीं दिखता। ध्यान दें कि चारा घोटाले में बड़े नेताओं का निपटारा होना शेष है और माया-मुलायम के ज्ञात स्रोतों से अधिक आय के मामले भी अधर में हैं। शायद ही कोई यह मानकर चल रहा हो कि राष्ट्रमंडल खेलों में अनगिनत घपलों और 2-जी घोटालों के जिम्मेदार लोगों को हाल-फिलहाल सजा मिलने जा रही है। रसूख वाले लोग जिस तरह तारीख पर तारीख का खेल खेलने में सक्षम हैं उसे देखते हुए यही लगता है कि कलमाडी, राजा आदि के मामलों का निपटारा होने में दशकों लग सकते हैं। सभी जानते हैं कि प्रभावशाली लोग न्याय प्रक्रिया से खेलने-खिलवाड़ करने में माहिर हैं, लेकिन किसी को इसकी चिंता नहीं कि न्याय समय पर मिले। कम से कम नेताओं-नौकरशाहों को तो इसकी चिंता बिल्कुल भी नहीं। यदि किसी को चिंता है तो सुप्रीम कोर्ट को। अगस्त 2009 में सीबीआई और जांच एजैंसियों के सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा था कि भ्रष्टाचार की बड़ी मछलियों पर निर्भय होकर शिकंजा कसने की जरूरत है, लेकिन इसका कहीं कोई असर नहीं दिखा। दिखता भी कैसे? ऐसी बड़ी मछलियों को खुद वही संरक्षित जो कर रहे थे। याद कीजिए, यह वही समय था जब राजा और कलमाडी मनमानी कर रहे थे और वह मौन साधे थे। उनका मौन टूटा तो भी उन्होंने राजा को क्लीनचिट दे दी और कलमाडी के खिलाफ की जा रही शिकायतों से मुंह फेर लिया। हालांकि इसी 20 अप्रैल को विधि आयोग ने अपनी रपट में कहा है कि प्रभावशाली व्यक्तियों के मामलों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है, लेकिन यह तय मानिए कि कोई भी इस रपट पर गौर नहीं करने जा रहा है। विधि आयोग के मुताबिक रसूखदार लोगों के संज्ञेय अपराधों की जांच अधिकतम छह माह में हो और उनके मामलों की सुनवाई बिना किसी बाधा के होनी चाहिए। इस आयोग ने स्थानीय निकायों के प्रमुखों, विधायकों, सांसदों, पूर्व एवं वर्तमान मंत्रियों आदि को रसूखदार माना है। आखिर में यही कहेंगे कि सरकार को इन घोटालों और पिछले तीन साल के लेखे-जोखे से सबक सीखकर आने वाले दो साल बाद चुनावों के लिए जनता के बीच खुद को लेकर जाना है। तो क्या यूपीए के कर्ताधर्ता और कांग्रेस के रणनीतिकार जनता के बीच कोई नजीर पेश करेंगे? इसकी कोई उम्मीद फिलहाल नजर नहीं आती और यूपीए तथा कांग्रेस का भविष्य अंधकार में है, पिछले तीन साल में जो कुछ हुआ वह यही बयां कर रहा है।
 
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