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आतंकवाद के नाम पर भारत सरकार का रवैया बहुत ज्यादा बढिय़ा कभी नहीं रहा। सबसे ज्यादा मार आतंकवाद की भारत ने ही झेली है और दु:ख इस बात का है कि हम भविष्य के लिए कुछ नहीं कर रहे। जहां सुरक्षा के नाम पर फौज के पास गोला-बारूद नहीं हो,सरकार करोड़ों-अरबों-खरबों के घोटालों में अपना बचाव करते Þए कत्र्तव्य निभा रही हो तो इसे क्या कहेंगे? मुम्बई अटैक जिसे हम 26/11 का बदनुमा दाग कह कर अपने दामन को साफ करने की कोशिश में लगे रहते हैं, पर अभी तक कुछ नहीं कर पाए। जिस जमात-उद-दावा के चीफ हाफिज मोहम्मद सईद को मुम्बई अटैक का मास्टरमाइंड कहा जाता है, उसपर अमरीका ने एक करोड़ डालर यानी 50 करोड़ रुपए का ईनाम घोषित कर रखा है, को लेकर भारत सरकार अमरीका के इस प्रयास की तारीफ करने के काम में जुट गई है। हमला हमारी धरती पर हुआ है, हमारी मुम्बई पर हुआ है और हमले के मास्टर माइंड सईद पर ईनाम रखने वाला अमरीका कौन होता है? यह हमारी निकम्मी और लचर सरकार के कर्ताधर्ताओं की असफल कार्यशैली है। अमरीका ने भारत के हाथ में लालीपाप देकर वही पुराना काम किया है जो वह पाकिस्तान के साथ करता रहा है।
हमारा सवाल यह है कि देश में बम धमाकों के सैकड़ों मुजरिम जेलों में बंद कर महफूज कर दिए गए हैं। मुम्बई अटैक के अजमल कसाब और संसद हमले के दोषी अफजल गुरु भी जेल में सुरक्षित हैं। इन्हें फांसी की सजा सुनाई जा चुकी है, लेकिन कोई सरकार कुछ नहीं कर पाई। यह सरकार एकदम निकम्मी तथा लचर ही नहीं अक्षम होने के साथ-साथ अधर्मी और अनैतिक भी है, क्योंकि वह लोगों की रक्षा नहीं कर पा रही। नियमों और कानूनों को लागू नहीं कर पा रही है। जो केवल अपने बचाव में लगे रहते हैं, और कभी आक्रमण नहीं करते वे कभी जीत नहीं सकते। हमारी सरकार इसी ढर्रे पर चल रही है। जो पाकिस्तान ओसामा बिन लादेन के मामले पर अमरीका का पिठ्ठू बना रहा और लादेन को अमरीका के हाथों ही मरवा दिया, वह पाकिस्तान आज तक दहाड़ रहा है कि हमें भारत ने कोई डोजियर नहीं दिया तो उस पाकिस्तान से हमारी सरकार वार्ता की कोशिश क्यों कर रही है। सवाल पाक राष्टï्रपति जरदारी की निजी यात्रा पर अजमेर आने या पीएम मनमोहन ङ्क्षसह से उनकी मीटिंग में उठने वाले मुद्दों का नहीं है। अहम बात तो यह है कि जब जरदारी की यह यात्रा ही प्राइवेट है तो फिर आतंकवाद जैसे मुद्दे की सरकारी बातचीत कर सियासत क्यों गर्मायी जा रही है? खबर है कि जमात-उद-दावा (जेयूडी) अपने चीफ और 26/11 हमले के मास्टर माइंड हाफिज मोहम्मद सईद पर करीब 1 करोड़ डालर (50 करोड़ रुपए) का ईनाम घोषित किए जाने से नाराज है। जेयूडी अमरीका की ओर से उठाए गए कदम के खिलाफ इंटरनैशनल कोर्ट जाने पर विचार कर रहा है। वह इस बाबत अपने कानूनी विशेषज्ञों से सलाह-मशविरा करने के बाद कोई कदम उठाएगा। इस बीच पाक ने सईद पर घोषित ईनाम के मुद्दे पर उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई के लिए ठोस सबूत की मांग की है। जमात-उद-दावा के प्रवक्ता मोहम्मद मसूद ने कहा कि हमारे लीगल एक्सपट्ïर्स इस बारे में जल्द ही विचार-विमर्श करेंगे। हम इस आप्शन का इस्तेमाल करेंगे, वैसे हम इसे गम्भीरता से नहीं ले रहे हैं। हालांकि मसूद ने साफ नहीं किया कि जेयूडी इस फैसले को अमरीकी कोर्ट में चैलेंज करेगा या नहीं।
उन्होंने कहा कि हम अमरीका से न्याय की उम्मीद नहीं रखते हैं। अमरीका मुसलमानों को उनकी गलती साबित होने से पहले ही दोषी मान लेता है। इसी बीच सईद पर प्रधानमंत्री मनमोहन ङ्क्षसह ने कहा कि भारत के खिलाफ आतंकवादी गतिविधियों में शामिल लोगों को न्याय के कठघरे में लाया जाना चाहिए।
जेयूडी चीफ सईद ने कहा कि यूएस ने मेरे ऊपर ईनाम इसलिए घोषित किया है क्योंकि मैं पाकिस्तानी सरकार के अफगानिस्तान में नाटो सप्लाई रूट खोले जाने का विरोध कर रहा था। मेरे खिलाफ कदम उठाया जाना भी आतंकवाद की तरह है और अमरीका भारत के कहने पर ऐसा कर रहा है। हाफिज सईद ने बुधवार को अमरीका, को ललकारते हुए कहा कि अगर हिम्मत है तो ओसामा बिन लादेन की तरह मेरे खिलाफ कार्रवाई करके दिखाए। मैं कहीं छुप नहीं रहा और मैं खुद अमरीका को बता रहा हूं कि मैं कहां हूं। रावलपिंडी स्थित फ्लैशमैन होटल में सईद ने पत्रकारों से बातचीत के दौरान अमरीका को यह चुनौती दी। सईद ने दावा किया कि जमात-उद-दावा और उसके सदस्यों का 2008 में हुए मुम्बई हमले से कोई लेना-देना नहीं है और इस मामले में उसके खिलाफ कोई सबूत नहीं है। उसने कहा कि भारत के तमाम दावे मेरे खिलाफ मीडिया प्रोपेगैंडा हैं। वैसे यह भी स्पष्टï दिखाई दे रहा है कि पाकिस्तान इस आतंकी को खुला समर्थन दे रहा है और भारत हमले के दोषियों को जेल में महफूज रख कर बैठा है तो जवाब हमारे गृहमंत्री पी. चिदम्बरम से लिया जाना चाहिए। जैसे चिदम्बरम हैं, वैसे ही विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा हैं तभी तो पाकिस्तान ने कृष्णा के उस बयान को खारिज कर दिया जिसमें उन्होंने कहा था कि भारत ने पाकिस्तान को ऐसे पर्याप्त सबूत मुहैया कराए हैं जिससे हाफिज सईद के तार मुम्बई हमलों से जुड़ते हैं। पाकिस्तान ने यह कहते हुए कृष्णा के बयान को खारिज कर दिया कि लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक सईद के खिलाफ 'पुख्ता सबूत' के आधार पर ही कार्रवाई की जा सकती है। कृष्णा की ओर से दिए गए बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए पाकिस्तान के विदेश कार्यालय ने कहा कि भारत ने सईद के खिलाफ कोई ठोस और अहम सबूत मुहैया नहीं कराया है। विदेश कार्यालय ने कहा कि पुख्ता सबूत के आधार पर ही कोई कार्रवाई की जा सकती है। विदेश कार्यालय के प्रवक्ता अब्दुल बासित ने बताया कि इसमें कुछ भी ठोस और बरकरार रखने योग्य नहीं है। मुम्बई हमले की सुनवाई के अपने अनुभव से भारत बेहतर तरीके से जानता है कि कही-सुनी बातें पुख्ता सबूतों की जगह नहीं ले सकतीं। बासित ने कहा कि पुख्ता सबूत ही न्यायिक जांच के आगे टिक सकते हैं। इससे पहले कृष्णा ने कहा था कि केन्द्रीय गृहमंत्री पी. चिदम्बरम की ओर से पाकिस्तान सरकार को मुहैया कराई गई सूचना में 'मुम्बई पर हमले की साजिश रचने और इसे अमल में लाने में हाफिज सईद की भागीदारी से जुड़े सारे ब्यौरे थे।'
हम तो यही कहेंगे कि अमरीका की ओर से हाफिज सईद पर इनाम घोषित किए जाने के बाद भारत सरकार का उत्साहित होना स्वाभाविक है, लेकिन उसे यह स्पष्टï करना चाहिए कि अभी तक वह हाथ पर हाथ धरे क्यों बैठी थी? नि:संदेह भूले-भटके इस आशय के बयान जारी कर पाकिस्तान पर दबाव नहीं बनाया जा सकता कि वह मुम्बई हमले के गुनहगारों को दंडित करे। प्रधानमंत्री को जरदारी के समक्ष यह स्पष्ट करने में संकोच नहीं करना चाहिए कि मुम्बई हमले के लिए जिम्मेदार लोगों को सजा दिलाने के मामले में पाकिस्तान ने किस्म-किस्म के बहाने बनाने के अलावा और कुछ नहीं किया है। यदि हमारे नीति-नियंता ही मुम्बई हमले को भूलते हुए नजर आएंगे अथवा आगे बढऩे के नाम पर उसे अतीत के हवाले कर देंगे तो इससे दुर्भाग्यपूर्ण और कुछ नहीं हो सकता।
26/11 की सुनवाई तथा फैसला एक मजाक बन कर रह गया है क्योंकि अगर भारत सरकार इस नतीजे पर पÞंची है कि मुम्बई हमले की जांच के सिलसिले में किसी आयोग को पाकिस्तान भेजने की जरूरत नहीं है तो इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं। अच्छा होता कि सरकार की ओर से ऐसी कोई पहल ही नहीं की जाती, क्योंकि पाकिस्तान की मुम्बई हमले के लिए जिम्मेदार तत्वों को दंडित करने में तनिक भी दिलचस्पी नहीं। यह आश्चर्यजनक है कि पाकिस्तान के इरादों से अच्छी तरह परिचित होने के बावजूद भारत सरकार इस पर क्यों सहमत हुई कि दोनों देशों के जांच आयोग एक-दूसरे के यहां जाएंगे? यह व्यर्थ की कवायद थी और इसकी पुष्टि तमाम हीला-हवाली के बाद हाल ही में भारत आए पाकिस्तानी आयोग के रवैये से होती है। इसकी उम्मीद नहीं की जानी चाहिए कि इस आयोग ने मुम्बई आकर जो जानकारी हासिल की उसके आधार पर पाकिस्तान में उन आतंकियों के खिलाफ शिकंजा कसा जाएगा जो मुम्बई हमले की साजिश के लिए जिम्मेदार माने जा रहे हैं। इसकी एक बड़ी वजह आतंकी सरगना हाफिज सईद के प्रति पाकिस्तान का प्रेमभाव है। हालांकि विभिन्न स्तरों पर इसकी पुष्टि हो चुकी है कि हाफिज सईद मुम्बई हमले का सूत्रधार और लश्करे तैयबा का सरगना है, लेकिन पाकिस्तान उसे समाजसेवी मानने पर तुला है। लश्करे तैयबा और उसके नए नाम वाले संगठन जमात-उद-दावा पर प्रतिबंध के साथ-साथ मुम्बई हमले की साजिश में शामिल रहा पाकिस्तानी मूल के अमरीकी आतंकी डेविड हेडली की स्वीकारोक्ति के बाद भी पाकिस्तान जिस तरह हाफिज सईद को संरक्षण दे रहा है उससे भारत को वस्तुस्थिति का आभास हो जाना चाहिए। अमरीका का यह ईनामी ऐलान भी सियासत है और भारत को पाकिस्तान के साथ-साथ इस सियासती नेता से भी सावधान रहना चाहिए।
चिदम्बरम व कृष्णा जैसे लचर मंत्री नहीं बल्कि कर्मठ, राष्ट्रभक्त व परिणाम देने वाला गृहमंत्री चाहिए तभी देश महफूज रहेगा। देश की व्यवस्था तो अजमल कसाब और अफजल गुरु को महफूज रखने की है ताकि वोटों का समीकरण हमारे खिलाफ न जाए। हे भगवान भारत को बचाओ। |