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दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत का हिसाब-किताब सबसे अजीबो-गरीब है। वक्त से पहले बहुत कुछ तय कर लिया जाता है और जो वक्त के साथ-साथ चलते हैं, वही सब-कुछ पाते हैं। हमारे यहां राजनीतिक सिस्टम भी सबसे अलग है और राजनीतिक पार्टियों का हिसाब-किताब भी सबसे निराला ही है। चुनावों के वक्त योजनाएं बनाकर अपना भविष्य संवारने के चक्कर में कई बार राजनीतिक दलों का हिसाब-किताब गड़बड़ा भी जाता है। इस दृष्टिकोण से भाजपा को हम एक बदकिस्मती के भंवर के रूप में देख सकते हैं, जबकि कांग्रेस इस मामले में बहुत खुशकिस्मत है। बात योग्यता और रजामंदी की है। अगर इन दोनों को जोड़कर देखा जाए तो कांग्रेस की तकदीर बहुत अच्छी है। अगर हम भाजपा और कांग्रेस दोनों के भविष्य को लेकर तुलनात्मक अध्ययन करें, तो यही कहना होगा कि आज की तारीख में भाजपा के सामने एक शानदार मौका है, जिसके दम पर वह अपना और देश का भविष्य सुधार सकती है लेकिन इस पार्टी में कांग्रेस की तरह रजामंदी और विश्वसनीयता का अभाव है, यही उसकी बदकिस्मती है।
देश का पी.एम. कैसा होना चाहिए? अगले चुनाव जो कि 2014 में होने हैं, को लेकर और देश के भावी पी.एम. को लेकर कांग्रेस और भाजपा में समय-समय पर चिंतन-मंथन चलता रहता है। कांग्रेस की ओर से अक्सर उस राहुल गांधी का नाम आ जाता है, जो खुद खामोश रहते हैं और सोनिया गांधी भी अक्सर खामोश रहती हैं। मीडिया जगत में राहुल गांधी को भावी पी.एम. के रूप में प्रोजैक्ट किया जाने लगा है और पार्टी के रणनीतिकार भी एक ही सुर में बोलते हैं कि राहुल भविष्य की तस्वीर हैं और वह अगर पी.एम. बनते हैं तो यह देश के लिए सौभाग्य की बात होगी। दूसरी तरफ भाजपा में पी.एम. इन वेटिंग को लेकर आज की तारीख में नरेंद्र मोदी का नाम तो सबसे टॉप पर है, लेकिन पार्टी के दिग्गज ही इसी मुद्दे को लेकर ऐसा विवाद कदम-कदम पर खड़ा कर रहे हैं कि पार्टी विवादों के भंवर में फंसकर रह गई।
एक तरफ जहां आरएसएस नरेंद्र मोदी को हिंदुत्व विचारधारा वाले व्यक्तित्व के रूप में भावी पी.एम. मान रही है, तो फिर भाजपा के रणनीतिकारों को इसमें आपत्ति क्या दिखाई दे रही है? यह बात हमारी समझ से बाहर है कि भाजपा वाले अब पी.एम. के मुद्दे को लेकर कांग्रेस का अनुसरण क्यों नहीं करते। अगर भाजपा ऐसा कर लेती है और मोदी को पी.एम. के रूप में प्रोजैक्ट कर देती है, तो सब-कुछ सरल हो जाएगा और 2014 के लोकसभाई फाइनल में उसे विजय भी मिल जाएगी।
कांग्रेस की राज्यों में सरकार हो या केंद्र सरकार हो या फिर संगठन की ही बात हो, हर तरफ राहुल गांधी को पी.एम. के रूप में प्रोजैक्ट करने के लिए होड़ मची हुई है, जिसमें राजनीतिक दमखम बहुत ही कम है। इतना ही नहीं उनमें राजनीतिक दृष्टिकोण से सूझबूझ भी कम है, लेकिन व्यक्ति पूजा करने वाली कांग्रेस में चारणभाटों की कोई कमी नहीं है। हर तरफ राहुल 'जी' और सोनिया 'जी' की ही चर्चा है। हर तरफ जी हजूरी की होड़ कांग्रेस में मच रही है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि अपरिपक्वता और अयोग्यता को प्राथमिकता देकर राहुल गांधी को स्थापित करने के लिए पूरी कांग्रेस में रजामंदी है। क्या यह देश के लिए शुभ संदेश है? इस सवाल का जवाब समय के गर्भ में है।
भाजपा की ओर से हर मौके पर जब-जब पी.एम. पद की चर्चा हुई नरेंद्र मोदी ही एक सशक्त नेता के रूप में उभरे। उन्होंने ही कांगे्रस की धर्मनिरपेक्षता का जवाब हिंदुत्व की विचारधारा से दिया लेकिन पार्टी उन्हें आज भी भावी पी.एम. के रूप में स्थापित नहीं कर पाई। ऐसा लगता है कि कांग्रेस हो या भाजपा वास्तविक रूप से देश में राजनीतिक नेतृत्व को लेकर शून्यता बनी हुई है। मोदी की अपनी काम करने की शैली है और भाजपा की अपनी है, जबकि इस मामले में कांग्रेस की शैली एकदम सोनिया 'जी' और राहुल 'जी' पर निर्भर है।
पिछले आम चुनाव के बाद लगने लगा था कि भले ही राहुल गांधी फिलहाल कोई सरकारी जिम्मेदारी न संभालें, पर वह जल्दी ही राष्टï्रीय नेता के रूप में उभरेंगे। आश्चर्यजनक रूप से ऐसा कुछ नहीं हुआ। उत्तर प्रदेश के पिछले विधानसभा चुनाव के लिए राहुल गांधी करीब तीन साल से मेहनत कर रहे थे, लेकिन मतदाताओं ने उन्हें अस्वीकार कर क्षेत्रीय दल समाजवादी पार्टी को प्रदेश की गद्दी सौंप दी। यह एक तरह से कांग्रेस की राष्ट्रीय हार ही थी। ऐसा माना जा रहा था कि पिछले आम चुनाव की तरह भविष्य में भी पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी का जादू चलेगा, मगर पंजाब, गोवा एवं उत्तराखंड के चुनाव परिणामों ने सिद्घ कर दिया कि सोनिया गांधी में नेशनल अपील नहीं है। पार्टी स्तर पर ही वह इतनी कमजोर हो गई हैं कि उत्तराखंड के पिछले विधानसभा चुनाव में जीतकर आए विधायकों ने पहले तो मुख्यमंत्री चुनने का अधिकार सोनिया गांधी को सौंप दिया, पर जैसे ही विजय बहुगुणा का नाम चला, वैसे ही बड़ी संख्या में विधायक बगावत पर उतर आए और हरीश रावत को मुख्यमंत्री बनाने की बात पर अड़ गए। इन बागी विधायकों को किसी तरह समझा-बुझाकर बहुगुणा के पक्ष में किया गया। हद तो तब हो गई जब तेलंगाना के मुद्दे पर सोनिया गांधी के निर्देशों के विरुद्घ जाकर पार्टी सांसदों ने लोकसभा में खड़े होकर नारे लगाए।
कांग्रेस और भाजपा दोनों ही तरफ काफी हद तक मतभेद तो हैं, लेकिन पी.एम. पद को लेकर कांग्रेस सुरक्षित है और भाजपा एकदम असुरक्षित। भाजपा अगर नरेंद्र मोदी को स्वीकार कर लेती है, तो सचमुच कोई परिणाम निकल सकता है। इस मामले को लेकर हम मौजूदा पी.एम. का उल्लेख भी करना चाहेंगे, क्योंकि मनमोहन सिंह एक बेहद कमजोर पी.एम. हैं। सच बात तो यह है कि वह राजनेता हैं ही नहीं। पी.एम. एक ऐसा होना चाहिए, जिसमें नेता के गुण हों। इस मामले में मनमोहन सिंह के पास एक भी गुण नहीं। वह लोकसभा का चुनाव तक हार गए थे और संसद में वह राज्यसभा के दरवाजे से ही एंट्री कर पाए। यह देश के लिए दुर्भाग्य नहीं तो और क्या है? उनका खुद का व्यक्तित्व और नेतृत्व का जज्बा दमदार नहीं है। कुछ दिन पहले तक मनमोहन सिंह की ईमानदारी पर विरोधी भी शक नहीं करते थे, पर टीम अन्ना ने उनके सहित एक दर्जन से अधिक मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाकर मनमोहन सिंह को भी कठघरे में ला खड़ा किया है। टीम अन्ना ने इस संबंध में एक पत्र के साथ दस्तावेज प्रधानमंत्री को भेजे हैं। ये आरोप सही हैं या गलत, यह तो बाद में तय होता रहेगा मगर मनमोहन सिंह की जनता में जो एक साफ-सुथरे नेता की छवि थी, वह तो धूमिल हो ही गई है। राष्ट्रीय नेतृत्व की शून्यता के कारण ही बिल गेट्स सीधे उत्तर प्रदेश चले जाते हैं और वहां मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से मिलकर उत्तर प्रदेश में निवेश की चर्चा करते हैं। कदाचित इसी शून्यता के कारण हिलेरी क्लिंटन विकास के मुद्दे पर चर्चा करने के लिए प्रधानमंत्री से मिलने के बजाय सीधे कोलकाता चली गईं तथा वहां उन्होंने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से विस्तृत चर्चा की। विचारणीय बात यह है कि आज नेहरू-इंदिरा गांधी या वाजपेयी जैसा नेतृत्व होता तो क्या ऐसी स्थिति निर्मित होती?
कहने का मतलब है कि वर्तमान में एक राजनीतिक शून्यता साफ दिखाई दे रही है। मौजूदा स्थिति में जब बड़े दल इस दौर से गुजर रहे हों तो हम क्यों नहीं भविष्य के लिए अभी से एक ऐसा नेता चुन लें, जो पी.एम. पद के लिए सशक्त रूप से जनता के दिलो-दिमाग पर बैठ जाए। जमीनी नेता ही देश को नेतृत्व दे सकता है।
पूर्व में किए गए प्रयोग भले ही सत्ता हथियाने के लिए साम-दाम-दंड-भेद तो हो सकते हैं लेकिन स्थिरता और खुशहाली के मामले में वे पैमाना नहीं हो सकते। भाजपा चाहे तो मोदी में भविष्य की तस्वीर देखकर अपनी पार्टी के लिए भी एक नजीर पेश कर सकती है। इसी के दम पर वह कांग्रेस की राहुल के प्रति जी हजूरी की परंपरा को खत्म कर सकती है। पहले से ही 2जी स्पैक्ट्रम घोटाले में फंसी कांगे्रस अभी तक सोनिया 'जी' और राहुल 'जी' के मोह से मुक्त नहीं हो पा रही। देश किसी एक पार्टी या किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि सबका होता है। इस समय चिंतन-मंथन की जरूरत भाजपा को ज्यादा है। अगर राहुल और नरेंद्र मोदी की तुलना की जाए, तो मोदी यकीनन उन पर भारी हैं और कांग्रेस पर भी भारी हैं। भाजपा को उन्हें अब भारी मानकर पी.एम. के रूप मेंं प्रोजैक्ट कर देना चाहिए। समय पर किया गया काम मंजिल दिला ही देता है। उम्मीद है कि भाजपा इस योजना पर काम करेगी। |