विशेष लेख
Date : 11-September-2012
एक-एक घोटाले की कीमत चुकानी होगी कांग्रेस को
आदित्य चोपड़ा
जो दुनिया में हर जगह होता है वह हमारे यहां नहीं होता और जो दुनिया में कहीं नहीं होता वह हमारे यहां होता है, यही हमारे देश की विशेषता है। तभी तो हमारे यहां कहा गया है कि अनेकता में एकता है। भले ही सबके ख्यालात अलग-अलग हों परन्तु अपने लाभ के लिए सब एक हो जाते हैं और इस खेल में सब राजनीतिक दल एक ही हैं। अलग-अलग मुद्दों पर सबकी पार्टियों के स्टैंड भी अलग-अलग ही होते हैं परन्तु अपने लाभ के लिए एक हो जाना हमारे यहां एक परम्परा भी बनी हुई है और हम इसी का निर्वाह कर रहे हैं। हमारे यहां हिसाब-किताब सबसे निराला है। सबके सामने अपराध होता है तथा सब मूकदर्शक बने देखते रहते हैं, क्या यह सबसे बड़ा अपराध नहीं? हम कांग्रेस यानी यूपीए सरकार पर खुद को केन्द्रित करना चाहते हैं जोकि 2014 में चुनावों का सामना करने जा रही है। हाल ही के कोयला घोटाले को सामने रख कर अगर कांग्रेस के प्रदर्शन की बात करें तो कुछ बड़े-बड़े सर्वे सामने आए हैं और इसी के चलते उनका निष्कर्ष यही है कि कांग्रेस दहाई के अंक तक सिमट सकती है। सर्वेकर्ताओं का मानना है कि कामनवैल्थ घोटाला, आदर्श सोसाइटी घोटाला और टू-जी स्पैक्ट्रम घोटाले के अलावा कई सैन्य उपकरण घोटालों को तो इसमें शामिल भी नहीं किया गया है। यह राय आम है कि घोटालों की वजह से कांग्रेस का ग्राफ बहुत गिर गया है।
जिस प्रकार कोल घोटाले ने हमारे देश की असली पोल खोली है उससे यही लगता है कि इस हमाम में सब नंगे हैं। कोई किसी को कहने वाला नहीं है। लिहाजा अब यह तलाश किया जा रहा है कि कांग्रेस की कमजोर कड़ी क्या है। कल तक यही कहा जा रहा था कि खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हैं परन्तु अब कोयला घोटाले ने जिस प्रकार संसद की अस्मिता को तार-तार किया है वह चौंकाने वाला है। पूरे तेरह दिन संसद के मानसून सत्र की भेंट चढ़ गए। सरकार कुछ नहीं कर पाई। कुल बीस दिन का सत्र था और तेरह दिन तक विपक्ष ने संसद नहीं चलने दी और यूपीए की चेयरपर्सन श्रीमती सोनिया गांधी और लोकसभा में प्रतिपक्ष की नेता श्रीमती सुषमा स्वराज के बीच बातचीत इस लिए हुई कि गतिरोध तोड़ा जाए परन्तु इस बातचीत के बाद संसद का गतिरोध और बढ़ गया। हालत यह रही कि संसद हर बार की तरह मृतप्राय: ही रही। संविधान से जुड़े विशेषज्ञ कहते हैं कि हर रोज नौ करोड़ रु. के हिसाब से 127 करोड़ रुपए का नुक्सान हो गया। इसकी रिकवरी कैसे होगी, इसका जवाब कांग्रेस और भाजपा या बसपा या फिर तीसरे मोर्चे की संभावनाओं की तलाश में लगे और पीएम पद के बड़े दावेदार के रूप में खुद को उभारने में लगे सपा सुप्रीमो मुलायम यादव के पास भी नहीं है। भाकपा या माकपा भी सारे मामले पर चुप हैं। किसी ने यह नहीं सोचा कि देश में इस संसद नेेे क्या संदेश दिया है। जहां से अच्छा संदेश जाना चाहिए था वहां से हम खराब संदेश के बारे में क्या सोचेंगे यह किसी ने नहीं सोचा। संसद में चुनकर आने के लिए जनता के बीच जाना और फिर संसद ही न चलने देना और कोयला आवंटन घोटाले को लेकर आपस में भिड़ जाना, इसे क्या कहेेंगे। संसद की गरिमा को तार-तार करने वाले लोग जिस भी दल से होंगे इस बार ध्यान रखें कि जब जनता के बीच अब चुनावों में जाएंगे तो जनता उनका क्या हश्र कर सकती है वे इस बारे में पहले सोच लें।
हालत यह है कि इस कोयला घोटाले ने हमारी संसद की गरिमा और हमारे सांसदों ने अपनी कार्यशैली से जिस प्रकार सब कुछ खत्म कर दिखाया है, उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। इतना ही नहीं अगर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह यह सोचते हैं कि वह केवल चुप रहकर बच जाएंगे तो वह गलत हैं क्योंकि अब तक जो अमरीका उन्हें 'सिंह इज किंग' के रूप में जानता था अब आए दिन उन्हें बेनकाब कर रहा है। वह खुद प्रिंट मीडिया और चैनलों के लिए कोयला घोटाले में डील का सामान बनकर रह गए हैं। इस घोटाले में चार मीडिया हाउस भी शामिल बताए गए हैं। खुद सरकार के कमजोर पीएम मनमोहन सिंह के दायरे में सीबीआई ने लोगों का ध्यान बांटने के लिए छापों की कार्रवाई भी करवाई परन्तु अखबार सम्पादक एवं सांसद विजय दर्डा और उनके रिश्तेदार राजेन्द्र दर्डा जोकि महाराष्ट्र के मंत्री हैं, के यहां छापा मारकर आई वाश कर दिया गया। क्या यही सरकार का कत्र्तव्य है?
ताज्जुब इस बात का है कि बड़े-बड़े प्रिंट हाउस अगर सैटिंग के दम पर जिसे चाहें कोल ब्लाक दिलवा कर हजारों करोड़ रुपए डकार लेंगे और अपने पार्टनरों को सरकार के काम में बड़े-बड़े पैकेज दिलवा कर देश को लूटने का काम पत्रकारिता की आड़ में करने लगेंगे तो इसे क्या कहेंगे। जिस देश में पत्रकारिता भी दाव पर लग जाए और अखबार मालिक अपने हितों की खातिर सरकारों से सैटिंग कर रहे हों तो फिर कोयला घोटाले या अन्य घोटाले जितने भी होते रहें उससे देश को क्या फर्क पड़ता है।
हम यही कहना चाहते हैं कि अब तक जितने घोटाले हुए हैं वे प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह की देखरेख में हुए हैं। कांग्रेस के बारे में जितने भी सर्वे हुए हैं वे एकदम सटीक हैं और ऐसी सूरत में भाजपा के लिए यह एक सुखद अहसास हो सकता है परन्तु उसे भी ध्यान रखना होगा कि अभी से एकजुट होकर कांग्रेस को घेरना होगा वरना यह कांग्रेस किसी भी किस्म की लुभावनी घोषणाओं के दम पर जनता को पागल बनाकर कहीं भाजपा की घेरेबन्दी न कर ले। कांग्रेस घोटालों के कारण अपनी विश्वसनीयता खो चुकी है। परित्याग की परिभाषा बन चुकी सोनिया गांधी अपने पुत्र को अगर भावी पीएम के रूप में प्रोजैक्ट कर रही हैं तो यह उनकी बड़ी भूल होगी क्योंकि इस कड़ी में देश के भावी पीएम के रूप में फिलहाल गुजरात के दबंग सीएम देशवासियों के जेहन में उतर चुके हैं। हम तो यही कहेंगे कि अगर कोयला घोटाले पर सरकार अपनी स्थिति स्पष्ट करना चाहती है तो फिर खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सकारात्मक कार्यों के लिए सभी विपक्षी दलों से सहयोग की अपील करनी चाहिए थी, परन्तु उल्टा उन्होंने तो सभी पर आरोप लगाए। जब आप खुद भ्रष्टïाचार के दलदल में खड़े हों तो दूसरों पर आरोप लगाने से पहले अपने गिरेबान में झांक लेना चाहिए।
आगामी चुनावों में कौन विजेता होगा, पर यह तय है कि लड़ाई पंजे और कमल के फूल वाली पार्टी के बीच ही होगी। दोनों पार्टियां के सहयोगी दल भाव-तौल करेंगे लेकिन कांग्रेस नुक्सान में रहेगी यह तय हो चुका है क्योंकि देश चला रही कांग्रेस ने संसद संचालन के दौरान एक गलत संदेश देश को दिया है जिसकी कीमत देशवासी अब वसूलने को तैयार हैं।
 
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