विशेष लेख
Date : 14-August-2012
भारतीय संस्कृति के मूल आधार को बचाने के लिए गौवंश बचाएं
आदित्य चोपड़ा
मैं जिस विषय पर लिखने जा रहा हूं, वह एक ऐसा विषय है जो दिल को छूता है। एक सीधा-सा प्रश्न है जो मन में विचार पैदा करता है कि गौहत्या बंदी संबंधी कानून बनाने में केंद्र सरकार के सामने कौन सी बड़ी बाधा थी। आज जिस देश में दूध की नदियां बहती थीं वहां के शिशुओं को दूध नहीं मिल रहा है। अमीर तो दूध खरीद सकते हैं लेकिन आम आदमी के लिए दूध काफी महंगा है। अगर गरीब आदमी किसी तरह दूध खरीद भी लेता है तो वह भी नकली होता है। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के मौके पर गौवंश की रक्षा का मुद्दा उठाया और आरोप लगाया कि यूपीए सरकार गौ हत्या को बढ़ावा दे रही है, गौहत्या तथा गौमांस के निर्यात को बढ़ावा दे रही है ताकि गुलाबी क्रांति लाई जा सके। उन्होंने कहा कि हम केवल भगवान कृष्ण की पूजा ही नहीं करते बल्कि उनसे जुड़ी हर चीज की पूजा करते हैं। श्रीकृष्ण को हमेशा गायों के संरक्षक के तौर पर याद किया जाता है। जो गाय हमें अमृत प्रदान करती है कांग्रेस नीत सरकार गौ माता की हत्या करना चाहती है। नरेन्द्र मोदी ने जो मुद्दा उठाया उसे चुनावी नजरिए से देखना गलत होगा।
गौसेवा 1947 से पूर्व भी स्वतंत्रता सेनानियों का एक अनूठा स्वप्न था कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद कलम की नोक से क्षण भर में हम गौवध से मुक्ति पा लेंगे। आजादी के बाद गौहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध को लेकर संत समाज ने आंदोलन भी किया तो उन्हें मिली गोलियां। गौहत्या बंदी विषय को लेकर विनोबा भावे ने आमरण अनशन रखा था जिसे केवल इस शर्त पर तुड़वाया जा सका कि सम्पूर्ण राष्ट्र में गौहत्या बंद हो जाएगी परन्तु कुछ राज्यों में ऐसा Þआ लेकिन पूर्ण रूप से यह कार्य सम्पन्न नहीं हो सका। पंडित नेहरू ने गौवध बंदी कानून को ऐसा लटकाया जो आज तक लटका हुआ है। मूलत: गाय का मुद्दा हमारे लिए भावनात्मक मुद्दा है परन्तु पाश्चात्य सभ्यता में लालन-पालन होने के कारण पंडित नेहरू का गाय से कोई भावनात्मक सम्बन्ध नहीं था। अटल जी का शासन भी रहा। गौसेवा आयोग का गठन भी किया गया। गौसेवा आयोग के सर्वोदयी नेता मा. धर्मपाल तथा न्यायमूर्ति गुमानमल लोढा इसके सदस्य बने। उन्होंने 1400 पृष्ठों की रिपोर्ट भी सरकार को दी परन्तु उसके बाद भी कोई प्रगति नहीं हुई।
गौ प्रेमीजन 25-26 मार्च, 1987 का पावन दिवस नहीं भूले होंगे, जिस दिन राजघाट पर गौवध के विरोध में एक महासम्मेलन हुआ था, जिसमें सारे भारत से 1200 से भी अधिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया था। केन्द्र सरकार से बार-बार यही मांग की जा रही थी कि गौवध बंदी हेतु प्रभावशाली कानून बने। श्री राजीव गांधी उस समय प्रधानमंत्री थे। एक प्रतिनिधिमंडल ने उनसे इस विषय में समय भी लिया था और उन्होंने विचार-विमर्श करने का वायदा भी किया था परन्तु ठीक नियत समय पर बैठक नहीं हो सकी। फिर भी राजीव सरकार ने बाद में सहयोगात्मक रुख अपनाया। मध्य प्रदेश, हिमाचल और राजस्थान में गौवध बंदी के सन्दर्भ में कानून बने, उत्तर प्रदेश में तब राज्यपाल का अनुमोदन न हो सका। गुजरात सरकार ने इस ओर सार्थक कदम उठाए। क्या भूलूं, क्या याद करूं?
प्रामाणिक दस्तावेज साक्षी हैं कि 1952 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने सारे देशभर में गौवध विरोध में एक आंदोलन चलाया था और करीब दो करोड़ लोगों के हस्ताक्षर करवाकर एक मांग पत्र डा. राजेन्द्र प्रसाद के समक्ष रखा था।
1954 में प्रयाग में इस कार्य के लिए कुछ सार्थक निर्णय लिए गए और राम राज्य परिषद की भावनाओं को मूर्तरूप देने का प्रण लिया गया। कोलकाता, मुम्बई, अहमदाबाद और दिल्ली में भी बाद में सशक्त आंदोलन चले। इस दिशा में बंगाल में भी कई बार आवाजें उठीं। अखिल भारतीय हिन्दू महासभा की भूमिका बड़ी स्तुत्य रही। इस दिशा में महान प्रयास करने वाले इन लोगों के नाम हमें सदा स्मरण रखने होंगे : जगद्गुरु शंकराचार्य, श्री निरंजन देव तीर्थ, स्वामी करपात्री जी महाराज, श्री प्रभुदत्त ब्रह्मचारी, स्वामी गुरुचरण दास जी, मुनि सुशील कुमार जी, श्री माधव-सदाशिव गोलवलकर और श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार।
न जाने भारतवर्ष में कौन-सी आंधी 1947 के बाद आई कि इस राष्ट्र ने अपनी निजता खो दी। कहने को तो हम विदेशी चंगुल से मुक्त हो गए परन्तु सत्य यह था कि हम विदेशी परम्पराओं के दास हो गए तथा इस भारतवर्ष में एक मौलिक संविधान भी रचा न जा सका। कोई पीनल कोड न बन सका, कोई अपराध संहिता न बन सकी, सब कुछ हम आज तक विदेशी ढो रहे हैं। आज देश में बूचडख़ानों की संख्या 36 हजार से अधिक है। गायें सड़कों पर कूड़ा-करकट खा रही हैं। दूध देने वाली माता का दु:ख सहा नहीं जाता। भारत में प्रति मिनट 300 पशु काटे जा रहे हैं जिनमें 50 के लगभग गाय होती हैं। एक बड़ी विडम्बना यह भी है कि भारत में मांस निर्यात की शुरूआत श्रीमती इंदिरा गांधी की सरकार ने की थी। आज हर जगह गौमांस की बिक्री धड़ल्ले से की जा रही है। डिब्बा बंद बीफ का निर्यात किया जा रहा है। प्रसिद्ध वैज्ञानिक आईस्टीन ने कहा था कि काटे गये पशुओं से पीड़ा की तरंगें निकलती हैं जो इकठ्ठी होकर अंतरिक्ष से पृथ्वी में समाकर प्राकृतिक आपदाओं का कारण बनती हैं।
वेद में जिस प्रकार धर्म का आधार यज्ञ है, यज्ञ का आधार वेदमंत्र एवं हवि है। मंत्र ब्राह्मण में सुरक्षित तथा हवि गौ में, वेद तथा धर्म ग्रंथों में माने गये हैं। इन दोनों का एक ही कुल है। इस प्रकार वैदिक धर्म-कर्म आदि का मूलाधार गौ एवं ब्राह्मण को ही माना गया है। इन बातों से यह स्पष्ट हो जाता है कि गौरक्षा भारत राष्ट्र की आर्थिक व धार्मिक सुव्यवस्था के लिए अनिवार्य होनी चाहिए। गौ प्रेमी, गौभक्त सज्जनों को इसके लिए आगे आना चाहिए।
गाय का दुग्ध, दधि, घृत, तक्र आदि पेय स्वास्थ्यवर्धक एवं सर्व रोग निवारक हैं। गौमूत्र में गंगा तथा गोबर में लक्ष्मी का निवास है। इन दोनों से अनेक उदर, चर्म, रक्तादि दोष नष्ट होते हैं तथा अनुपम खाद, पंचगव्य से देह के तत्व, अस्थिगत दोषों के निवारण एवं आत्मशुद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है। हिन्दू संस्कृति के मूल प्रत्येक संस्कार में गौदान होना चाहिए जिससे इस वंश की वृद्धि सम्भव हो सके। प्रत्येक तपोव्रत, योगादि के पूर्व यह अत्यावश्यक है। किसी भी देव पूजन व प्राण प्रतिष्ठा के समय गौ दुग्धादि पंचामृत अनिवार्य है। वैतरणी तरणार्थ गौदान तथा श्राद्ध कर्म, व्रतोत्सर्ग ये हिन्दुओं के महत्वपूर्ण कत्र्तव्य हैं।
गोक्षर, श्रृंग, पुच्छ तथा रोम-रोम में अपरिगणित देवता, कुल पर्वत, तीर्थ विद्यमान हैं, अन्य मंदिरों व धार्मिक स्थलों की परिक्रमा से सीमित देवताओं की ही परिक्रमा का फल मिलता है जबकि गाय माता की परिक्रमा मात्र से सभी तैतीस करोड़ देवताओं, तीर्थों आदि की परिक्रमा हो जाती है।
आज मैं महसूस कर रहा हूं कि गौवंश ही भारत की राष्ट्र संस्कृति, धर्म सभ्यता तथा सम्मान का केन्द्र बिन्दु है। केन्द्र सरकार को चाहिए कि गौवंश हत्या बंदी कानून बनाकर सम्पूर्ण भारत में लागू किया जाए और इनकी हत्या करने वालों को कठोर दंड की व्यवस्था की जाए। गाय रक्षा से ही देश-धर्म का हित हो सकेगा। सभी राजनीतिक दलों, सामाजिक संस्थाओं, सामाजिक संगठनों को गौवंश की रक्षा के लिए आगे आना चाहिए।
 
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