विशेष लेख
Date : 15-May-2012
आओ आंसू बहा लें—लोकतंत्र शर्मसार हुआ और मीडिया नीलाम
आदित्य चोपड़ा
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, हम इस पर सबसे ज्यादा नाज भी कर सकते हैं। इसके साथ ही सबसे ज्यादा शर्मनाक बात यह है कि सबसे बड़ा भ्रष्ट तंत्र भी इसी लोकतंत्र में है। इसी लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ को प्रैस का नाम दिया गया है, जिस पर सरकारी तंत्र का प्रेशर इतना ज्यादा है कि वह बड़ी मुश्किल से अपने कत्र्तव्य का निर्वहन कर पा रहा है। दु:ख इस बात का है कि देश में लोकतंत्र का सच्चा प्रहरी होने की कीमत भी सबसे ज्यादा प्रैस ने ही चुकाई है। जमीनी सच तो यह है कि पंजाब केसरी जैसे अखबार ने देश की रक्षा, एकता और अखंडता के लिए अपने बलिदानों के दम पर एक मिसाल पैदा की है। हमारे परम आदरणीय लाला जगत नरायण जी, दादा श्री रमेशचन्द्र जी ने आतंकवादियों की गोलियां खाना मंजूर कर लिया, परन्तु समझौते से इन्कार कर दिया। इस गौरवपूर्ण दास्तान जिसमें इस अखबार के 140 और लोगों का बलिदान छिपा है, के बारे में पाठक जानते हैं। दु:ख इस बात का है कि जिन प्रैस वालों ने अपने प्राणों की बाजी लगाई आज लोग प्रैस को स्टेटस सिम्बल समझ कर एक धंधे के रूप में चलाने लगे हैं। प्रैस को नैतिकता और कत्र्तव्य परायणता में सबसे बड़े आदर्श के रूप में स्थापित करने वाले लोग आज जैसे-तैसे अपना काम कर रहे हैं। वहीं आज बिल्डर, उद्योगपति तथा बड़े-बड़े व्यापारी मीडिया की दुनिया में उतर आए हैं। हालांकि यह चर्चा हमारे घरों में अक्सर होती रहती है लेकिन एक मौके पर पूर्व एचआरडी मंत्री और भाजपा के वरिष्ठï नेता श्री मुरली मनोहर जोशी से चर्चा चल पड़ी तो मेरे लिए उनका हर शब्द चौंकाने वाला था। कुल मिलाकर इस बातचीत का निष्कर्ष यही निकला कि आज मीडिया खतरे में है। बात अखबारी दुनिया की हो या इलैक्ट्रानिक मीडिया की हर तरफ बड़े-बड़े औद्योगिक घराने उभरने लगे हैं। जब यह लोग अखबारों और चैनलों के मालिक बन जाएंगे तो वे केवल अपने हितों के बारे में ही सोचकर मनमर्जी करेंगे। दुर्भाग्य से आज यही हो रहा है। किसी भी खबर को अपने लाभ के लिए यह लोग तरोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करते हुए प्रैस की आन-बान और शान को दांव पर लगा रहे हैं। जिन लोगों ने कुर्बानी देकर प्रैस का नाम रोशन किया, उसी से पूरी प्रैस का सिर गर्व से उठा लेकिन इसे कैश करने वालों ने मौका उठाकर मीडिया को खरीद लिया। आंकड़े गवाह हैं कि मीडिया और चैनलों में उद्योगपतियों ने नेताओं को अपने राजनीतिक हितों के लिए इस्तेमाल करना एक रिवाज बना लिया है। क्या हमारी सरकार इस दिशा में कुछ करना चाहेगी या हमेशा की तरह चुप रहकर अपना कत्र्तव्य निभाएगी? जो उद्योगपति केवल एक-एक परसैंट के लाभ को सामने रखकर अपना व्यापार चलाते हैं, वे मीडिया को बिकाऊ बना कर अपने हर काम राजनीतिक दलालों की तरह ही करते रहेंगे। ऐसे मीडिया को अपने इशारे पर चलाने वाले प्रोपर्टी डीलर और बिल्डर जब चाहें दलालों को राजनीति के गलियारों में इस्तेमाल कर रहे हैं। जब मीडिया के मालिक ही ऐसे लोग होंगे तो भूमि की भी खैर कहां। जमीनों पर कब्जे करने वाले ऐसे मीडिया मालिक अब भूमाफिया बनकर कलम को नीलाम कर रहे हैं। भारत माता के रखवाले पत्रकार जो कलम के दम पर जंग लड़ते थे, अब अपने भूमाफिया मालिकों के दम पर 'दलाली' करेंगे। वाह रे भारत, यहां मीडिया ने यह दिन भी देखना था।
वक्त का तकाजा यही है कि मीडिया के हितों की रक्षा करनी जरूरी है लेकिन सरकार भी खामोश रह कर इन चंद भूमाफिया तथा प्रोपर्टी डीलरों की अब प्रैस मालिक के रूप में खातिरदारी कर रही है। बजाय इसके कि कोई कानून बना कर ऐसी व्यवस्था पर शिकंजा कसा जाए। अगर हम ऐसे पत्रकारों का उल्लेख करें जो अब संसद में पहुंच चुके हैं और आजकल राजनीतिक ठेकेदारी कर रहे हैं तो पूरा कालम भर जाए। एक महोदय दो दशक पहले पत्रकार थे। बाद में लोगों के इंटरव्यू कवर करने की कीमत वसूली और चोर दरवाजा 'राज्यसभा' से सांसद बन गए। इस काम में मदद पहले बसपा की ली गई फिर निर्दलीय विधायकों से गेम सैट की गई। तो हमारे यह पत्रकार राज्यसभा पहुंचे।
इसी कड़ी में ऐसे अनेक पत्रकार हैं जो बिल्डर लाबी के दम पर संसद पहुंचे हुए हैं। यह लोग अपने हितों के लिए सेज तहत जमीनों की खरीद-फरोख्त नेताओं से साथ मिलकर कर रहे हैं। तभी तो यूपी के नोएडा, गाजियाबाद, मेरठ और दिल्ली, सोनीपत तक जमीन के भाव आसमान पहुंचा दिए गए हैं। अखबारों, चैनलों में यह लोग खबरें प्लांट करवाते हैं कि कहां पर जमीन खरीदना मुनाफे का सौदा और कहां घाटे का सौदा। ऐसी सूरत में भूमि की कीमत संबंधी राष्ट्रीय नीति कैसे बनेगी और कौन बनाएगा। जब बिकाऊ लोग संसद में बैठे हैं तो राष्ट्रीय नीतियों की आवाज कौन उठाएगा। यह काम हमारी राष्ट्रीय प्रैस कर रही है इसे रोकना होगा।
सरकार इन लोगों तथा इनके कार्यों की पैरवी कर रही है। अगर कोई सख्त कानून बना लिए जाएं तो ऐसी प्रवृत्ति को रोक सकती है, लेकिन मीडिया अब अपराधियों के हाथों में आ चुका है। लिहाजा देश की आबरू के साथ-साथ कलम का भविष्य भी खतरे में है।
आज मीडिया हाऊसों के 'सरदार' ऐसे सरमाएदार लोग बन चुके हैं जो रोड कन्स्ट्रक्शन का काम कर रहे हैं या फिर माइन्स का धंधा कर रहे हैं, ऐसे लोग किसी के सगे नहीं हो सकते। वे जिस पार्टी के टिकट से लोकसभा या राज्यसभा पहुंचेंगे, उन्हीं के हितों की रक्षा करेंगे, कानून या प्रैस की आजादी की रक्षा के लिए नए विधेयक की चिंता उन्हें कहां होगी? ऐसी सूरत में प्रेस की रक्षा कौन करेगा? जिस पार्टी का ऐसा एमपी होगा वह अपने हितों की खातिर पूरे मीडिया को बेच डालेगा और बदनाम वो प्रैस वाले भी हो जाएंगे जो ईमानदारी से अपना कत्र्तव्य निभा रहे हैं। अनेक हिन्दी व अंग्रेजी अखबारों तथा चैनलों के मालिक ऐसे ही माइन्स, रोड निर्माण तथा अन्य ट्रांसपोर्ट का धंधा कर रहे हैं वे प्रैस के सम्पादक बनकर या जिस पार्टी के रहमोकरम पर एमपी बने हैं, वे लोकतंत्र को रोज बदनाम कर रहे हैं। ये लोग चंद मंत्रियों के पिट्ठू बनकर सरकारी नीतियां नहीं बनने देंगे। एक अंग्रेजी अखबार ने पिछले दिनों एक एमपी के माध्यम से बड़े-बड़े खुलासे किए और तीन दिन बाद दूसरे नेता के माध्यम से सब कुछ नए खुलासे कर दिए और पहले वाले खुलासे को एकदम पलट कर रख दिया। यह नई व्यवस्था विशुद्ध रूप से ब्लैकमेलिंग पर आधारित है तथा इसे बदलना होगा। जमीन-जायदाद का धंधा करने वाले लोग कलम के मूल्य व योगदान को प्रजातंत्र में बिचौलियों के हाथों खुद लोकसभा व राज्यसभा में अपने एमपी भेज कर बेच डालेंगे। ऐसे ही लोग आज मीडिया के संचालक बन रहे हैं तो ईमानदार पुराने सम्पादक कहां कैसे चल पाएंगे? खबरें जब-जब ब्रेक होंगी तो उनके मालिकों के राजनीतिक हित सामने आएंगे। देश में सैकड़ों नेताओं ने मीडिया व चैनल मालिकों को खरीद कर ठेकेदारी प्रथा को जन्म दिया है तथा इस परिपाटी को संसद तक पहुंचा दिया है लेकिन इसे रोकना होगा।
उस दिन श्री मुरली मनोहर जोशी जी से ये बातें अपनेपन के नाते हो रही थीं, जिनसे उपरोक्त निष्कर्ष ही निकलता है वह पूरे भारतीय लोकतंत्र में एक बेहद सुलझे हुए राजनीतिज्ञ तथा ईमानदार नेता हैं जो देश के प्रजातंत्र में नैतिकता की ज्योति को प्रज्ज्वलित कर रहे हैं। नई पीढ़ी को अच्छी परम्परा व राजनीतिक पवित्रता की घुट्टी पिलाने की उनकी सीख में दम है परन्तु यह तभी सम्भव होगा जबकि मौजूदा एमपी प्रैस की रक्षा के लिए नया कानून बनाएं। आज वह ऐसी पहल को व्यावहारिक रूप देने के लिए कृतसंकल्प हैं।
13 मई, 1952 को संसद की सरंचना के वक्त स्वतंत्र भारत के राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद ने कहा था—''यह प्रथम अवसर है कि जब समस्त देश का शासन एक प्रजातंत्रीय शासन प्रणाली के अन्तर्गत आया है। देश के इतिहास में यह समय अभूतपूर्व है। इस गणराज्य और संसद की स्थापना स्वतंत्रता के बाद ही हो सकती थी, अत: इस स्वतंत्रता की रक्षा करना प्रत्येक भारतीय का कर्तव्य है। हमारे गणराज्य की नींव हमारे संविधान में सन्निहित है। हमारे इतिहास में अनेक बार देश के विभिन्न भागों में गणराज्यों की स्थापना की गई है किन्तु उनका विस्तार अल्प ही था।
हमारी यह बलवती इच्छा है कि हमारे देश के नागरिकों का स्तर ऊंचा हो। हमें स्मरण रखना चाहिए कि हमारी समस्त विकास योजनाएं हमारी स्वतंत्रता की रक्षा पर ही निर्भर करती हैं। हमारा समस्त जीवन सामाजिक और वैयक्तिक, इस स्वतंत्रता पर आश्रित है।'' परन्तु अभी सांसद अपना कत्र्तव्य भूलकर नोट कमा कर मीडिया को इस्तेमाल कर रहे हैं। इसी कड़ी में 13 मई, 1952 को देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने कहा था—''संसदीय प्रणाली में न केवल सशक्त विरोधी पक्ष की आवश्यकता होती है, न केवल प्रभावोत्पादक ढंग से अपने विचार व्यक्त करना होता है, बल्कि सरकार और विरोधी पक्ष के बीच सहयोग का आधार भी अत्यावश्यक होता है। किसी एक विषय के संबंध में ही सहयोग काफी नहीं है, बल्कि संसद के काम को आगे बढ़ाने का आधार परस्पर सहयोग ही है और जहां तक हम ऐसा करने में सफल होंगे, वहां तक हम संसदीय तंत्र की ठोस नींव रखने में भी सफल होंगे। संसद का सदस्य किसी क्षेत्र विशेष का सदस्य नहीं होता बल्कि पूरे देश का सदस्य होता है। भारत की सेवा का अर्थ लाखों-करोड़ों पीडि़त लोगों की सेवा करना, इसका मतलब है गरीबी और अज्ञानता को मिटाना, अवसर की असमानता को मिटाना, हमारी पीढ़ी के सबसे महान व्यक्ति की यही महत्वकांक्षा रही है कि हर आंख से आंसू मिट जाएं।'' जबकि इसी कड़ी में लोकतंत्र के सार के रूप में ऋगवेद का एक उदाहरण इस प्रकार उद्धृत किया गया था—
''संगच्छध्वं संवदध्वं, सं वो मनांसि जानताम्।
देवा भागं यथा पूर्वे, संजानाना उपासते।''

अर्थात् ''हम सब साथ-साथ चलें, प्रेमपूर्वक बातचीत करें, हमारे मन शांत भाव से विचारों में लीन हों। जिस प्रकार हमारे विद्वान पूर्वज अपने-अपने भाग में आने वाली धन-संपदा को परस्पर सहमति और समता के आधार पर प्रसाद के रूप में ग्रहण किया करते थे, उसी प्रकार हम भी एकमत होकर अपना-अपना अंश सहर्ष स्वीकार करें।''
ये उपरोक्त उदाहरण लोकसभा के गठन के वक्त के थे लेकिन आज सब कुछ अनैतिकता, भ्रष्टाचार व ब्लैकमेलिंग की भेंट चढ़ गया है। फिर भी हम संसद की 60वीं जयंती मना रहे हैं लेकिन डा. राजेन्द्र प्रसाद, पंडित नेहरू ने जो कल्पना संसद गठन पर की थी या ऋगवेद के जो श्लोक लोकतंत्र की पवित्र बुनियाद रखे जाने के वक्त उद्धृत किए गए थे, उनका मूल्य आज खत्म हो गया है।
भाड़े के राजनेता अखबारों के मालिक बनकर प्रैस के हित रौंद चुके हैं। संसद की 60वीं जयंती मनाने वालो उठो और आंसू बहा लो कि इसी लोकतंत्र को प्रैस के मालिक बने बैठे चंद नेताओं ने शर्मसार तथा बिकाऊ बनाकर देश व प्रैस की आजादी पर प्रश्रचिन्ह लगा दिया है। हे ईश्वर, हे भारत माता इस देश को सफेदपोश व नेतागिरी पर उतारू मीडिया हाऊसों से बचा लो।
 
Visitor No. Free Counters