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किसी भी देश की उन्नति और खुशहाली इस बात पर निर्भर करती है कि उसका राजनीतिक ढांचा कैसा है। हालांकि जिस तरह से भारत का राजनीति के क्षतिज पर एक लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में नाम है उसे देखकर हर कोई कह सकता है कि भारत बहुत खुशहाल है। काश! यह खुशफहमी बनी रहे। सच बात तो यह है कि भारत की खुशहाली पर आज असुरक्षा का ग्रहण हैं। यह क्यों हो रहा है? इस सवाल का जवाब सरकारों को देना होगा। प्रधानमंत्री के नेतृत्व में जो मंत्री काम कर रहे हैं वह घोटालों में लिप्त हैं और राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे में है। राष्ट्रीय सुरक्षा की जब हम बात करते हैं तो हर किसी को यह बात आसानी से समझ में आ सकती है कि कमजोर गृहमंत्री की अक्षम कार्यशैली से कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक खतरा ही खतरा है। अगर जम्मू-कश्मीर से लेकर देश के विभिन्न भागों में आतंकवादियों ने अपना खूनी खेल खेला है तो उड़ीसा, बंगाल, बिहार, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और झारखंड तक माओवादी हिंसा पर उतारू हैं। वे जब चाहें मानवता का खून बहा देते हैं। पिछले दिनों माओवादियों ने सरकार पर दबाव बढ़ाने के लिए एक अनोखी रणनीति इजाद की किसके तहत मौजिज लोगों का अपहरण कर उसके बदले में अपनी मांगें पूरी करवाने का सिलसिला चल निकला है। देश के गृहमंत्री पी. चिदम्बरम खामोश हैं। अगर सही मायनों में नक्सली खूनी खेल खेल रहे हैं तो इसके लिए पिछले तीन वर्ष से चिदम्बरम की कमजोर पैरवी है। वह अपने दायित्व पर खरे नहीं उतर रहे।
हालांकि माओवादी आज सत्ता का ख्वाब देख रहे हैं। हम कहना चाहते हैं कि माओवादी अगर यह समझ रहे हैं कि आतंक के भय से लोग उनके कुतर्कों को सही मानने लगेंगे तो ऐसा कदापि सम्भव नहीं। जो न्यायसंगत नहीं है उसे कोई भी सभ्य समाज किसी भी परिस्थिति में स्वीकार नहीं कर सकता। परिवर्तन उस तरह से बिल्कुल भी नहीं आ सकता जैसे नक्सली संगठन चाह रहे हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था एवं उसके संचालन में कुछ खामियां हो सकती हैं और वे हैं भी, लेकिन नक्सलियों की व्यवस्था तो विनाश का पर्याय है। वह मानवीय मूल्यों का निरादर और सभ्य समाज के तौर-तरीकों का दमन करने वाली है। इसमें दो राय नहीं हो सकती कि प्रारम्भ में नक्सली संगठनों ने शोषण और असमानता के खिलाफ आवाज उठाने के साथ देश का ध्यान इस ओर आकर्षित किया कि विकास के नाम पर किस तरह निर्धन तबके की ओर अनदेखी हो रही है, लेकिन अब तो वे खुद ही विकास के सबसे बड़े शत्रु बन गए हैं। वे स्कूलों, पुलों, रेल पटरियों आदि को ध्वस्त तो कर ही रहे हैं, यह भी सुनिश्चित कर रहे हैं कि विकास और जनकल्याण की कोई भी योजना आगे न बढऩे पाए। चूंकि नक्सलियों के पास अपनी विजातीय-विचित्र विचारधारा के पक्ष में कोई ठोस तर्क नहीं इसीलिए वे बातचीत के हर प्रस्ताव से भी दूर भागते हैं या ऐसी शर्तें लेकर आ जाते हैं कि वार्ता सम्भव ही न हो सके।
जिस तरह से इतालवी नागरिकों का अपहरण किया उन्हें रिहा किया। इसके बाद बीजद विधायक का अपहरण किया गया और शर्तें रखकर उन्हें रिहा किया गया। इसके बाद कलैक्टर का अपहरण और रिहाई तथा जवाब में माओवादियों की हर मांग पूरी की जा रही है। ऐसा होता देखकर गृहमंत्री चिदम्बरम चुप क्यों हैं।
यह सारी नाकामी अक्षम गृहमंत्री चिदम्बरम की ही देन है। यह आवश्यकता न जाने कब से महसूस की जा रही है कि पुलिस और खुफिया एजैंसियों को सक्षम बनाया जाए, लेकिन वे करीब-करीब पहले की तरह बदहाल हैं और कोई भी नेता यह बताने के लिए तैयार नहीं कि ऐसा क्यों है? हालांकि सभी जानते हैं कि जब तक पुलिस और खुफिया एजैंसियों का राजनीतिक इस्तेमाल नहीं रुकता तब तक हालात सुधरने वाले नहीं हैं, फिर भी सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग कोई पहल करने के लिए तैयार नहीं।
सुरक्षा के नाम पर खुफिया तंत्र का यह राजनीतिक इस्तेमाल कब रुकेगा, हमें इसका जवाब चिदम्बरम से चाहिए। जिस देश में संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु और 26/11 के गुनाहगार को जेल में बंद कर राजनीति की जाती रही हो और फांसी न दी जा रही हो तो उस देश में आतंकी हमले होते रहेंगे।
हम तो यही कहेंगे कि देश के नेताओं को इस पर गहराई से विचार करना चाहिए कि आतंकियों का दुस्साहस क्यों बढ़ता जा रहा है, लेकिन वे ऐसा करने से इन्कार कर रहे हैं। शायद इसी कारण अमरीका पाकिस्तान के खिलाफ जो भी कड़ाई बरत रहा है वह केवल अपने हितों को ध्यान में रखकर। भारत इस कूटनीतिक मोर्चे पर कुछ भी समझ नहीं पा रहा है। वह पाकिस्तान प्रेरित-प्रायोजित भारत विरोधी आतंकी गतिविधियों को गम्भीरता से लेने के लिए तैयार नहीं। भारत को सोचना होगा कि आखिर ऐसा क्यों है? आतंकवाद से लडऩे के भारत के ढुलमुल तौर-तरीकों से दुनिया को यह संदेश भी जा रहा है कि भारतीय शासक आतंकवाद को जड़ से समाप्त करने की इच्छाशक्ति नहीं रखते। आंतरिक सुरक्षा के नाम पर देश के गृहमंत्री ने हर आतंकी वारदात के बाद घाटी, मुम्बई और छत्तीसगढ़ तथा गढ़चिरौली के दौरे तो किए होंगे परन्तु उन्होंने इन हमलों के लिए नैतिक जिम्मेवारी नहीं कबूली। यह लापरवाही देश के सामने है और आतंरिक सुरक्षा की जिम्मेवारी वह निभा नहीं पा रहे हैं तो अब इस्तीफा क्यों नहीं देते? उन्हें देश से माफी मांग कर सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकार को वापस सौंप कर कोई और काम करना चाहिए। अगर वह ऐसा करते हैं तो उनका पश्चाताप हो जाएगा, लिहाजा भारत सुरक्षित भी रह सकेगा।
हम राजनीतिक कत्र्तव्य परायणता और इच्छशक्ति की बात करते हैं। देश का गृह मंत्रालय क्या कुम्भकर्णी नींद में है? जम्मू-कश्मीर से फौज को हटाकर बैरकों में भेजने के काम को अपनी ड्यूटी के रूप में निभाने वाले गृहमंत्री श्री पी. चिदम्बरम अब कहां हैं? यह जानते हुए भी कि नक्सलियों और आतंकियों को अपनी योजनाओं में तेजी लाने का मौका उस दिन से मिला है जिस दिन से श्री चिदम्बरम ने गद्दी सम्भाली है, हमारी सरकार ने इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया। इस कड़ी में महत्वपूर्ण बात यह है कि जब मुम्बई पर आतंकी हमला हुआ तो दो दिन बाद देश के गृहमंत्री शिवराज पाटिल से इस्तीफा ले लिया गया था, परन्तु श्री चिदम्बरम के कार्यकाल के दौरान कितने नक्सली और कितने आतंकी हमले हुए और कितने लोग मारे गए। क्या यह हिसाब-किताब सरकार के पास नहीं है? अलर्ट के बावजूद आतंकी वाराणसी में ब्लास्ट कर अपना काम कर जाते हैं। उनका मकसद तो खून-खराबा ही था। इस कड़ी में आज भी 40 लोग विभिन्न अस्पतालों में उफचाराधीन हैं। श्री चिदम्बरम को उनसे मिलकर बहुत दुख हुआ है, परन्तु इन्हीं चिदम्बरम साहब के कार्यकाल के दौरान 200 से ज्यादा सीआरपीएफ जवानों को नक्सली मार चुके हैं। क्या चिदम्बरम साहब इस सारे मामले में नैतिक जिम्मेदारी लेंगे? क्या सरकार उन्हें भी शिवराज पाटिल की तरह चलता करेगी? श्री चिदम्बरम जब तक वित्त मंत्री थे तब तक अर्थव्यवस्था का भट्टा बैठाया और अब गृहमंत्री हैं तो सुरक्षा का बेड़ा गर्क कर रहे हैं। हालात यह हैं कि आतंकियों के हौसले बुलंद हैं। कश्मीर से फौज हटाने के बाद आतंकियों ने सुरक्षा बलों के खिलाफ एकतरफा लड़ाई छेड़ रखी है और हमारी सरकार चुप है। इस सारे हालात के लिए कौन जिम्मेदार है?
दुनिया में हर देश में जहां-जहां आतंकवादियों ने खूनी खेल खेला वहां-वहां सरकारों ने मुंहतोड़ जवाब दिया। अमरीका, ब्रिटेन और रूस ने आतंकवादियों की एक न चलने दी। लेकिन यह भारत ही है जहां आतंकवादी जहां चाहे जब चाहे खूनी खेल खेल सकते हैं। चिदम्बरम जवाब दें और सरकार अब क्यों उन्हें चलता नहीं कर रही। विशेष रूप से माओवादियों ने जिस प्रकार से एक रणनीति अपहरण की चला रखी है उसे देखकर भी उन्होंने काई सबक नहीं लिया।
उल्टा राज्य सरकारों से यह पूछने की बजाय कि माओवादियों की मांगें पूरी क्यों की जा रही हैं वह केवल एनसीटीसी लागू करना चाहते हैं। वह भ्रष्टाचार को लेकर संसद तक में घिर चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट में उनके खिलाफ सुब्रह्मण्यम स्वामी ने भ्रष्टाचार के मामले में ही याचिका लगा रखी है। ऐसे गृहमंत्री को सरकार क्यों ढो रही है। हमें इसका जवाब चाहिए। यह जवाब कब मिलेगा, देशवासी बार-बार यही पूछ रहे हैं। |