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हमारे देश में कुछ भी हो सकता है, कोई कुछ भी कर सकता है। मंत्री से लेकर संतरी तक हर किसी को कुछ भी करने की छूट है। मेरा भारत महान कहने वाले तथा यह नारा देने वाले लोग देश की आंतरिक स्थिति के बारे में सोचते नहीं हैं और राजनीतिज्ञ मनमर्जी से भ्रष्टाचार को ही बढ़ावा दे रहे हैं। न नीति है और न सरकार की नीयत ही कहीं दिखाई दे रही है। सोने की चिडिय़ा कहे जाने वाले देश में सोने के दर्शन भी दुर्लभ होते जा रहे हैं। क्या लुटेरे, क्या पुलिस, क्या नेता और क्या धर्म गुरु सबके सब एक हो गए हैं। इनमें भेद खत्म होकर रह गया है। पिछले एक दशक से देश का हिसाब-किताब ज्यादा ही गड़बड़ा गया है। पहले दौर में हमने देखा कि सरकारों की शह पर घोटाले किए गए। मंत्री और अफसरशाह अपने-अपने काम को अंजाम देने में लगे रहे। इसके बाद आम आदमी सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ। देश में मंत्रियों तथा नौकरशाहों का अपने काम पर ध्यान नहीं था तो हालात बिगडऩे लगे लेकिन भटकते लोगों को दिशा दिखाने का बीड़ा दिखाने वाले बाबुओं ने संतों व गुरुओं की भूमि कहे जाने वाले भारत को कलंकित कर डाला। इस कड़ी में हाल ही में निर्मल बाबा के बारे में किस्से सुनने को मिल रहे हैं। क्या एक आम आदमी, जो निर्मलजीत सिंह नरुला के रूप में जीवन बिताता है और अचानक उसे दैवीय शक्ति मिल जाती है। लोग उस पर मेहरबान होकर धन लुटाते हैं। भगवान की खास ताकत बनकर एक साधारण व्यक्ति निर्मल बाबा बन जाता है। लोगों की समस्याएं, दु:ख-दर्द दूर करने के लिए यह निर्मल बाबा बहुत ही हास्यास्पद उपाय बताते हैं। शुगर की बीमारी से ग्रसित व्यक्ति अपना दु:ख-दर्द बाबा के समक्ष बयान करते हैं तो बाबा कहते हैं कि जाओ खीर खाओ, जाओ रसगुल्ले खाओ। किसी व्यक्ति के दु:ख-दर्द क्या माता वैष्णो देवी गुफा जाकर 500 रुपए चढ़ाने से दूर किए जा सकते हैं? साथ ही शर्त यह भी रख दी जाती है कि भैरो बाबा पर भी 200 रुपए दर्शन वापसी पर जरूर चढ़ाए जाएं। ऐसे में वही भक्त कहता है कि वह वैष्णो देवी जाकर पहले ही ऐसा कर चुके हैं, परन्तु उसका दु:ख-दर्द दूर नहीं हुआ। हमारा सवाल यह है कि जो भगवान, जो देवी मां सबको अपनी कृपा दृष्टि देते हैं, सुख-समृद्धि भेंट करते हैं तो उस भगवान या देवी प्रतिमा पर हमें रुपए चढ़ाने की जरूरत क्या है। उस पत्थर की प्रतिमा पर चढ़े हुए रुपए तो वही इंसान ले जाएगा जो इस प्रतिमा को सजा संवारकर नित्य धार्मिक क्रिया करता है। प्रभु को पाने के लिए उसकी कृपा के लिए हमें किसी मध्यस्थ या दलाल की जरूरत नहीं है। जो हमें प्रभु की कृपा दिलाने का वायदा करता हुआ आपसे 'लाभ' की मांग करता है, वह बाबा कैसे हो सकता है? वह खुद को भगवान कैसे मान सकता है। न उसकी वाणी में तेज है, न वेद मंत्रों का ज्ञान परन्तु वह इंसान समाना मंडी (पंजाब) में अपने कारोबार का जिक्र करते हुए दैवीय शक्ति मिलने की बात विभिन्न चैनलों पर बार-बार कहता है। परन्तु देश के सैकड़ों नेता व अफसरशाह सब चुप हैं। सरेआम लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ करने वाले व चढ़ावा मांगने वाले बाबाओं और उनकी टीम के खिलाफ सीधा केस दर्ज कर कार्रवाई क्यों नहीं की जाती? सरकार की हालत यह है कि उसके मंत्री व अफसरशाह बाबाओं पर मेहरबान हैं। उन्हें आश्रमों के लिए जमीन अलाट करवाने के लिए वे जान मारते हैं। क्या इस काम के बदले उन्हें इसका हिस्सा मिलता है?
दु:ख इस बात का है कि राष्ट्रपति भवन भी इससे अछूता नहीं रहा। पुणे में प्रतिभा पाटिल ने अपनी रिटायर्डमैंट के बाद 5 एकड़ का एक भूखंड कथित रूप से अपने नाम करवा लिया। यह आरोप पुणे में एक पूर्व सैनिक संस्था ने लगाया है, जिसमें कहा गया है कि राष्ट्रपति अपनी रिटायर्डमैंट के बाद 5 एकड़ के भवन में रहना चाहेंगी। इस संस्था का नाम है जवानों के लिए इंसाफ और यह संस्था ग्रीन थंब एनजीओ का ही भाग है और उक्त आरोप रिटायर्ड कर्नल सुरेश पाटिल ने लगाया है। उन्होंने ही इस मामले में आरटीआई के माध्यम से सरकारी रिकार्ड खंगाले और फिर इस चौंकाने वाले सत्य को जनता के सामने रख दिया। पुणे के खाडकी छावनी इलाके में 2.60 लाख स्क्वेयर फुट जगह पहले ही श्रीमती प्रतिभा पाटिल को अलाट कर दी गई। इस फौजी अफसर का दावा है कि 4500 स्क्वेयर फुट क्षेत्र तो पहले ही निर्मित हो चुका है ताकि ब्रतानवी लुक दिया जा सके। पूर्व फौजी अधिकारियों ने सवाल किया है कि आखिरकार इतना बड़ा भूखंड श्रीमती प्रतिभा पाटिल को क्यों अलाट किया गया। सबसे बड़ी बात तो यह है कि क्या देश में सर्वोच्च पद पर बैठकर आप किसी को भी मूर्ख बनाकर भूमि का एक खंड अपने नाम अलाट करवा सकते हैं तो इसकी वजह बताई जाए। हालांकि राष्ट्रपति भवन ने इस मामले में नियमों का उल्लंघन किए जाने से इंकार किया है, परन्तु हमारा सवाल यह है कि इतना बड़ा भूखंड एक राष्ट्रपति को और वह भी तब जबकि वह रिटायर्ड हो रही हों, को अलाट किए जाने की वजह क्या है। कर्नल पाटिल ने बताया कि उन्होंने आर्मी की दक्षिणी कमान को पत्र लिखकर सारे क्षेत्र की फैंसिंग कराने की अपील की परन्तु उन्हें कोई रिसपांस नहीं मिला। इधर राष्ट्रपति भवन के प्रवक्ता अर्चना दत्ता ने कहा कि जिस भूमि की बात की जा रही है वह प्रतिरक्षा विभाग की भूमि है। भूमि को किसी व्यक्ति को ट्रांसफर करने का सवाल ही पैदा नहीं होता। उन्होंने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि यह भवन राष्ट्रपति के पास उनके जीवन तक रहेगा और उसके बाद वापस प्रतिरक्षा विभाग को लौटा दिया जाएगा।
हम यह कहते हैं कि एक राष्ट्रपति को रिटायर्डमैंट के बाद आखिरकार इतना बड़ा भूखंड क्यों अलाट किया जा रहा है। कल अगर देश के अन्य मंत्री भी अपनी सरकार को जाती देखकर कोई ऐसी ही इच्छा जाहिर कर दें और फिर भूमि पर अपने सरकारी अंदाज से कब्जा करवा दें तो इसे क्या कहेंगे। हम राष्ट्रपति का सम्मान करते हैं और व्यक्तिगत रूप से हम इस पर आरोपबाजी में कोई विश्वास भी नहीं रखते, परन्तु यह भी तो सच है कि इस देश में हमारे नेताओं ने ही भूमि पर कब्जों के लिए कितने ही उन बाबाओं की मदद की है जो धर्म प्रसार के लिए आश्रम खोलना चाहते थे। धीरेन्द्र ब्रह्मचारी से लेकर निर्मल बाबा तक अगर सबके आश्रमों और भूमि का हिसाब-किताब सामने लाया जाए तो हर किसी के पीछे नेताओं की सिफारिश ही नजर आएगी। हम तो यह कह रहे हैं कि अगर राष्ट्रपति चाहते तो बाबाओं के लिए भूमि की सिफारिश करने वाले नेताओं के कृत्य पर वह रोक जरूर लगा सकते हैं। पर यहां तो राष्ट्रपति ने खुद इच्छा व्यक्त कर दी कि उन्हें रिटायर्डमैंट के बाद पुणे में भूखंड अलाट कर दिया जाए और दु:ख इस बात का है कि यह काम कर भी दिया गया।
ऐसी सूरत में भूमि पर कब्जों को हटाने का काम कौन करेगा? रही बात बाबाओं की तो सैकड़ों और हजारों बाबा कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक आयकर से लेकर अन्य एजैंसियों तक की पूछताछ के घेरे में हैं। धरती पंजाब की हो या हरियाणा की, मध्य प्रदेश की बात हो या उत्तर प्रदेश की, आंध्र की धरती हो या असम की, उत्तराखंड की जमीन हो या हिमाचल की। यह बात तो सच है कि धर्म गुरुओं ने नेताओं के साथ मिलकर अपना रैकेट चला रखा है। इसे खत्म करने की बजाय प्रोत्साहन दिया जाता रहेगा तो फिर देश की सुध कौन लेगा?
यह बÞत ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश में हर राज्य खासकर दिल्ली में बाबाओं का मकडज़ाल फैल रहा है। सबकी राज्यों में सैटिंग है तथा दिल्ली में दर्जनों बाबा, जो कथावाचक बनकर लोगों के दु:ख-दर्द दूर करने के लिए 'लायजनिंग' कर रहे हैं, उनके मध्यस्थ बनकर नेताओं को अपने यहां बुलाकर प्रोजैक्ट करते हैं कि यह मंत्री हमारे साथ हैं। कई आश्रम चलाने वाले लोग नेतागिरी कर रहे हैं। तभी तो राष्ट्रपति भवन तक आंच जा पहुंची है।
इतना ही नहीं एक नगर पालिका चुनावों के दौरान राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के बेटे और कांग्रेस विधायक राव साहिब शेखावत के अमरावती में जब्त एक करोड़ रुपया महाराष्ट्र कांग्रेस के गले की फांस बन गया था। खुद जिला अधिकारी की ओर से नोटिस जारी किया गया था, बताते हैं कि विपक्ष के तीखे आरोपों के बाद शेखावत ने खुद यह कहा था कि मुझे यह पैसा पार्टी के उम्मीदवारों में बांटने के लिए दिया गया था। परन्तु सर्वोच्च पद पर बैठे राष्ट्रपति का पुत्र राजनीति में सक्रिय है और अगर उसके पास से बेहिसाबी नकदी मिलती है तो इसे क्या कहेंगे?
पूरे देश में बाबाओं से लेकर राष्ट्रपति भवन तक अगर भूमि आवंटन में कथित घोटाले लोगों के बीच चर्चा का विषय बनेंगे तो इस कुरीति को, इस अनैतिकता को, इस अधर्म को कौन रोकेगा? देश की सरकार, देश के कर्ताधर्ता सब सो रहे हैं, बाबा लोग नोट काट रहे हैं, सरकारी एजैंसियां खामोश हैं, नेता लोग सबको शह दे रहे हैं।
हे महामहिम राष्ट्रपति क्या आप इस अनैतिकता को रोक सकती हैं। हमें आपकी पहल का इंतजार रहेगा। परन्तु ठीक कहा गया है कि स्वच्छता और नैतिकता के सरोवर में वह आदमी सबसे पहले उतरे जिसका खुद का दामन पाक-साफ है। क्या हमारे भारत में ऐसी उम्मीद किसी नेता से और सर्वोच्च पद पर बैठी किसी हस्ती से की जा सकती है, हमें इस सवाल का जवाब चाहिए। |