विशेष लेख
Date : 26-June-2012
हिन्दू-स्थान में हिन्दू पी.एम. क्यों नहीं!
आदित्य चोपड़ा
राजनीति में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं लेकिन वे पार्टियां ही सफल होती हैं जो अपना एजैंडा बनाकर चलती हैं। इसी तर्ज पर ये लोग ही राष्ट्रीय राजनीति के मानचित्र पर छा पाते हैं जिन्हें पार्टी प्रोजैक्ट करने के लिए रणनीति बनाती है। राजनीति के विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी पार्टी को सफलता पाने के लिए अपना एजैंडा तैयार रखना चाहिए और जिसको पार्टी में बड़े नेता के रूप में स्थापित करना है उसे जनता के बीच भी प्रोजैक्ट कर दिया जाना चाहिए। आजकल भारतीय जनता पार्टी बेहद उतार-चढ़ाव के दौर से गुजर रही है। माहौल उसे खुद कांग्रेस ने ही तैयार करके दिया है। बढ़ती महंगाई, भ्रष्टाचार और आपसी जंग के बीच कांग्रेस ने सचमुच भाजपा को जमीन तैयार करके दे दी है, लेकिन भाजपा ने अभी तक आगामी लोकसभा चुनाव जो कि 2014 में होने हैं, को लेकर अपने नेता का चयन नहीं किया है। एक ऐसे नेता का चयन जिसे प्रधानमंत्री के रूप में भाजपा प्रोजैक्ट कर सकती है वह श्री नरेन्द्र मोदी हैं जो गुजरात के सीएम हैं। भाजपा के बीच इस प्रश्र को लेकर व इस प्रोजैक्शन को लेकर अजीब ही अन्तद्र्वंद्व चल रहा है। ऐसे में एक नया सवाल देशवासियों के समक्ष उठ खड़ा हुआ है कि क्या देश में एक हिन्दूवादी प्रधानमंत्री होना चाहिए या नहीं होना चाहिए। दु:ख के साथ कहना पड़ रहा है कि भाजपा के लोग नरेन्द्र मोदी को सर्वसम्मति से प्रधानमंत्री के रूप में प्रोजैक्ट क्यों नहीं कर रहे?
जो एनडीए नाम का एक ग्रुप बना हुआ है और उसमें कई दल शामिल हैं, यह इस समय उस यूपीए का जबर्दस्त विकल्प बन सकता है जिसमें कई पार्टियां शामिल हैं। हर मोर्चे पर फेल हो रही यूपीए को टक्कर देने के लिए एनडीए में जब-जब मतभेद उभरे वह मोदी के नाम को लेकर ही उभरे। पिछले दिनों भाजपा में एक बार फिर मोदी के नाम को लेकर बवंडर मच गया है। अन्दर ही अन्दर शीर्ष नेता एल.के. अडवानी जो आफ कलर हो चुके हैं, अपनी उपेक्षा से क्षुब्ध हैं और चाहते हैं कि उन्हें पीएम के रूप में प्रोजैक्ट किया जाए। उन्होंने पिछली टर्म में भी अपनी इसी महत्वाकांक्षा को काफी हवा दी, लेकिन उनकी बात बनी नहीं। बढ़ती उम्र उन पर हावी है। अभी भी उनकी महत्वाकांक्षा बरकरार है। उन्होंने ही इस समय पार्टी के अन्दर मोदी का विरोध कर रखा है। हम इस कड़ी में आरएसएस सुप्रीमो मोहन भागवत जी की विचारधारा का समर्थन करना चाहेंगे जिन्होंने एक हिन्दू को पीएम बनाने की आवाज बुलंद की है। नरेन्द्र मोदी के रूप में देश को एक ऐसा उदार व्यक्ति चाहिए जो सबको साथ लेकर चलता हो। श्री भागवत जी ने यह आवाज उस समय बुलंद की जब एनडीए के एक घटक जद (यू) के श्री नीतीश कुमार ने श्री मोदी का नाम लिए बिना उनका विरोध कर दिया। इसका मुंहतोड़ जवाब देकर भागवत जी ने बिल्कुल सही किया। हम यह कहना चाहते हैं कि एक सिख प्रधानमंत्री हो सकता है, एक मुस्लिम राष्ट्रपति हो सकता है। जात-पात के नाम पर सभी समीकरण बिठाकर अगर कांग्रेस किसी को भी प्रोजैक्ट कर ले तो वह ठीक, लेकिन अगर भाजपा के एक दबंग और हिन्दू उदारवादी को पीएम के रूप में प्रोजैक्ट किया जाता है तो तकलीफ उन लोगों को हो जो कांग्रेस के दुश्मन हैं, परन्तु यहां तो एनडीए के लोग ही इस प्रोजैक्शन का विरोध कर रहे हैं।
राजनीतिक हालात जब से भाजपा के पक्ष में होने लगे हैं तब से पार्टी की ओर से पीएम कौन होगा, को लेकर मंथन चलता रहा है। इस कड़ी में अडवानी का नाम उभारा गया लेकिन यह आरएसएस के आला रणनीतिकार थे जिन्होंने तुरंत नरेंद्र मोदी को प्रोजैक्ट किया। पीएम पद के लिए नरेंद्र मोदी का दमखम और कार्यशैली देशवासी पसंद करते हैं। अडवानी अब चूक गए हैं। उम्र का असर और कई विवादित फैसले उनके निजी व्यक्तित्व को प्रभावित कर चुके हैं। उनकी विचारधारा को अब वह सम्मान नहीं मिल पा रहा जो उन्हें वर्षो पहले मिला करता था। वक्त बदल रहा है और देश की जनता सब कुछ समझ रही है और अब जनता की नब्ज समझने वाली इस पार्टी को चाहिए कि नरेंद्र मोदी के लिए राजनीतिक जमीन तैयार कर दी जाए क्योंकि उनमें क्षमता है कि वह देश का नेतृत्व कर सकें। समय गवाह है कि वह गुजरात में तीसरी बार शासन कर रहे हैं और चौथी बार न केवल गुजरात में बल्कि पूरे राष्ट्र की राजनीति में तेजी से एक बहुत ही स्वच्छ छवि के रूप में उभर रहे हैं। भाजपा में इससे पहले ऐसी स्वच्छ छवि वाले लोग नहीं उभरे।
मौका भी है और दस्तूर भी है, लिहाजा शीर्ष स्तर पर अब भाजपा के रणनीतिकारों को आरएसएस के साथ मिलकर पूरे देश में यह संदेश दे देना चाहिए कि नरेंद्र मोदी ही हमारे अगले प्रोजेक्टिड पीएम होंगे। इससे देश में सही संदेश जायेगा लेकिन इसकी पहल न केवल लाबिंग के जरिये बल्कि पार्टी को राजनीतिक स्तर पर करनी होगी। अगर गडकरी के लिए दुबारा पार्टी अध्यक्ष बनाने का सोच लिया गया और संविधान में परिवर्तन किया जा सकता है तो फिर मोदी को पीएम प्रोजैक्ट करने के लिए क्या कोई संविधान बनाया नहीं जा सकता।
सच बात तो यह है कि यह तो एक आम सहमति की बात है। अगर पार्टी में अंदरूनी तौर पर आम सहमति बन जाए तो कांग्रेस को इस समय जो कि पहले से घिरी हुई है, को मारा जा सकता है। अगर भाजपा के अंदर व्यवहार बारात की तरह होगा तो बात नहीं बनने वाली।
इस समय पैट्रोल मूल्य वृद्धि के अलावा महंगाई से पूरा देश त्रस्त है। हर कोई सरकार को कोस रहा है। कुल मिलाकर लोहा गर्म है केवल चोट करने की बारी है तो बाजी भाजपा के पक्ष में आ सकती है। क्या इस कड़ी में नरेंद्र मोदी निर्णायक सिद्ध होंगे? तो हम यही कहेंगे कि हां मौके को भुनाने के लिए मोदी सचमुच एक मजबूत विकल्प हैं। बदलते राजनीतिक माहौल में जिस मजबूत शख्सियत की जरूरत है तो नरेंद्र मोदी के रूप में वह आपके पास है। तो फिर देरी किस बात की।
मोदी ने उन पर लगे साम्प्रदायिकता के आरोपों पर भावनात्मक अंदाज में जहां अपनी बेगुनाही पेश की, वहीं पिछले नौ साल में पूरे गुजरात में कहीं भी कफ्र्यू तक न लगने का जिक्र कर कांग्रेस पर पलटवार भी किया। साम्प्रदायिकता के आरोपों से खुद को बाहर करने की जद्दोजहद में जुटे मोदी ने खुद को सुनियोजित कुप्रचार का शिकार बताते हुए कहा, हमले होते रहे, हम झेलते रहे। न कभी जवाब दिया, न ही किसी का मुंह बंद किया। जुल्म, अत्याचार, आरोप और कुप्रचार सब झेलते रहे। सच्चाई सामने आने का इंतजार करते रहे।' गोधरा कांड के बाद गुजरात में हुए दंगों के लिए कठघरे में रहे मोदी ने सफाई भी दी कि उन्होंने दंगे रोकने के लिए पूरे प्रयास किए। साथ ही खुद के खिलाफ अभियान चलाने वालों को यह चेतावनी दी कि जितना उन्हें निशाना बनाया जाएगा वह उतने ही मजबूत होंगे। मोदी ने कहा, ''लोग जो पत्थर फैंकते रहे, हम उन्हें जमा करते रहे और उन्हीं से सीढ़ी बनाकर गुजरात को आगे बढ़ाया।'' गुजरात के विकास माडल की सब तरफ चर्चा है, लेकिन वह दिन भी दूर नहीं जब यहां की एकता और शांति के साथ समाज के सभी वर्गों के विकास की चर्चा होगी।
आज की तारीख में भाजपा में पीएम के पद को लेकर जो मनमुटाव चल रहा है उसे दूर करना होगा। मोदी को पीएम पद का दावेदार खुद भाजपा बता सकती है, तो बात बन सकती है। भारत देश जिसे हिन्दुस्तान का नाम दिया गया है उस देश में क्या हिन्दू का पीएम होना गुनाह है? राष्ट्र को समर्पित विचारधारा के सूत्रधार मोदी हैं और अडवानी जो बदलते वक्त के साथ अचानक जिन्ना प्रेमी हो गए थे, की विचारधारा और महत्वाकांक्षा पर ब्रेक लगाकर श्री मोहन भागवत आगे बढ़ सकते हैं। मोदी को प्रोजैक्शन देकर भाजपा अपनी बात बना सकती है। आइए मोदी के साथ गुजरात का उदाहरण दें और भारत देश को एक नजीर बनाकर पेश करें तो देश फिर से पुरानी आन-बान-शान की कसौटी पर कुंदन की तरह निखर सकता है।
 
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