विशेष लेख
 

शरद यादव क्यों नहीं?

अश्विनी कुमार

मनमोहन सरकार का नौ साला जश्न पूरा हो गया मगर एक सवाल हिन्दोस्तानियों के जहन में खड़ा कर गया कि जब डा. मनमोहन सिंह इस देश के प्रधानमन्त्री हो सकते हैं तो शरद यादव जैसा जमीन से जुड़ा और गांवों की मिट्टी में बड़ा हुआ इंसान वजीरे आजम के औहदे पर क्यों नहीं पहुंच सकता? इस देश का प्रधानमन्त्री बनने के लिए असलियत में काबलियत का कौन सा पैमाना है? हम देख चुके हैं कि एच.डी. देवेगौड़ा और इन्द्र कुमार गुजराल भी इस देश के प्रधानमन्त्री रहे। मोरारजी देसाई और चौधरी चरण सिंह भी इस देश के प्रधानमन्त्री रहे। मैं यह बात इसलिए लिख रहा हूं कि अब राजनीति में तीसरे मोर्चे के नाम पर विभिन्न राजनीतिक दलों को गोलबन्द करना संभव नहीं है। गौर से देखिये तो आपको दो राष्ट्रीय पार्टियों कांग्रेस व भारतीय जनता पार्टी के अलावा और जो भी पार्टियां नजर आती हैं वे सभी सीमित इलाकों में हैं। चाहे जनता दल (यू) हो या द्रमुक अथवा अन्नाद्रमुक या तेलगूदेशम और समाजवादी पार्टी अथवा बीजू जनता दल। बेशक कम्युनिस्ट पार्टियां अपने इलाकोंं केरल व प. बंगाल के अलावा त्रिपुरा में ही सिमटी हुई हैं मगर इनकी विचारधारा किसी एक प्रदेश तक सीमित नहीं है।
आज देश के सामने एक ही समस्या है कि विभिन्न राजनीतिक गठबन्धनों का जुगाड़ केवल सत्ता की खातिर हो रहा है इसमें विचारधारा का कोई लेना-देना नहीं है। गठबन्धन को अगर सिर्फ सत्ता की खातिर बनाया जाता है और फिर उससे अच्छे शासन की अपेक्षा की जाती है तो यह केवल जनता को मूर्ख बनाने के अलावा और कुछ नहीं है। वह गठबन्धन किस प्रकार सुशासन दे सकता है जिसमें अलग- अलग विचारधारा और सिद्धान्तों वाले लोग एक मंच पर बैठ कर कहें कि वे जो सरकार बनायेंगे वह केवल एक विचार पर चलेगी। हां एक विचार केवल सत्ता से चिपके रहने का हो सकता है और किसी भी प्रकार शासन का सुख भोगने का हो सकता है मगर विरोधाभासों से बने गठबन्धन उसी प्रकार टूटते हैं जिस प्रकार यूपीए से तृणमूल कांग्रेस और द्रमुक अलग हुए। यह तो प्रत्यक्ष प्रमाण है। जब कांग्रेस व भाजपा अपने बूते पर सरकार बनाने के योग्य नहीं रह गये हैं और आगामी लोकसभा चुनावों के बाद भी ऐसी ही अपेक्षा व्यक्त की जा रही है कि इन दोनों में से किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत प्राप्त नहीं होगा तो इन दोनों विचारधाराओं से अलग हट कर अपना अस्तित्व बनाये रखने वाली समान विचारों की पार्टियों को एक मंच पर आना चाहिए और देश को एक ठोस विकल्प प्रदान करना चाहिए।
भारत में ऐसे विकल्प की गुंजाइश डा. राम मनोहर लोहिया की समाजवादी आन्दोलन के जमाने से रही है। इस ऐतिहासिक सच को न तो भाजपा झुठला सकती है और न कांग्रेस और न ही कम्युनिस्ट पार्टियां। इस सच को समझते हुए ही मैं लिख रहा हूं कि श्री शरद यादव में इस देश का प्रधानमन्त्री बनने की पूरी क्षमता है, सवाल सिर्फ यह है कि विभिन्न क्षेत्रीय दलों के नेता अपने अहम को नियन्त्रण में रखें। कुछ लोग कह सकते हैं कि श्री यादव की पार्टी के ही बिहार के मुख्यमन्त्री नीतीश कुमार का नाम मैं क्यों नहीं ले रहा हूं तो इसका जवाब बहुत सीधा है कि शरद यादव का व्यक्तित्व किसी एक राज्य या क्षेत्र के दायरे में नहीं बन्धा है। वह जब मन चाहे उत्तर प्रदेश से चुनाव लड़ लेते हैं और जब चाहे मध्यप्रदेश या बिहार से। यह कूव्वत आज के गिने-चुने नेताओं में ही बची है। इसके साथ ही श्री यादव का राजनीतिक सफर भी कम मजेदार नहीं है। वह सबसे पहले 1973 में जबलपुर की उस सीट से सांसद बने जो कांग्रेस का गढ़ थी। इसके बाद वह जे.पी. आंदोलन से जुड़ गये। उनके पुरखे कांग्रेस और समाजवादी आन्दोलनों से जुड़े रहे। वह गांव में पैदा होकर शहर में पढ़ कर इंजीनियर बने और राजनीति में प्रवेश कर गये। एकमात्र शरद यादव ही ऐसे नेता हैं जो संसद में खड़े होकर यह कह सकते हैं कि कभी इस देश की जातिवाद की समस्या पर भी बहस कराओ क्योंकि जब तक जातिवाद इस देश की जड़ों में घुसा रहेगा तब तक इसकी तरक्की अवरुद्ध होती रहेगी। हो सकता है उनकी बातों से लालू प्रसाद या अन्य नेता सहमत न होते हों क्योंकि उनके विचार किसी दायरे में कैद नहीं हैं। वह गांधीवाद को अपने जीवन में उतार कर जीने वाले नेता हैं। राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं के बारे में उनकी सोच बहुत ही स्पष्ट और पैनी है सबसे ऊपर वह इस देश के गांव और गरीब को करीब से पहचानते हैं। बेशक उनकी राजनीतिक यात्रा डा. लोहिया की मृत्यु के बाद शुरू हुई है मगर वह सिद्धान्तों को हर हालत में पकड़ कर चुनावी नैया पार करने वाले लोगों में हैं। मेरे इस विचार पर भी सभी समानधर्मी राजनीतिक पार्टियां गौर करें।

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