शख्सियत
Date :16-June-2012
 
ममता ने राजनीतिक सिद्धांतों पर समझौता किया : आशा कुमारी
çÂý¢ÅU
Ȥô¢Å âæ§Á

राष्ट्रपति चुनाव के लिए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के यू-टर्न लेने से राजनीतिक गर्माहट आ गई है। आखिर ममता बनर्जी प्रणव मुखर्जी के नाम का विरोध क्यों कर रही हैं। ममता का प्रणव के नाम पर सोमनाथ चटर्जी के नाम से काउंटर करना हैरानी पैदा करने वाली चाल है। उधर हामिद अंसारी के नाम को एपीजे अब्दुल कलाम के नाम से काउंटर किया गया है। यह ममता एवं कांग्रेस की सधी हुई चाल है। दोनों तरफ फायदा एवं नुक्सान है। इन दोनों तरफ के नामों से राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर पर आने वाले दिनों में नुक्सान हो सकता है क्योंकि इन नामों पर लोगों की भावनाएं जुड़ी हैं। राष्ट्रपति पद का मुद्दा अब विकराल राजनीतिक दावपेंच में आ गया है। आखिर ममता एवं कांग्रेस के ऐसे दावपेंच क्यों हैं? क्या 2014 लोकसभा चुनाव इसका एक कारण है? क्या ममता एनडीए को नजदीकी का सिग्नल दे रही हैं।
राजधानी में कांग्रेस पार्टी की पश्चिम बंगाल सचिव प्रभारी आशा कुमारी से लिए गए विशेष साक्षात्कार के अंश इस प्रकार हैं:
प्रश्र : मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राष्ट्रपति उम्मीदवार के मुद्दे पर कांग्रेस के उम्मीदवार प्रणव मुखर्जी को नकारा है। आपका क्या कहना है?
उत्तर : ममता बनर्जी का जो इतिहास रहा है वह दबाव की राजनीति का ही रहा है। वह अपनी बात पर कभी टिकती नहीं हैं। हमेशा अपनी बात से 'बैक ट्रैक' करती हैं, क्योंकि गठबंधन के नियम एवं मर्यादा होती है। उसको ममता बनर्जी मान नहीं रही हैं या नहीं करना चाहती हैं। उनकी हमेशा एकतरफा आशा रही है। वह यह तो चाहती हैं कि कांग्रेस वह करे, जो वह कहें लेकिन वह कहीं पर भी समझौता नहीं करना चाहती हैं। गठबंधन में कहीं-कहीं समझौते भी करने पड़ते हैं। एक-दूसरे की बात को भी तरजीह देनी पड़ती है क्योंकि हर बात पर तो सहमति नहीं होती है। अगर हर बात पर सहमति होती तो देश में इतनी सारी पार्टियां क्यों होतीं? जब यूपीए घटक दलों की किसी बात पर बहुमत में एक सोच है तो उस पर वह (ममता) मानने को तैयार नहीं होती हैं।
प्रश्र : हाल के राज्यसभा चुनाव में भी एक एक्स्ट्रा सीट पर चुनाव लडऩे के लिए कांग्रेस के पास ममता बनर्जी की पार्टी से चार गुणा ज्यादा संख्या थी, लेकिन कांग्रेस को दबाव की राजनीति के कारण तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार को समर्थन देना पड़ा। ऐसा क्यों?
उत्तर : देखिए! जब राज्यसभा का चुनाव था तो कांग्रेस पार्टी के पास लगभग 44 वोट थे। हमें चुनाव जीतने के लिए लगभग 6-7 वोटों की जरूरत थी। ममता बनर्जी के पास कुछ वोट ज्यादा थे। उनके पास एक्स्ट्रा सीट के लिए आठ-दस वोट ज्यादा थे। कांग्रेस पार्टी ने अपना उम्मीदवार भी दे दिया था लेकिन ममता ने कहा कि इस बार कांग्रेस उनके उम्मीदवार को इस एक्स्ट्रा सीट के लिए समर्थन दे दे। अगली बार वह (ममता) कांग्रेस को समर्थन दे देंगी। इसलिए हमने उनकी बात मान ली। गठबंधन में आदान-प्रदान चलता है।
प्रश्र : ममता बनर्जी ने पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम एवं पूर्व लोकसभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी के नाम कांग्रेस के सुझाए गए नामों, प्रणव मुखर्जी एवं हामिद अंसारी, के काउंटर में दिए हैं। क्या आपको लगता नहीं है कि ममता सीधे आरपार की लड़ाई में आ गई हैं, जबकि ममता अभी भी यूपीए की घटक दल हैं?
उत्तर : यूपीए में रह कर ही ऐसा करना बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। आश्चर्यजनक है कि उन्होंने प्रणव मुखर्जी का विरोध किया है। प्रणव मुखर्जी राजनीति में एक बहुत बड़ी शख्सियत हैं। वह पश्चिम बंगाल से संबंध रखते हैं। बंगाल की आन-बान-शान की बात करने वाली ममता बनर्जी सोमनाथ चटर्जी का नाम दें, यह अलग बात है, लेकिन प्रणव मुखर्जी का विरोध करें यह बहुत आश्चर्यजनक बात है। इसका मतलब यह है कि वह जो बंगाल की आन-बान-शान की बात करती हैं वह अपने राजनीतिक सिद्धांतों पर भी समझौते करती हैं।
प्रश्र : 2014 के लोकसभा चुनाव नजदीक हैं। क्या ममता बनर्जी के यह राजनीतिक एक्शन एनडीए के नजदीक जाने की एक वजह की रणनीति समझी जा सकती है?
उत्तर : ममता बनर्जी का झुकाव निश्चित तौर पर यूपीए को कमजोर करने का नज़र आता है। वह समझती होंगी, कि उनके एक्शन से शायद सरकार गिर जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं होने वाला है। वह बहुत गलतफहमी में हैं। यूपीए की सरकार अपना कार्यकाल पूरा करेगी लेकिन वह हमारी गठबंधन की घटक दल हैं।
इसलिए कांग्रेस उनको वह पूर्ण मान-सम्मान देती है, जो हर घटक दल को दिया जाता है। जिस तरह से उन्होंने राष्ट्रपति उम्मीदवार के नाम दिए उससे तो यही लगता है कि वह यूपीए से दूरियां बनाना चाहती हैं एवं एनडीए की तरफ नजदीकी का सिग्नल देना चाहती हैं। दूसरी तरफ वह (ममता) खुद ही बोलती हैं कि वह यूपीए से बाहर नहीं जाएंगी।
प्रश्र : पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने ममता बनर्जी पर कड़े प्रहार किए हैं। कांग्रेस सांसद अधीर चौधरी ने तो इतना कह दिया है कि ममता बनर्जी 'मीर जाफर' है। इतनी कड़वाहट क्यों?
उत्तर : ''जिस तन लागे, सो तन जाने।'' बंगाल कांग्रेस के लोगों ने ममता के साथ मिलकर चुनाव लड़ा है। यह ठीक है कि वहां ममता बनर्जी की पार्टी का पूर्ण बहुमत है लेकिन यह भी सच्चाई है कि कांग्रेस पार्टी राज्य में उनका साथ नहीं देती तो उनका पूर्ण बहुमत नहीं आता। सवाल ही नहीं उठता था। कांग्रेस का वोट बैंक पूरी तरह से तृणमूल कांग्रेस को ट्रांसफर हुआ है। यह कांग्रेस का बड़ा योगदान है। इसलिए बंगाल प्रदेश अध्यक्ष एवं अन्य सांसदों की पीड़ा उभर कर आई है।
प्रश्र : लोकसभा चुनाव 2014 से पहले बंगाल प्रदेश अध्यक्ष के बदले जाने की संभावना है। क्या सांसद दीपा दासमुंशी अध्यक्ष बनेंगी?
उत्तर : यह फैसला तो कांग्रेसाध्यक्ष सोनिया गांधी करेंगी। अगर ऐसी बात होगी तो यह (दीपा मुंशी) उनमें से एक हो सकती हैं।
प्रश्र : चूंकि आप हिमाचल प्रदेश से संबंधित हैं। हालांकि हिमाचल भाजपा में 'विद्रोह' के कारण पार्टी एवं सरकार की हालत पतली है लेकिन कांग्रेस में भी भारी खेमेबाजी है, जिसका सीधा फायदा भाजपा को मिल रहा है?
उत्तर: मुझे नहीं लगता है कि हिमाचल में इतना बिखराव है जितना मीडिया में प्रोजैक्ट किया जा रहा है। किसी एक-आध मुद्दे पर तो पार्टी में मतभेद हो जाते हैं मगर कोई बड़ा मतभेद नहीं है। इस बात को मैं नकारती हूं, क्योंकि यह सिर्फ वैचारिक हल्के से मतभेद हैं जो लोकतंत्र में स्वस्थ परम्परा है। यह व्यावहारिक है कि छोटा सा प्रदेश हिमाचल है। इसके नेताओं का कद राष्ट्रीय है तो स्वाभाविक लगता है कि विभिन्न कैम्प हैं लेकिन राज्य में कांग्रेस पार्टी का एक ही ध्येय है कि हमने पूर्ण बहुमत से आने वाले विधानसभा चुनाव में सरकार बनानी है।
प्रश्र : हिमाचल भाजपा की धूमल सरकार के 'भ्रष्टाचार' पर विधानसभा एवं बाहर राज्य कांग्रेस ने उतना कड़ा रुख नहीं लिया है, जितना होना चाहिए था। ऐसा क्यों?
उत्तर: जहां तक धूमल सरकार के भ्रष्टाचार का सवाल है, यह काफी चरम सीमा पर है। परिवारवाद पूरी तरह व्याप्त है। भाई-भतीजावाद एवं भू-माफिया की इस शासन में जड़ें मजबूत हुई हैं। कांग्रेस पार्टी ने 'हिमाचल आन सेल' का मुद्दा उठाया है। इस मुद्दे का सरगना मुख्यमंत्री एवं उनका परिवार है। इसमें हिमाचल के स्वास्थ्य मंत्री राजीव बिन्दल का बड़ा नाम जुड़ा है। विधानसभा के दौरान बिन्दल ने नौटंकी कर इस्तीफा दिया था।
अभी दोबारा इस्तीफा देने का ऐलान किया है। यह नौटंकी भरी धूमल सरकार है। आम जनता के हितों को भरपूर नजरंदाज यह धूमल सरकार कर रही है।

 
Back to Main Interview Page  
   
© 2011-12, Punjab Kesari All rights reserved.