राष्ट्रपति चुनाव अब मात्र राष्ट्रपति का चुनाव नहीं रह गया है। इसके बीच होने वाली राजनीति के परिणाम 2014 लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद अगले प्रधानमंत्री की ताजपोशी के लिए दूरगामी फैसले साबित होंगे। यूपीए को एनडीए में मचे घमासान का फायदा हो रहा है। केन्द्रीय मंत्री प्रणव मुखर्जी को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एवं शिवसेना के समर्थन से एनडीए की किरकिरी हुई है।
उधर ममता बनर्जी भी यूपीए से बाहर निकलने के 'सियासी बहाने' बनाने में मशगूल हैं। नीतीश कुमार को लग रहा है कि भाजपा नरेन्द्र मोदी के आवरण से बाहर नहीं निकलेगी, इसलिए उन्होंने प्रणव को समर्थन देकर अपनी 'महत्वाकांक्षाओं' को बाहर कर भाजपा को पहला झटका दिया है। केन्द्रीय नेतृत्व से लेकर राज्यों के भाजपा लीडरों तक भाजपा नरेन्द्र मोदी के मसले पर विभक्त है। आखिर महत्वाकांक्षा किसकी नहीं है।
राजधानी में भाजपा प्रवक्ता रामनाथ कोविंद से लिए गए विशेष साक्षात्कार के अंश इस प्रकार हैं-
प्रश्र : एनडीए पार्टनर और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा है कि एनडीए का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार धर्म निरपेक्ष और उदारवादी चेहरा होना चाहिए। आपका क्या मानना है?
उत्तर : संविधान में हर नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी गई है। उन्होंने (नीतीश) अपनी राय रखी है। जैसा मैंने कहा कि राय तो राय ही होती है। जब सबके बीच एक सोच उभरकर आएगी, उसी पर आगे चलेंगे।
प्रश्र : मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को निशाने पर लेते हुए नीतीश ने कहा है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेयी गुजरात दंगों के बाद मोदी को हटाना चाहते थे, जो फैसला टाला गया था?
उत्तर : मुझे लगता है कि वाजपेयी की स्टेटमेंट की रिपोर्टिंग गलत की जा रही है। भाजपा की गोवा राष्ट्रीय कार्यसमिति बैठक में मैं भी मौजूद था। उसमें एक विषय नरेन्द्र मोदी के बारे में आया था। वाजपेयी ने तब कहा था कि 'नरेन्द्र मोदी को आज राजधर्म' निभाना चाहिए। उसके आगे उन्होंने और भी कहा था कि 'जो नरेन्द्र मोदी निभा भी रहे हैं।' दुर्भाग्य से जो मीडिया में सब चीजें आ रही हैं, वह स्टेटमेंट का एक भाग आ रहा है।
प्रश्र : जनता दल (यू) क्या एनडीए को अपने हिसाब से चलाना चाह रहा है या एनडीए को छोडऩे की राह पर है?
उत्तर : हम दोनों दलों के संबंध अच्छे हैं। बिहार में हमारी सरकारी चल रही है। दोनों पार्टियों का केन्द्रीय नेतृत्व समझदार है। हम समझदारी से काम करते हुए 2014 लोकसभा चुनाव भी साथ मिल कर लड़ेंगे।
प्रश्र : ऐसा भी माना जा रहा है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ऐसा 2014 लोकसभा चुनाव में अपना वोट बैंक न बिखरने के लिए कहा है?
उत्तर : मैं केवल इतना मानता हूं कि हर व्यक्ति को अपने विचार रखने की स्वतंत्रता है। उसके पीछे के दृष्टिकोण में मैं नहीं जाना चाहता हूं लेकिन जो स्वतंत्रता का अधिकार मिला है, उसका वह इस्तेमाल कर रहे हैं और हर कोई करता है। करना भी चाहिए।
प्रश्र : बिहार में भाजपा इस मुद्दे पर विभक्त प्रतीत हो रही है। भाजपा के उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी का कहना है कि अगर नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया, तो एनडीए घटक दलों को साथ रखना मुश्किल हो जाएगा, जबकि भाजपा के बिहार सरकार के सहकारिता मंत्री गिरिराज सिंह मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर लगातार सियासी हमले जारी रखे हुए हैं। आपका क्या कहना है?
उत्तर : इसे सियासी हमले की दृष्टि से नहीं देखना चाहिए। मुझे लगता है, दोनों का एक ही दृष्टिकोण है। मंत्री के बयान का जो उल्लेख हुआ है, उनका शायद दृष्टिकोण यह था कि आखिर जब आप धर्मनिरपेक्षता की बात करते हैं, तो धर्म-निरपेक्षता की एक परिभाषा होती है। किसी को कैसे कहा जा सकता है कि यह धर्म निरपेक्ष है या नहीं, जब तक कि वह उस मापदंड में फिट या अनफिट नहीं होता है। यह अपनी अभिव्यक्ति है। जहां तक सुशील मोदी की बात है, उन्होंने भी अपना पक्ष रखते हुए मत व्यक्त किया है, लेकिन यहां यह उस दृष्टि से नहीं देखना चाहिए कि मत में मतान्तर है।
प्रश्र : आर.एस.एस. प्रमुख मोहन भागवत ने भी कहा है कि हिन्दू विचारधारा को मानने वाले एवं आगे बढ़ाने वाले को देश का प्रधानमंत्री बनाना चाहिए एवं नरेन्द्र मोदी का एक तरह से समर्थन किया है?
उत्तर : मैं भाजपा की तरफ से बात करने के लिए अधिकृत हूं। आरएसएस का न मैं प्रतिनिधि हूं, न मैं उनका प्रतिनिधित्व करता हूं।
प्रश्र : मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के बढ़ते कद से भाजपा के प्रधानमंत्री पद की चाहत रखने वाले 'कईÓ लीडर परेशान हैं। क्या यह भाजपा की इस संदर्भ में आंतरिक लड़ाई का हिस्सा समझा जा सकता है?
उत्तर : मुझे लगता है कि अगर एक दृष्टि से देखा जाए तो बहुत अच्छी बात है। यह भाजपा एवं प्रजातांत्रिक पद्धति के लिए अच्छी बात है कि हमारे यहां प्रधानमंत्री बनने वाले सुयोग्य उम्मीदवार एक या दो नहीं, बल्कि तीन-चार हैं लेकिन जहां यह बात कही जाती है कि उनका आपस में किसी प्रकार का मनमुटाव है, ऐसा कुछ भी नहीं है। अभी 2014 लोकसभा चुनाव बहुत दूर हैं। किसी भी दल या यूपीए की भी बात करें तो किसी ने भी अभी तक प्रधानमंत्री प्रत्याशी घोषित नहीं किया है। अभी समय इसके लिए परिपक्व नहीं है।
प्रश्र : वरिष्ठ भाजपा लीडर लाल कृष्ण अडवानी अपनी रथयात्रा में भाजपा की केन्द्र में सत्ता काबिज करने की नैया के खेवैया के रूप में उभरे थे, लेकिन भाजपा दिग्गज वाजपेयी की प्रधानमंत्री पद पर ताजपोशी हुई थी। क्या अब भी भाजपा की यह रणनीति रहेगी कि सियासी कद वाले नरेन्द्र मोदी को खेवैया के रूप में उभारा जाए एवं रणनीतिक दृष्टि से उदारवादी चेहरे को चुनाव परिणाम के बाद सामने पेश किया जाए?
उत्तर : यह प्रश्न संभावनाओं पर आधारित है। मैं इस पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करना चाहता हूं। ये सब चीजें जो मीडिया में आ रही हैं, वे सब कल्पनाओं पर आधारित हैं। इनका कोई आधार नहीं है। वास्तविकता आने दें, सभी बातें स्पष्ट हो जाएंगी लेकिन एक बात मैं कहना चाहता हूं कि जनता यूपीए सरकार की महंगाई एवं कुशासन से ऊब चुकी है एवं अब जनता बदलाव चाहती है, जो बदलाव अब निश्चित है। उसके लिए अब भाजपा विकल्प के रूप में उभर कर सामने आ रही है। जैसे चुनाव नजदीक आएगा, एनडीए का विस्तार भी होता जाएगा।
प्रश्र : कांग्रेस का ग्राफ जिस तरह से गिरा है क्या आपको लगता है कि कांग्रेस लोकसभा-2014 चुनाव में नम्बर गेम में कमी पर गैर भाजपा दलों को सरकार बनाने बारे समर्थन दे सकती है? क्या मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इस रणनीति के तहत कांग्रेस से एक रिश्ता बनाने के प्रयास में हैं, ताकि भविष्य में प्रधानमंत्री की उम्मीदवारी के लिए कांग्रेस का द्वार उनके लिए खुला रहे?
उत्तर : कांग्रेस का ग्राफ भारी रूप से गिरा है। तीसरे मोर्चे की जो कल्पना की जा रही है, वह न के बराबर है एवं जिसका आभास आपको हो रहा है कि कांग्रेस इनके साथ सरकार बना ले। ऐसा संभव नहीं है, क्योंकि जनता ने कांग्रेस को नकार दिया है। कांग्रेस किसी को उस वक्त अपनी सरकार न बनने देने के लिए समर्थन दे, तो राजनीति में संभावनाओं का अपार पक्ष बना रहता है। कुछ नहीं कहा जा सकता है, लेकिन मोटे तौर पर मुझे ऐसा लगता नहीं है।
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