शख्सियत
Date :28-April-2012
 
चुनाव सुधार बिल इस सत्र में आने की उम्मीद : एस वाई कुरैशी
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संसद का बजट सत्र जारी है। सियासी पार्टियां ज्यादातर संसद को ठप्प करवा कर वोट बैंक की राजनीति करने में मशगूल हैं। केन्द्र सरकार की प्राथमिकता में लोकपाल बिल को पारित करवाना है। देश में दागी एवं आपराधिक पृष्ठभूमि के राजनीतिज्ञों का बढऩा लोकतंत्र के लिए खतरे का संकेत है। ज्यादातर सियासी पार्टियां इस मुद्दे पर गंभीर नहीं दिखाई दे रही हैं। शायद ही किसी पार्टी ने चुनाव सुधारों के लिए संसद ठप्प करवाने में अग्रणी भूमिका निभाई हो। चुनाव सुधारों में स्टेट फंडिंग रिजेक्ट करने का अधिकार वगैरह सुधार शामिल हैं। पर क्या केन्द्र सरकार चुनाव सुधारों के लिए गंभीर है? क्या विपक्ष चुनाव सुधारों के लिए ठोस भूमिका निभा रहा है। आखिर केन्द्रीय चुनाव आयुक्त को प्रधानमंत्री को इस बारे में पत्र लिखने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या इस बजट सत्र में चुनाव सुधार बिल आ जाएगा? क्या चुनाव आयोग केन्द्र सरकार की चुनाव सुधार बिल के बारे में कार्यवाही से आश्वस्त है? साथ ही क्या राजनीतिक पार्टियों की स्वतंत्र आडिटिंग होना जरूरी है। इस संदर्भ में राजधानी में केन्द्रीय चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी से लिए गए विशेष साक्षात्कार के अंश इस प्रकार हैं:-
प्रश्न : देश में चुनावी प्रक्रिया के लिए किए गए आयोग के प्रयासों पर आपका क्या कहना है?
उत्तर : देखिए! बात काफी आगे बढ़ी है। चुनाव सुधार 15-20 साल से लंबित हैं। हर साल या छह महीने में कोई इजाफा भी हो जाता है। यह अच्छी बात है कि सरकार ने इस बात पर पहल की है। विभिन्न मंत्रालय हमारे संपर्क में हैं। विधि मंत्री भी चुनाव आयोग में विचार-विमर्श के लिए आ चुके हैं। उन्होंने (मंत्री) वायदा किया है कि जल्द से जल्द संसद में यह सुधार लाये जाएंगे। हम उम्मीद करते हैं कि बजट सेशन में यह आ जाएगा।
प्रश्न : केन्द्र सरकार का कहना है कि लोकपाल बिल प्राथमिकता है, इसके बाद ही चुनाव सुधार कानून को संसद में लाया जाएगा।
उत्तर : खैर, यह तो प्राथमिकता जरूर है, लेकिन बिल तो सारे साथ-साथ चलते हैं बल्कि शायद हमारे चुनाव सुधार की बात तो ज्यादा फंडामेंटल है ताकि अच्छे लोग चुनकर आएं एवं दागी लोगों पर रोक लगे।
प्रश्न : जिस तरह से 'दागी' एवं आपराधिक पृष्ठ भूमि के लोग संसद में आ रहे हैं। क्या आपको लगता है कि लंबित चुनाव सुधारों के लिए केन्द्र सरकार अब गंभीर है?
उत्तर : सरकार की नेकनीयती तो इस बात से लगती है कि विधि मंत्री बार-बार इस बारे चुनाव आयोग आए हैं। ऐसा पिछले साठ साल में कभी नहीं हुआ है। विधि मंत्री का तीन-चार बार आना सराकात्मक बात है। यह तथ्य है कि एक-दो मुद्दों पर आम सहमति होना बाकी है। शायद इसी बात की झिझक होगी परन्तु जिन पर कोई विवाद नहीं है, उन पर तो कार्यवाही हो जानी चाहिए।
प्रश्न : अगर केन्द्र सरकार चुनाव सुधारों पर सकारात्मक है, तो आपको इस बारे प्रधानमंत्री को पत्र लिखने की क्यों जरूरत महसूस हुई थी?
उत्तर : नहीं। प्रधानमंत्री को पत्र लिख हमने उनको सिर्फ परिस्थिति से अपडेट किया था। साथ में यह भी कि अब स्टेज आ गई है कि आप इसको आगे लेकर जाईए।
प्रश्न : क्या प्रधानमंत्री का इस पत्र बारे कोई जवाब आया था?
उत्तर : उनका जवाब आया था। उस पर विचार हो रहा होगा।
प्रश्न : झारखण्ड राज्यसभा चुनाव मुद्दे पर क्या अभी भी कठोर कार्यवाही करने की और आवश्यकता है?
उत्तर : इससे ज्यादा अब और कठोर कार्यवाही क्या करेंगे। बात तो सिर्फ पैसे के चलने की थी। वह अब अंकुश लग गया है। मुझे नहीं लगता है कि अब किसी की हिम्मत होगी। झारखंड हाईकोर्ट ने भी आजादी के बाद भ्रष्टाचार के खिलाफ ऐसे कठोर कदम के बारे में बात कही है।
प्रश्न : आपकी टर्म में क्या मुद्दे ऐसे बचे हैं, जो आप करना चाह रहे थे?
उत्तर : आयोग स्वतन्त्र एवं निष्पक्ष है। जो पालिसी हमने बनानी चाही वह बेधड़क बनाई है। हमें कोई रोकटोक नहीं थी। हमने आयोग के अंदर भी कई चीजें बनाईं। हमने आयोग के संदर्भ में जो भी बातें सरकार को भेजीं। सरकार ने उन बातों को स्वीकृति दी। बस चुनाव सुधार की बात सिरे तक चढ़ जाती है, तो मुझे संतोष महसूस होगा कि हमने अपने कार्यकाल में इस बात का सफल प्रयास किया।
प्रश्न : क्या इन चुनाव सुधारों के बिना हमें विश्व का महान लोकतंत्र माना जा सकता है?
उत्तर : देखिए, पश्चिम के सत्तर देशों के बराबर हमारे वोटरों की संख्या है। हम विशाल लोकतंत्र तो हैं, लेकिन महान लोकतंत्र नहीं हैं। इन चुनाव सुधार से हम विशाल से महान लोकतांत्रिक देश बन जाएंगे। हमारा चुनाव सिस्टम बहुत अच्छा है, लेकिन कुछ लोग हमारे लोकतंत्र पर सवाल उठाते हैं।
प्रश्न : लोकसभा चुनावों में औसत तौर पर 'वोटिंग पैटर्न' 50 से 60 फीसदी तक ही रहा है। लोगों की इसमें शामिल न होने में अरुचि कारण है या अविश्वास?
उत्तर : मुझे विश्वास है कि अगले लोकसभा चुनाव में इसमें बढ़ावा मिलेगा क्योंकि जो वोटर एडुकेशन डिवीजन हमने बनाई है, वह पिछले दो साल पहले ही तो बनाई है। यह लोकसभा चुनाव के बाद ही बनाई थी। उसके बाद के ग्यारह राज्यों के चुनावों में आजादी के बाद सर्वाधिक मतदान हुआ। आखिर वोटर को एडुकेट करना भी हमारा ही काम है। हम इस दिशा में लगातार प्रयास कर रहे हैं। आयोग द्वारा जनता को वोटर स्लिप देना शुरू करने से भी बड़ी सुविधा हुई है। हमने तो वोटर स्लिम को वोटर आईडी कार्ड के बनिस्बत भी स्वीकार कर लिया है।
प्रश्न : राजनीतिक पार्टियों के एकाउंट आडिट पर आपका क्या मानना है, क्या इसके विरोध का आयोग को सामना करना पड़ा है?
उत्तर : देखिए। आडिट तो होता ही है। पर हमारा सुझाव है कि पार्टियों के आडिटर में बदलाव होता रहना चाहिए क्योंकि पार्टियों में एक ही आडिटर सालों-साल आडिट करता रहता है। इसमें यह भी है कि आडिटर पार्टी का मैम्बर नहीं होना चाहिए क्योंकि आडिटर तो स्वतंत्र होना चाहिए। इसलिए हमारा सुझाव है कि हम 'पैनल आफ आडिटर' बनाएं, उसमें से ही पार्टियां आडिटर चुनें। हर साल आडिट जरूर हो। इसको वेबसाइट पर डालें ताकि लोग इसको देख भी सकें। इससे पारदर्शिता आएगी। हमने इस बारे में 'इंस्टीच्यूट आफ चार्टेड एकाउंटेंट इंडिया' से भी सियासी पार्टियों के 'एकाउंटेंट और आडिट' स्टैंडर्ड बारे भी राय ली है। अब यह स्टैंडर्ड पर फोरमा से आडिट होगी। यह सियासी पार्टियों को भी भेज दिया गया है।

 
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