संसद सत्र का माहौल गर्म है। विपक्ष सत्तापक्ष को घेरे हुए है। लोकपाल बिल की कोई बात नहीं कर रहा है। सांसद खुश हैं क्योंकि सांसदों को बुरे शब्द कहने वाले अब उसी राजनीति में दाखिला लेने के विचार में हैं। आखिर अन्ना हजारे के व्यक्तित्व को अन्ना टीम ने अपनी राजनीति में लपेट लिया। बाबा रामदेव के आंदोलन का क्या हश्र होगा? सवाल यह है कि क्या बाबा रामदेव सार्थक आंदोलन की दिशा में हैं? अन्ना टीम के राजनीति में उतरने से कांग्रेस को नुक्सान होगा या भाजपा को? एनडीए के शासन के वक्त भी लोकपाल बिल पास नहीं हुआ था। अब कांग्रेस भी विलम्ब कर रही है। ऐसा क्यों?
इस संदर्भ में भाजपा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शांता कुमार से राजधानी में लिए गए विशेष साक्षात्कार के अंश-
प्रश्र : अन्ना हजारे टीम के लोकपाल बिल पारित करवाने की मांग के आंदोलन असफल होने के बाद अब बाबा रामदेव की भी यही दशा होने का अंदेशा जताया जा रहा है। आपका क्या मानना है?
उत्तर : देखिए! इन दोनों ने काम तो बहुत किया है। एक नया चिन्तन-मनन पैदा किया है। मुझे लगता है यह दोनों आंदोलन थोड़े से भटक गए। कहां तो वह समय था कि स्वामी रामदेव की मंत्री अगवानी करते थे। तीन केन्द्रीय मंत्री दौड़े-दौड़े एयरपोर्ट पर चले गए। पूरी केन्द्र सरकार में भूचाल और खलबली मच गई थी। कहां वह समय था कि जब अन्ना हजारे जंतर-मंतर पर अनशन पर बैठे तो पूरा भारत और गांव-गांव उनके समर्थन में खड़ा हो गया। इन दोनों को चाहिए था कि उस स्थिति को बरकरार रखते। जनमत इतना सशक्त हो जाता कि सरकार एवं सियासी दलों को आत्मनिरीक्षण करने पर मजबूर होना पड़ता। दुर्भाग्य से यह नहीं हुआ। उनको ठीक सलाहकार नहीं मिले। बार-बार अनशन पर बैठना, उसमें हल्कापन आना। इसके अलावा इसमें राजनीति का आ जाना। जिस दिन अन्ना टीम के लोग हिसार के चुनाव में गए। मुझे उस दिन लगा कि बहुत गलत हो गया। इनको राजनीति की बात ही नहीं सोचनी चाहिए थी। इनको किसी भी दल का न तो राजनीतिक समर्थन करना चाहिए था, न ही विरोध करना चाहिए था। केवल भ्रष्टाचार की लड़ाई के लिए, यदि यह जनमत जागृत करते, तो यह बहुत बड़ा योगदान होता। अब स्वामी रामदेव क्या करते हैं। मुझे मालूम नहीं। लेकिन एक बात तो हुई है कि भ्रष्टाचार एक मुख्य विषय बन गया है। अगला चुनाव जो भी होगा, मुझे लगता है उसमें सबसे बड़ा मुद्दा भ्रष्टाचार रहेगा। लोगों को अब यह भी समझ आने लगा है कि गरीबी और विषमता का एक बड़ा कारण भ्रष्टाचार है।
प्रश्र : अन्ना हो या बाबा रामदेव का आंदोलन, जब सामाजिक आंदोलन पर्दे के पीछे या बाहर राजनीतिक रूप धारण करते हैं तो यह आंदोलन असफल साबित हुए हैं या कर दिए गए हैं? क्या इनके साथ आम जनसमर्थन नहीं था यह 'राजनीतिक जनसमर्थन' होने की वजह से ऐसा हुआ है?
उत्तर : इनके पीछे जनसमर्थन था और आम आदमी इनके साथ था। अधिकतर वे लोग थे, जो राजनीति से दुखी, परेशान, निराश हो चुके हैं। इसलिए मुझे लगता है कि यह राजनीति की बात न सोचते। विरोध की बात न सोचते। केवल भ्रष्टाचार के विषय पर जनमत जागृत करते, तो ज्यादा अच्छा होता।
प्रश्र : अन्ना एवं रामदेव के आंदोलन से सिर्फ कांग्रेस को नुक्सान हो रहा था, क्योंकि प्रहार केवल केन्द्र सरकार के भ्रष्टाचार पर केन्द्रित था, लेकिन जब अन्ना टीम ने राजनीतिक रुख अख्तियार किया, आपको लगता नहीं कि अब यह राजनीतिक नुक्सान भाजपा को ही होगा?
उत्तर: देखिए! ये लोग राजनीति में आएंगे, तो क्या होगा? क्या नहीं होगा? यह कुछ भी कहना समय से पहले की बात होगी लेकिन एक बात तो बिल्कुल ठीक है कि इनका आंशिक राजनीतिकरण, व्यवहार में या विचार में, वह इन आंदोलनों की विफलताओं का मुख्य कारण बना। पूरा देश दुर्भाग्य से राजनीतिक पार्टियों एवं नेताओं से निराश हो चुका है। पूरे देश को यह लगता है कि भ्रष्टाचार की जो बुनियादी समस्याएं हैं उनको समाप्त करने में शायद कोई राजनीतिक दल सफल न हो सके। यह राजनीतिक पार्टियों एवं नेताओं की बहुत बड़ी विफलता है। उसी का परिणाम है कि राष्ट्रीय पार्टी धीरे-धीरे दरकिनार होती जा रही है। क्षेत्रीय पार्टियां धीरे-धीरे ऊपर उठती चली जा रही हैं। इसलिए देश में जरूरत इस बात की है कि गैर-राजनीतिक सामाजिक धरातल पर एक जबरदस्त जनमत खड़ा किया जाए जो राजनीति को ठीक रास्ते पर आने के लिए विवश करे। ये दोनों प्रयत्न उस दिशा में हुए, लेकिन सफल नहीं हुए।
प्रश्र : इस तरह के सार्थक आंदोलनों के लिए पहले आंदोलन से जुड़े व्यक्तियों की व्यक्तिगत छवि स्वच्छ होना जरूरी है, लेकिन अन्ना हजारे एवं बाबा रामदेव के साथ लोगों पर दागी सवाल उठे। क्या आप समझते हैं कि इनके आंदोलन के असफल होने की एक वजह यह भी थी?
उत्तर: यह भी एक कारण बना, लेकिन अन्ना हजारे कम से कम एक व्यक्ति ऐसे थे, जिन पर इस प्रकार का कोई आरोप नहीं था। स्वामी रामदेव की कुछ कम्पनियां हैं। उन कम्पनियों से कुछ चीजें निकाली होंगी, लेकिन स्वामी रामदेव एवं अन्ना हजारे की छवि इतनी स्वच्छ है कि उनके नाम पर ही आंदोलन आगे बढ़ा और आगे बढ़ सकता था।
प्रश्र : केन्द्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद का कहना है कि लोकपाल बिल जल्दबाजी में पारित नहीं किया जा सकता है। आपका क्या मानना है?
उत्तर : 1968 में यह बिल सबसे पहली बार आया था। तब से लेकर आज तक 44 साल हो गए। अगर 44 वर्ष का समय कोई अच्छा काम करने के लिए पर्याप्त नहीं है, तो कितना समय चाहिए? मैं समझता हूं कि यह आपराधिक विलम्ब हुआ है। यह भारत की राजनीति की बहुत बड़ी कमी है कि हम लोकपाल जैसा बिल पास नहीं कर सके। अब भी लटकाते जा रहे हैं। यह तो पिछले सैशन में पारित हो जाना चाहिए था। इस सैशन में पारित हो जाना चाहिए। मैं तो यह भी कहता हूं कि पूरे विपक्ष को मिलकर इसको मुद्दा बनाना चाहिए कि यह सत्र तब तक खत्म नहीं होगा जब तक हम लोकपाल बिल पास न करें लेकिन दुर्भाग्य से पूरा विपक्ष इस पर इकट्ठा नहीं हो रहा है।
प्रश्र : आप इसमें विलम्ब की बात कर रहे हैं तो पिछली अवधि में भाजपा नेतृत्व की एनडीए सरकार भी केन्द्र में शासन में रही है?
उत्तर : मैं कमी स्वीकार करता हूं। जब हमारी एनडीए सरकार थी, तो हमें लोकपाल बिल पास कर लेना चाहिए था। कोशिश हुई थी, बल्कि मुझे याद है कि अटल जी कैबिनेट में जब यह मामला आया तो उन्होंने कहा इसमें चर्चा मत करो। इसमें प्रधानमंत्री शामिल होगा। जल्दी करो। तो जल्दी करने की कोशिश की थी, लेकिन नहीं हो सका। अगर नहीं हो सका तो मैं इस कमी को, इस गलती को स्वीकार करता हूं। हमें यह बिल उस वक्त पास कर देना चाहिए था।
प्रश्र : चर्चा है कि कांग्रेस आगामी 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले लोकपाल बिल को पारित कर मुद्दे को कैश करने की रणनीति में है। आप क्या समझते हैं?
उत्तर : यह कब पारित होगा? यह कहना बड़ा कठिन है। मुझे थोड़ा-सा शक होता है कि सभी राजनीतिक नेता इसको पास करने में दिल से इसके पक्ष में हैं या नहीं? कहीं ऐसा न हो महिला आरक्षण बिल की तरह इसका हश्र हो जाए क्योंकि सच्चाई यह है कि अधिकतर पार्टियों के पुरुष महिलाओं को आरक्षण देना नहीं चाहते हैं। इसलिए महिला आरक्षण बिल किसी न किसी बहाने लटकाया जाता है नहीं तो जितने दल उसको समर्थन करते हैं आज तक पास हो जाना चाहिए था।
|