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Hukus Bukus Review: कश्मीर की सांस्कृतिक धरोहर और परंपरा को स्पोर्ट्स ड्रामा के जरिए एक कड़वे सच्चाई को दर्शाता हैं फिल्म

Movie Review : हुकुस बुकुस

कलाकार : अरुण गोविल , दर्शील सफारी , गौतम सिंह विग , वाशु जैन , नायशा खन्ना , सज्जाद डेलाफ्रूज और मीर सरवर व अन्य

लेखक : रणजीत सिंह मशियाना , विपुल पटेल और जगतार एस कलवाना

निर्देशक : विनय भारद्वाज और सौमित्र सिंह

निर्माता : रवीना ठाकुर और विनय भारद्वाज

रिलीज : 03 नवम्बर 2023

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धरती का स्वर्ग कहे जाने वाला कश्मीर जितना अपनी खूबसूरती के लिए जाना जाता हैं। उतना ही अपने विवादों के लिए भी प्रचिलित हैं। कश्मीर नाम सुनते ही आंखो के सामने हज़ारो दृश्य सामने आने लगते हैं। धरती के स्वर्ग कहे जाने वाले कश्मीर की सदियों से अपनी एक पीड़ा है। इसी पीड़ा को उजागर करने के लिए हाल ही में सिनेमाघरों में फिल्म ‘हुकुस बुकुस’ रिलीज की गयी थी। जहां इस फिल्म में आज के कश्मीर के माहौल के साथ पिता पुत्र के भावनात्मक रिश्ते को बहुत ही गहराई से पेश किया गया है। साथ ही इस फिल्म को धर्म और क्रिकेट के साथ कश्मीर की सांस्कृतिक धरोहर और परंपरा को जोड़ने की एक पहल की गई है।

Hukus Bukus

‘हुकुस बुकस’, एक ऐसी फिल्म जो कश्मीर की जटिल टेपेस्ट्री के मर्म को उजागर करती है, ये सिर्फ एक फिल्म नहीं है; यह वास्तविक कहानी कहने की शक्ति का एक प्रमाण है। यह संघर्ष और सपनों के बीच जीवन की जटिलताओं को उजागर करने के लिए एक शक्तिशाली कथा का उपयोग करते हुए, क्षेत्र के संघर्ष और सुंदरता के सार को दर्शाता है। यह फिल्म अपने पात्रों के जीवन की खोज करती है, जो कठोर, तथ्य-आधारित कहानी के साथ जुड़ी हुई है जो स्क्रीन से परे गूंजती है, एक गहरा, गहन अनुभव प्रदान करती है जो दर्शकों पर एक अनोखा प्रभाव छोड़ती है।

दरअसल, असल मुद्दा फिल्म में यह है कि कश्मीर से धारा 370 हटने के बाद वहां पर माहौल कैसा है। जिस तरह से दुनिया को बताया जा रहा है कि कश्मीर और कश्मीरी एक बार फिर मुख्य धारा में लौट आए हैं, इसमें कितनी सच्चाई है। जिन बच्चों के हाथ में बंदूक थी उनके हाथ में अब बैट और बल्ला आ गया है। और, एक नए कश्मीर का निर्माण हो रहा है। इस फिल्म के माध्यम से यह बताने की कोशिश की गई है कि एक पिता अपने बच्चों के बारे में कभी भी बुरा नहीं सोचते हैं। कश्मीर की पृष्ठभूमि पर बनी यह पहली ऐसी फिल्म है जिसमें आतंकवाद नहीं, बल्कि भाईचारे की बात की गई है।

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इस फिल्म में अरुण गोविल ने कश्मीरी पंडित राधेश्याम की भूमिका निभाई है। एक पिता की भूमिका उन्होंने बहुत ही बेहतरीन तरीके से निभाया है। अरुण गोविल ने अपने किरदार को बड़े ही बखूबी तरह से पेश किया हैं।’हुकुस बुकस’ सार्थकता और प्रामाणिकता के प्रतीक के रूप में उभरता है, जो मूल्य हथकंडों पर निर्भर फिल्मों के खिलाफ आरोप का नेतृत्व करता है। इसकी कथा और सत्य के प्रति समर्पण अधिक गहराई से प्रतिध्वनित होता है और एक समृद्ध, विचार धरा वाला अनुभव प्रदान करता है, दर्शकों से ऐसी सामग्री चुनने का आग्रह करता है जो खोखली मार्केटिंग रणनीतियों वाली परियोजनाओं पर अधिक प्रभाव डालती है।

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ऐसी फिल्मों को अगर सही तरीके से प्रमोट किया जाए तो अधिक से अधिक दर्शकों तक पहुंच सकती हैं, लेकिन ऐसी फिल्मों के साथ बिडंबना यही होती है कि फिल्म के मेकर फिल्मों को ढंग से प्रमोट नहीं कर पाते हैं। हालांकि क्रिकेट मैच कुछ हिस्सों में दर्शकों का मनोरंजन कर सकता है, लेकिन कुल मिलाकर फिल्म दूरगामी स्थितियों और ट्रैक के कारण प्रभावित करने में विफल रहती है।

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