खंडित मूर्तियां पूजी नहीं जाती…!

तृणमूल कांग्रेस की महुआ मोइत्रा को ‘पैसे लेकर सवाल पूछने’ के मामले में लोकसभा से निष्कासित किया जा चुका है। इस मामले को लेकर राजनीतिक बतोलेबाजी करने वाले लोगों को यह समझना चाहिए कि महुआ मोइत्रा की जो हरकतें थीं, उन्हें संसद से जाना ही था। इस मामले को राजनीतिक नजरिए से देखने की बिल्कुल जरूरत नहीं है। इस पूरे मामले को संसद की गरिमा की दृष्टि से देखा जाना चाहिए। संसद की एथिक्स कमेटी ने यही किया है।
महुआ मोइत्रा के साथ खड़े लोग यह कह रहे हैं कि महुआ के निष्कासन को लेकर सदन में बहस नहीं कराई गई। बहस के लिए तीन-चार दिन का मौका दिया जाना चाहिए था। सवाल है कि जब महुआ मोइत्रा ने स्वयं यह माना है कि संसदीय पोर्टल में प्रश्नों को दर्ज करने के लिए एक व्यवसायी दर्शन हीरानंदानी के साथ उन्होंने लॉगिन आईडी और पासवर्ड शेयर किए थे, उस व्यवसायी से उन्होंने गिफ्ट लिए थे, तो शक कहां रह जाता है? महुआ पर आरोप था कि उन्होंने इस ग्रुप से पैसे और गिफ्ट लेकर अदानी समूह के खिलाफ संसद में प्रश्न पूछे। एथिक्स कमेटी के सामने यह आरोप स्पष्ट भी हो गया था। कितनी विचित्र बात है कि महुआ के संसदीय खाते में दुबई से 47 बार लॉगिन किया गया।
उन्होंने जो 61 सवाल पूछे उनमें से 50 अदानी समूह से संबंधित थे। जरा सोचिए कि एक सांसद के लॉगिन आईडी और पासवर्ड से दुबई में बैठकर कोई संसद के पोर्टल पर लॉगिन करे तो यह कितना गंभीर मामला है। महुआ यह कहकर पल्ला नहीं झाड़ सकतीं कि लॉगिन आईडी शेयर करने को लेकर संसदीय पोर्टल का कोई नियम नहीं है। इस देश का बच्चा-बच्चा जानता है कि लॉगिन आईडी और पासवर्ड किसी के साथ शेयर नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से कभी भी धोखाधड़ी हो सकती है लेकिन यहां मामला धोखाधड़ी का तो बिल्कुल ही नहीं था। महुआ ने जानबूझकर आईडी और पासवर्ड शेयर किया।
एथिक्स कमेटी ने आरोप लगाने वाले शख्स भाजपा सांसद निशिकांत दुबे, उन्हें कागजात उपलब्ध कराने वाले शख्स जय अनंत देहाद्राई और महुआ मोइत्रा से पूछताछ की थी लेकिन महुआ ने सहयोग नहीं किया। यहां यह बताना जरूरी है कि जय अनंत देहाद्राई कभी महुआ मोइत्रा के गहरे दोस्त हुआ करते थे। महुआ उन्हें अपना निराश पूर्व प्रेमी बता चुकी हैं। इसी को माध्यम बनाकर महुआ ने यह आरोप लगा दिया कि एथिक्स कमेटी ने उनसे निजी सवाल पूछने शुरू कर दिए थे। एथिक्स कमेटी में सभी दलों के सांसद होते हैं। यह कमेटी गैरराजनीतिक होती है और उस पर इस तरह के आरोप लगाने का रास्ता महुआ ने इसीलिए चुना ताकि वे असली मामले से ध्यान भटका सकें। एथिक्स कमेटी के अध्यक्ष सांसद विनोद कुमार सोनकर ने कहा भी कि महुआ जांच में सहयोग नहीं कर रही थीं।
जहां तक निष्कासन को लेकर संसद में बहस का सवाल है या महुआ को अपना पक्ष रखने देने का सवाल है तो एथिक्स कमेटी में जांच के बाद यह सवाल मौजूं रह ही नहीं जाता है। महुआ को एथिक्स कमेटी में अपनी बात रखने का भरपूर मौका मिला था लेकिन उन्होंने राजनीति खेलने की कोशिश की। उन्होंने और उनकी तरफदारी करने वाले लोगों ने यह कहा कि महुआ चूंकि महिला हैं, इसलिए उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा है। इस तरह की बात करना बेबुनियाद है, यह मामला महिलाओं से नहीं बल्कि संसद की अस्मिता से जुड़ा सवाल है।
और यह पहली बार नहीं है जब किसी सांसद को पैसे लेकर सवाल पूछने के आरोप में निष्कासित किया गया है। 2005 में एक न्यूज चैनल ने स्टिंग ऑपरेशन किया था जिसमें सांसदों ने सवाल पूछने की एवज में पैसे लिए। लोकसभा के 10 तथा राज्यसभा के 1 सांसद को बर्खास्त किया गया। इनमें भाजपा के अन्ना पाटिल, वाई.जी. महाजन, सुरेश चंदेल, प्रदीप गांधी, चंद्रपाल तथा छत्रपाल सिंह (राज्यसभा), बसपा के नरेंद्र कुशवाहा, लालचंद्र, राजाराम पाल, कांग्रेस के रामसेवक सिंह तथा आरजेडी के मनोज कुमार शामिल थे। उसके पहले 1951 में एच.जी. मुद्गल बर्खास्त किए गए थे। 1978 में इंदिरा गांधी को भी जनता पार्टी सरकार द्वारा निष्कासित कर दिया गया था। उसके बाद के कालखंड में विभिन्न कारणों से 42 से अधिक सांसदों ने अपनी सदस्यता खोई जिनमें सुब्रमण्यम स्वामी, राहुल गांधी और विजय माल्या शामिल रहे हैं। हालांकि सजा स्थगित होने के कारण राहुल की सदस्यता बहाल हो गई।
मैं 18 वर्षों तक संसद का सदस्य रहा हूं और मेरे जैसे लोग यह जानते हैं और मानते हैं कि जब आप संसद में पहुंचते हैं तो बहुत सारी जिम्मेदारियों का निर्वहन करना होता है क्योंकि संसद केवल एक भवन या केवल बैठक और बहस की जगह नहीं होती है बल्कि वह लोकतंत्र का मंदिर है, गणतंत्र का आराधना स्थल है, जहां से इस देश के आम आदमी की मन्नतें पूरी होती हैं। आस्था और आकांक्षा का यह सर्वोच्च स्थान है। ऐसी पवित्र जगह पर फरेब के लिए कोई स्थान हो ही नहीं सकता है। अब ममता बनर्जी कह रही हैं कि जनता की अदालत महुआ को न्याय देगी। संभव है कि महुआ चुनकर फिर आ जाएं, बार-बार चुनी जाती रहें लेकिन इससे वह दाग खत्म नहीं होता जो उन पर लगा है। मेरा मानना है कि अपनी राजनीति के लिए संसद की एथिक्स कमेटी और सरकार पर सवाल नहीं उठाना चाहिए। आज भाजपा की सरकार है, कल किसी और पार्टी की सरकार होगी। संसद की गरिमा किसी सरकार से जुड़ी नहीं होती है। यह सभी पार्टियों की सामूहिक जिम्मेदारी है। इस बात को समझना बहुत जरूरी है। महुआ मोइत्रा की बर्खास्तगी को राजनीतिक नजरिए से मत देखिए। यह संसद की गरिमा का सवाल है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

three + seventeen =

पंजाब केसरी एक हिंदी भाषा का समाचार पत्र है जो भारत में पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश और दिल्ली के कई केंद्रों से प्रकाशित होता है।