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दानिश अली तुम ‘दाना’ कब थे

लोकसभा के बहिन मायावती की पार्टी बहुजन समाज पार्टी के लोकसभा सदस्य श्री दानिश अली को उनकी पार्टी से निकाले जाने पर राजनैतिक क्षेत्रों में आश्चर्य व्यक्त किया जा सकता है मगर इसके ठोस कारण इसलिए नहीं हैं क्योंकि मायावती की राजनीति उत्तर प्रदेश से लेकर अन्य राज्यों में अपनी पार्टी का दलित-मुस्लिम चेहरा उजागर करने के लिए भीतर से कहीं भाजपा की हिन्दुत्व की राजनीति को मुखर बनाये रखने के पक्ष में रही है। हालांकि यह काम ऊपर से कभी नहीं किया गया है मगर राजनीति का सच यह भी होता है कि जो ऊपर से दिखाई पड़ता है वह भीतर से नहीं होता है। यही समीकरण उत्तर प्रदेश की दूसरी ताकतवर पार्टी समाजवादी पार्टी के बारे में भी सही उतरता है क्योंकि इसकी राजनीति का केन्द्र भी हिन्दुत्व के विरोध के साथ मुस्लिम-यादव गठजोड़ का रहा है। इसका सीधा अर्थ राजनीति में यही निकल सकता है कि यदि भाजपा कमजोर होगी तो इन दोनों पार्टियों बसपा व सपा की हालत भी स्वतः कमजोर हो जायेगी। मगर इसमें भाजपा का कहीं कोई दोष नहीं है क्योंकि 1951 से अपने जन्म जनसंघ के रूप में उदित होने के बाद से इस पार्टी ने कभी भी ‘हिन्दुत्व’ या राष्ट्रवाद का दामन नहीं छोड़ा है।
मायावती ने इस राजनीति का विरोध ‘मनुवाद’ के नाम पर बहुत चालाकी से किया और मुस्लिम मतदाताओं को दलितों के साथ अपने पक्ष में गोलबन्द करने की व्यूह रचना की जिससे राजनीति में उनके गुरु स्व. कांशीराम के उदय होने से पहले तक दलित व मुस्लिम समाज का कांग्रेस पार्टी से मोहभंग होना शुरू हुआ और ये समुदाय बसपा की तरफ आकर्षित होने लगे। मायावती ने इसी राजनीति को आगे बढ़ाया और इस काम में परोक्ष रूप से उनकी मदद स्व. मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी ने की जिसके मुखिया अब उनके सुपुत्र अखिलेश यादव हैं। मुलायम सिंह ने 1992 में बाबरी मस्जिद के ढहाये जाने के बाद मुस्लिम समाज में भाजपा का डर भरना शुरू किया और अपने वर्ग के यादवों में जाति गौरव भरकर यादवों के साथ मुस्लिम समाज को जोड़ने में सफलता प्राप्त की जिसकी वजह से कांग्रेस का ग्रामीण व दलित-मुस्लिम आधार शून्य होता चला गया और यह पार्टी उत्तर प्रदेश में रसातल में पहुंच गई। मगर वर्तमान सन्दर्भों में मायावती ने श्री दानिश अली जैसे ‘दानिशमन्द’ लोकसभा सदस्य की सदस्यता निलम्बित करके यही संकेत देने का प्रयास किया है कि वह भाजपा से किसी प्रकार का झगड़ा मोल लेना नहीं चाहती है क्योंकि दानिश अली ने खुलकर तृणमूल कांग्रेस की सांसद सुश्री महुआ मोइत्रा का साथ संसद में एक पूंजीपति के कथित हक में सवाल पूछने के मामले में खुल कर दिया। सबको मालूम है कि महुआ मोइत्रा के खिलाफ संसद में प्रश्न पूछने के मामले में धन की एवज में यह काम करने के आरोप लगाये गये थे और अपने सांसद के लाॅग इन पासवर्ड को पूंजीपति को दिये जाने की बात कही गई थी । इसकी जांच के लिए लोकसभा अध्यक्ष ने सदन की आचार समिति को अधिकृत किया। इस आचार समिति के सदस्य श्री दानिश अली भी थे। दानिश अली ने आचार समिति द्वारा महुआ मोइत्रा की जवाब तलबी के समय उनसे पूछे गये प्रश्नों पर घोर आपत्ति भी दर्ज की थी और बाद में उनके पक्ष में समिति की बैठक से वाकआऊट भी कर दिया था। बाद में सार्वजनिक रूप से भी उन्होंने महुआ जी के पक्ष में ही अपने विचार व्यक्त करते हुए समिति द्वारा उनके साथ किये गये व्यवहार को बदसलूकी तक बताया। उनके इस कृत्य के साथ ही इससे पहले के भी उनके वक्तव्यों व कार्यों को बहुजन समाज पार्टी के महासचिव श्री सतीश चन्द मिश्र ने पार्टी का अनुशासन तोड़ने वाला बताया है और लिखा है कि श्री दानिश अली को पहले भी मौखिक रूप से कई बार चेतावनी दी गई कि वह पार्टी की नीतियों के खिलाफ बयानबाजी या अन्य कोई काम न करें मगर वह ऐसा करने से बाज नहीं आये अतः उनकी सदस्यता निलम्बित की जाती है।
राजनीति में किसी भी उठाये गये कदम या फैसले के समय का भी बहुत महत्व होता है। बहिन मायावती ने दानिश अली को मुअत्तिल करने का ऐलान तब किया है जब हाल में ही सम्पन्न हुए विधानसभा चुनावों में उत्तर भारत के तीनों राज्यों में भाजपा को शानदार जीत मिली है। उनकी पार्टी विपक्षी गठबन्धन ‘इंडिया’ की सदस्य भी नहीं है। दूसरी तरफ भाजपा के एनडीए गठबन्धन में सिवाये उसके कोई अन्य महत्वपूर्ण पार्टी भी शामिल नहीं है क्योंकि शिवसेना, अकाली दल व जनता दल (यू) तीनों ही इससे बाहर हो चुके हैं। मायावती ने हाल के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के विरुद्ध अपने प्रत्याशी खड़े करने में भी कोई कोताही नहीं की। इसका एक ही मतलब निकाला जा सकता है कि मायावती केन्द्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की तरफ ‘प्रेम का हाथ’ बढ़ाना चाहती हैं। क्योंकि इससे पहले उत्तर प्रदेश में वह भाजपा के साथ ही मिलकर सरकार बना चुकी है। वर्तमान की राजनीति में मायावती की पार्टी को अपने अस्तित्व को बचाने का संकट भी महसूस हो रहा है।
आगामी लोकसभा चुनावों को देखते हुए मायावती आसानी से इस निष्कर्ष पर पहुंच सकती हैं कि भाजपा जिस एकात्म भाव से ये चुनाव लड़ेगी वह ऊर्जा विपक्षी गठबन्धन ‘इंडिया’ में नहीं है जिसकी सदस्य समाजवादी पार्टी है। दानिश अली को अपनी पार्टी से निकाल कर उन्होंने सन्देश दे दिया है कि वह भाजपा के हिन्दू समाज के चतुर्वर्णीय एकता के एजेंडे को ‘अछूत’ नहीं मानती हैं। दरअसल मायावती अब एनडीए का हिस्सा होना चाहती है।
उन्होंने दानिश अली को इसका माध्यम बनाने की कोशिश भर ही की है। उन पर किया गया यह जौर (अन्याय) बताता है कि पार्टी अनुशासन का हंटर केवल बसपा का वजूद बचाये रखने की तजवीज है और दानिश अली को हिदायत है कि तुम दाना ( विद्वान) कब से हो गये।

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