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न्यायाधीश के इस्तीफे का अर्थ

कलकत्ता हाईकोर्ट के न्यायाधीश अभिजीत गंगोपाध्याय ने अपने पद से इस्तीफा देकर और चुनावी राजनीति में उतरने का ऐलान करके सबको चौंकाया तो है ही। उनके इस फैसले से बार तो विभाजित है ही बल्कि उनके इस फैसले ने न्यायपालिका की विश्वसनीयता और प्रतिष्ठा पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। किसी न्यायाधीश का इस्तीफा देकर राजनीति में शामिल होना कोई नया नहीं है। भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश कोका सुब्बाराव ने राष्ट्रपति चुनावों में कांग्रेस के उम्मीदवार डा. जाकिर हुसैन के खिलाफ विपक्ष के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने से तीन माह पूर्व इस्तीफा दे दिया था। इसी तरह सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज बहरूल इस्लाम ने अपनी सेवानिवृत्ति से 6 सप्ताह पहले 1983 में इस्तीफा दे दिया था और वह बारापेटा (असम) संसदीय सीट से कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़े थे। ​जस्टिस अभिजीत गंगोपाध्याय पिछले 2 वर्षों में अपने न्यायिक आदेशों और मीडिया इंटरव्यू के कारण काफी चर्चित रहे हैं। जस्टिस गंगोपाध्याय लगातार तृृणमूल की ममता बनर्जी सरकार और उसके नेताओं को निशाना बनाते आए हैं। उन्होंने कहा कि मेरी आत्मा मुझ से कह रही है कि जज के रूप में मेरा कार्यकाल समाप्त हो गया है। मैं वामपंथी दलों, कांग्रेस या भाजपा में से किसी में भी शामिल होकर लोकसभा चुनाव लड़ सकता हूं। सवाल यह नहीं है कि वह किस पार्टी में शामिल होकर चुनाव लड़ेंगे या निर्दलीय रूप से चुनाव मैदान में उतरेंगे। सवाल यह है कि किसी जज का अपने पद से इस्तीफा देकर तुरंत चुनाव मैदान में उतरना क्या उचित है या अनुचित। प्राय: देखा जा रहा है कि सरकारी अधिकारी अपने पदों से इस्तीफा देकर किसी न किसी पार्टी में शामिल होकर चुनाव लड़ लेते हैं और जनप्रतिनिधि के रूप में खुद को प्रति​ष्ठापित कर लेते हैं। यह भी कहा जा रहा है कि उन्हें कई दलों ने चुनाव लड़ने की पेशकश भी कर दी है। जस्टिस अभिजीत गंगोपाध्याय ने 2022 में अपने एक फैसले में पश्चिम बंगाल के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों और गैर शिक्षण कर्मचारियों की भर्ती में कथित ​अनियमिताओं की सीबीआई जांच के आदेश दिए थे और उसके बाद एक मीडिया चैनल में इंटरव्यू दिया था। इस पर बंगाल सरकार ने आपत्ति की थी और देश की शीर्ष अदालत भी इस पर नाराज हुई थी। सुप्रीम कोर्ट नेे मौखिक रूप से टिप्पणी की थी कि न्यायाधीशों को लंबित मामलों में टीवी इंटरव्यू देने का कोई अधिकार नहीं है। इस इंटरव्यू में जस्टिस गंगोपाध्याय ने ममता बनर्जी के भतीजे और तृणमूल के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के खिलाफ टिप्पणियां की थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस केस को अन्य जज को ट्रांसफर करने का आदेश दिया था। इतना ही नहीं जस्टिस गंगोपाध्याय ने जस्टिस सोमेन सेन पर भी गंभीर आरोप लगाए थे। उन्होंने जस्टिस सोमेन सेन पर पार्टी विशेष को फायदा पहुंचाने का आरोप लगाया था। दो जजों से जुड़ा मामला भी सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था और उसने कलकत्ता हाईकोर्ट में फर्जी जाति प्रमाण पत्र के जरिए मैडिकल कॉलेजों में एडमिशन लेने के मामले में सुनवाई करने से भी रोक लगा दी थी। विवाद के महत्वपूर्ण बिंदू इस प्रकार रहे-
-कलकत्ता हाईकोर्ट के जस्टिस अभिजीत गंगोपाध्याय ने फर्जी जाति प्रमाण पत्र के जरिए मैडिकल कॉलेजों में एडिमशन लेने से जुड़े केस में आदेश दिया था कि बंगाल पुलिस जांच को सीबीआई को सौंप दें।
-हाईकोर्ट के ही दूसरे जज सोमेन सेन की अध्यक्षता वाली सिंगल बेंच ने बंगाल सरकार के अनुरोध पर जस्टिस अभिजीत गंगोपाध्याय के आदेश पर रोक लगा दी थी। साथ ही सीबीआई की दर्ज की गई एफआईआर भी रद्द कर दी।
-जस्टिस सोमेन ने कहा था कि राज्य एजेंसियां जिस केस की जांच कर रही हों उन्हें सीबीआई को सौंपने की हाईकोर्ट की असाधारण शक्ति का इस्तेमाल सावधानी से और असाधारण परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए।
-जस्टिस गंगोपाध्याय ने जस्टिस सोमेन के इस फैसले को ही अवैध करार दिया। साथ ही कहा कि मामले की सीबीआई जांच जारी रहेगी।
इस मामले को लेकर न्यायिक अनुशासन को लेकर भी गंभीर बहस शुरू हुई। जस्टिस गंगोपाध्याय ने उल्टा सुप्रीम कोर्ट को ही फरमान सुनाने शुरू कर दिए। इस प्रकरण ने 2017 के उस घटनाक्रम की याद दिला दी जिसमें कलकत्ता हाईकोर्ट के जस्टिस सीएस कर्णन ने शीर्ष अदालत से पंगा लिया था और शीर्ष अदालत के आठ जजों को 5 साल कैद की सजा सुना दी थी। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें 6 माह के लिए जेल में भेज दिया था। एक बार फिर न्यायपालिका में अनुशासन, न्यायाधीशों के आचरण, उनकी महत्वकांक्षाओं को लेकर बहस शुरू हो चुकी है। क्या किसी राजनीतिक दल के प्रति कड़ी टिप्पणियां जस्टिस गंगोपाध्याय की सियासी महत्वकांक्षाओं का आधार तैयार कर रही थी। इसका फैसला तो जनता ही करेगी। चुनाव लड़ना या राजनीतिक में आना गलत नहीं है लेकिन पद पर रहे व्यक्ति के लिए कम से कम एक ​निश्चित अवधि के बाद ही राजनीति में आना या पद लेना चाहिए।
आदित्य नारायण चोपड़ा
Adityachopra@punjabkesari.com

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