फिलिस्तीन और इजराइल

युद्ध चाहे कहीं भी हो और जैसा भी हो परन्तु उसकी परिणिती एक ही होती है कि उसमें अन्त में मानवता ही हारती है और शस्त्रों की जीत होती है तथा शस्त्र बनाने वाले और इन्हें सप्लाई करने वाले जमकर मुनाफा कमाते हैं। इजराइल और फिलिस्तीन के बीच हम जो नजारा देख रहे हैं उसमें अन्ततः मानवता को ही हारना है और दोनों ओर के निरीह नागरिकों को इसका शिकार बनना है, इसलिए हर युग में गांधीवाद का यह सिद्धांत कारगर रहेगा कि युद्ध को टालना ही किन्हीं भी दो देशों के राजनैतिक नेतृत्व की सबसे समझदारी होती है क्योंकि विनाश के बाद जो शान्ति स्थापित होती है उसमें सामान्य नागरिकों की त्रासदी और चीत्कार ही शामिल होता है। मगर जिस तरह फिलिस्तीन के आतंकवादी संगठन माने जाने वाले हमास ने इजराइल पर हमला करके क्रूरता दिखाई है उसके जवाब में यदि इजराइल भी उसी प्रकार की क्रूरता दिखाता है तो इसे भी मानवता के पक्ष में नहीं माना जा सकता क्योंकि मई 1948 में इजराइल के बनने के बाद से ही अरब-इजराइल संघर्ष की जो कहानी रही है उसे किसी भी दृष्टि से इस क्षेत्र में शान्ति को स्थायी बनाने के हक में नहीं कहा जा सकता परन्तु हमें हमास के आतंकवादी हमले की निन्दा करनी होगी क्योंकि उसकी इस कार्रवाई ने हिंसा के माध्यम से खौफ पैदा करने की शुरूआत की है।
बेशक भारत ने 1947 में राष्ट्र संघ में इजराइल को फिलिस्तीनी धरती पर एक नया राष्ट्र बनाने का विरोध किया था जो कि कुछ मूल सिद्धान्तों को लेकर था जिनमें प्रमुख यह था कि कोई भी धरती वहां पर रहने वालों की ही होती है परन्तु 75 साल गुजर जाने के बाद वैश्विक हालात के बदलने से अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में बदलाव आ चुका है और अर्थव्यवस्था के भूमंडलीकरण ने विभिन्न देशों के आर्थिक हित बदल कर रख दिये हैं। अतः यह बेवजह नहीं है कि 1991 में भारत में आर्थिक उदारीकरण का दौर शुरू होने के बाद भारत ने इजराइल के साथ पूर्ण राजनयिक सम्बन्ध स्थापित करने के बारे मे सोचा हालांकि इसने इजराइल को मान्यता 1950 में ही दे दी थी। इसके साथ ही 1990 में सोवियत संघ का विघटन होने के बाद जिस तरह वैश्विक सन्तुलन पूरी तरह एकल ध्रुवीय (अमेरिका के पक्ष में हुआ) उसने इजराइल की हैसियत को भी बदला क्योंकि 1948 में इजराइल की स्थापना की घोषणा के केवल आठ मिनट बाद ही अमेरिका ने इसे मान्यता प्रदान कर दी थी। परन्तु यह स्वीकार करना पड़ेगा कि जिस तरह भारत की ही भूमि पर बना हुआ पाकिस्तान आज एक हकीकत है उसी तरह इजराइल भी फिलिस्तीन की भूमि पर बना इजराइल भी एक वास्तविकता है। लेकिन हमें यह भी देखना होगा कि अमेरिका ने किस प्रकार दुनिया के दूसरे हिस्सों में आतंकवाद के मुद्दे को देखा है । अमेरिका ने खुद अपने ऊपर हुए तालिबानी आतंकवादी हमले से पहले भारत की इस दलील पर कोई ध्यान नहीं दिया कि पाकिस्तान अपनी सीमा से घुसपैठिये भेजकर भारत में आतंकवाद करा रहा है। अमेरिका लगातार पाकिस्तान को अफगानिस्तान में तालिबान लड़ाकुओं से लड़ने के नाम पर उसे भारी सैनिक व वित्तीय मदद देता रहा और बीस साल तक अफगानिस्तान में रहने के बाद खुद ही पूरा मुल्क अफगानिस्तान तालिबानों के ही हाथ में देकर वहां से वापस आ गया।
अफगानिस्तान में आज भी मानवता और मानवीय अधिकारों को तालिबान पैरों तले रौंद रहे हैं। अतः फिलिस्तीन व इजराइल की समस्या का हल भी बिना हिंसा का प्रयोग किये आपसी बातचीत से मानवीय पक्ष को सर्वोपरि रख कर ही निकलेगा। परन्तु दुनिया भर के यहूदियों को इजराइल में बुलाकर बसाने में ब्रिटेन ने प्रथम विश्व युद्ध के बाद से ही जो भूमिका निभाई और बाद में अमेरिका ने उसे जिस तरह का समर्थन दिया उससे अरब देशों में खौफ का माहौल पैदा हुआ और 1967 में पहली बार आठ अरब देशों ने संयुक्त रूप से इस्राइल पर हमला किया मगर पश्चिमी देशों व अमेरिका के समर्थन से इजराइल ने आठ दिन तक चले इस युद्ध में भारी विजय प्राप्त की। परन्तु पश्चिमी देशों ने अरब देशों के साथ भी इस क्षेत्र में लगातार कच्चे तेल के मिलते जाने से अपने सम्बन्ध मजबूत किये। जहां तक भारत का सम्बन्ध है तो वह कभी भी आतंकवाद के किसी भी स्वरूप का विरोधी रहा है अतः हमास के खिलाफ भारत की इजराइल के प्रति सहानुभूति स्वाभाविक है परन्तु भारत फिलिस्तीन के नागरिकों के हितों का भी समर्थक रहा है और पृथक फिलिस्तीनी संप्रभु राष्ट्र के हक में रहा है। लेकिन यह कार्य आपसी सहयोग व शान्तिपूर्ण तरीके से होना चाहिए और इस प्रकार होना चाहिए कि दोनों देशों के नागरिक शान्ति व सौहार्द के वातावरण में जी सकें। परन्तु इजराइल व फिलिस्तीन के बीच बंटवारा इस तरह का है कि यरुशलम शहर ही आधा फिलिस्तीन शासन के पास है और आधा इजराइल के। अतः दोनों तरफ से हिंसक कार्रवाइयों का चलना भी होता रहता है। इस स्थिति से निपटने के लिए कई बार अन्तर्राष्ट्रीय प्रयास हो चुके हैं मगर हिंसा का माहौल रहने से कभी भी कोई समझौता सफल नहीं हो सका चाहे वह कैम्प डेविड समझौता हो या ओस्लो समझौता अथवा अब्राहम समझौता। केवल 95 लाख की आबादी वाला इजराइल देश आज अगर विश्व की एक सैनिक शक्ति माना जाता है तो उसके कुछ वैश्विक कारण भी जरूर होंगे। अरब देशों को भी इस हकीकत को समझना होगा और उसके साथ बराबरी के स्तर पर व्यवहार करना होगा। भारत आतंकवाद के खिलाफ है मगर वह शान्ति के पक्ष में है।

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