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महुआ की संसद से विदाई

लोकसभा सांसद सुश्री महुआ मोइत्रा के मामले में सदन की गठित ‘आचार समिति’ की रिपोर्ट की सूचनाएं पहले ही छन- छन कर बाहर आने के बाद यह स्पष्ट हो चुका था कि उनकी लोकसभा सदस्यता समाप्त कर दी जायेगी। अतः आज लोकसभा में जांच समिति की रिपोर्ट रखे जाने के बाद जो फैसला हुआ वह अपेक्षित ही था। महुआ अभी से पूर्व सांसद हो गई है। मगर इसके साथ यह भी सत्य है कि उन पर धन के बदले संसद में प्रश्न पूछने के आरोप का कोई सत्यापन नहीं हुआ है और उनका लोकसभा से निष्कासन संसद द्वारा उन्हें आवंटित ‘लाॅग-इन पासवर्ड’ किसी ऐसे व्यक्ति को देने की वजह से हुआ है जिसका संसद के मामलों से कोई लेना-देना नहीं था। वह व्यक्ति पूंजीपति दर्शन हीरानन्दानी है। यह हकीकत स्वयं महुआ मोइत्रा ने आचार समिति के समक्ष स्वीकार की थी। समिति की राय में लाॅग-इन पासवर्ड किसी दूसरे व्यक्ति को देने से राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न जुड़ सकता है अतः उनका यह कार्य अपराध की श्रेणी में अनैतिक व अशोभनीय माना गया और उन्हें सदस्यता से हाथ धोना पड़ा। उनकी सदस्यता लोकसभा में संसदीय कार्यमन्त्री श्री जोशी द्वारा रखे गये प्रस्ताव को पारित करके उसी प्रकार ली गई जिस तरह 2005 में धन के बदले प्रश्न पूछने पर सहमत हुए दस लोकसभा सदस्यों की ली गई थी।
2005 में एक कोबरा पोस्ट वेबसाइट द्वारा एक स्टिंग आपरेशन लगभग आठ महीने तक चलाया गया था जिसमें तीन पत्रकारों ने एक फर्जी कम्पनी का प्रतिनिधि बनकर कुछ संसद सदस्यों को रिश्वत या धन देकर संसद में अपने मनमाफिक सवाल पूछने के लिए रजामन्द कर लिया था। बाद में इस पूरे वाकये को एक टीवी चैनल पर प्रसारित कर दिया गया था। जिसका संज्ञान स्वयं लोकसभा के तत्कालीन अध्यक्ष श्री सोमनाथ चटर्जी ने लिया था और तुरत-फुरत पूरे मामले की जांच करने के लिए कांग्रेस के नेता श्री पवन बंसल के नेतृत्व में एक बहुदलीय जांच समिति बना दी थी जिसमें विपक्ष की ओर से भाजपा नेता श्री विजय कुमार मल्होत्रा व समाजवादी पार्टी के श्री राम गोपाल यादव भी थे। समिति ने केवल 12 दिन के भीतर ही अपनी जांच पूरी करके 23 दिसम्बर, 2005 को अपनी रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष को सौंप दी थी जिसमें सभी दस लोकसभा सांसदों की सदस्यता समाप्त करने की सिफारिश की गई थी। परन्तु भाजपा के सदस्य श्री मल्होत्रा ने समिति की राय से असहमति दिखाते हुए अपना ‘असहमति पत्र’ लिखा था जिसमें कहा था कि वह इस गलत निष्कर्ष में खुद को शरीक करना नहीं चाहते क्योंकि समिति की कार्यवाही में संसदीय प्रणाली का कायदे से अनुपालन नहीं हुआ है। सदस्यता कुल 11 सांसदों की गई थी जिनमें एक सदस्य राज्यसभा के भी थे। उनकी सदस्यता भी राज्यसभा ने रद्द कर दी थी। इन 11 सांसदों में छह भाजपा के तीन बसपा के व एक- एक राजद व कांग्रेस के थे। जब लोकसभा में सदन के तत्कालीन नेता श्री प्रणव मुखर्जी ने दसों सांसदों की सदस्यता समाप्त करने का प्रस्ताव रखा और जब यह ध्वनिमत से पारित हो रहा था तो भाजपा सांसदों ने सदन से वाकआऊट करते हुए इसका विरोध किया और इस पार्टी के विपक्ष के तत्कालीन नेता श्री लालकृष्ण अडवानी ने कहा कि किसी संसद सदस्य की सदस्यता लेना उसी तरह है जैसे किसी को ‘फांसी’ की सजा दे दी जाये। यह भी सच है कि संसद की आचार समिति किसी आपराधिक या फौजदारी मामले में किसी प्रकार की जांच नहीं कर सकती। इसका अधिकार केवल अदालत को ही होता है परन्तु इसके साथ यह भी सच है कि संसद के भीतर किये गये या किये जाने वाले आचरण के बारे में सम्बन्धित सदस्य के खिलाफ कार्रवाई करने का पूर्ण अधिकार केवल संसद को ही होता है। इसी वजह से 2007 में इन 11 सांसदों की सदस्यता सर्वोच्च न्यायालय ने बहाल करने से इनकार कर दिया और संसद द्वारा किये गये फैसले को ही बहाल रखा।
महुआ मोइत्रा के मामले को अगर हम 2005 की नजीर पर कसें तो संसद के आज के फैसले को न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती। मगर इस प्रकरण का राजनैतिक आयाम भी है जिसे विपक्ष अब उठाने का प्रयास करेगा तभी वह महुआ मोइत्रा के हक में लामबन्द हो रहा है। इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि महुआ बहुत विदुषी महिला है और उन्हें जमीनी राजनीति का भी अनुभव है। वह कांग्रेस में रहते हुए तृणमूल कांग्रेस में आयी हैं और ममता बनर्जी के जुझारूपन से भी अच्छी तरह वाकिफ है। इसलिए वह इस मामले को यहीं छोड़ देंगी ऐसा नहीं लगता है परन्तु यह कोई राष्ट्रव्यापी मुद्दा भी नहीं बन सकता क्योंकि भाजपा ने वही करने की कोशिश की है जो 2005 में कांग्रेस नीत सरकार ने किया था। बेशक महुआ मोइत्रा के खिलाफ मूल शिकायत करने वाले भाजपा सांसद निशिकान्त दुबे की राजनीति पर भी विश्वसनीयता के सवाल उठाये जा सकते हैं मगर उनकी यह शिकायत तो सही पाई गई कि महुआ जी ने अपना सांसद का लाग-इन पासवर्ड हीरानन्दानी को दिया। लेकिन जांच समिति ने हीरानन्दानी के शपथ पत्र को ही पक्का सबूत मान लिया और उन्हें जवाब तलब करने की जहमत भी नहीं उठाई। महुआ मोइत्रा ने जांच समिति पर भी उनके साथ बदसलूकी करने के गंभीर आरोप लगाये। विपक्ष जाहिराना तौर पर ये मुद्दे अपने हक में इस्तेमाल कर सकता है। लोकतन्त्र में ऐसा करने की स्वतन्त्रता भी है।

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