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सिखों की देशभक्ति पर सन्देह नहीं होना चाहिए

एक समय था जब काबुल कंधार से लेकर कन्याकुमारी तक सिखों का राज हुआ करता था। इतना ही नहीं सिख राज के दौरान हिन्दू, मुस्लिम सहित अन्य समुदाय के लोगों को भी उतना ही सम्मान दिया जाता जितना सिखों को। उसके बाद देश पर अंग्रेजों ने कब्जा कर लिया मगर सिखों की बहादुरी के चलते पंजाब पर सबसे आखिर में आकर वह काबिज हुए। देश की आजादी की अगर बात करें तो आज़ादी की जंग में भी 86 फीसदी से अधिक कुर्बानियां सिखों ने दी। अगर यह कहा जाए कि सिखों से बढ़कर देशभक्ति किसी ओर में नहीं है तो कुछ गलत नहीं होगा मगर इसके बावजूद जब सिखों को आतंकवादी, देशद्रोही कहकर संबोधित किया जाता है तो समूचे सिख जगत के हृदय चोटिल हो जाते हैं। अभी हाल ही मंे पश्चिमी बंगाल में अपनी ड्यूटी कर रहे एक सिख आईपीएस अधिकारी जसप्रीत सिंह पर एक पार्टी विशेष के लोगों द्वारा अभद्र टिप्पणी करते हुए जसप्रीत सिंह को खालिस्तानी कहकर सम्बोधन किया गया जिसके बाद सिख समाज में आक्रोष होना स्वाभाविक था। जसप्रीत सिंह जैसे अफसर तो ढ़ूंढने से भी नहीं मिलते। उनका पूरा परिवार देश की सेवा करता आया है और आज भी उनके द्वारा अपनी किरत कमाई में से अनेक जरूरतमंद परिवारों के बच्चों को सिविल सर्विसिज की पढ़ाई करवा कर देश सेवा में लगाया जा रहा है। जसप्रीत के पारिवारिक सदस्यों को उन नासमझ लोगों के द्वारा की गई टिप्पणी से इतना दुख नहीं पहुंचा जितना उस पार्टी से जुड़े सिख नेताओं के द्वारा उन लोगों के समर्थन में की जा रही बयानबाजी से हुआ है। सिख नेताओं को जसप्रीत सिंह के समर्थन में आकर अपनी पार्टी के लोगों से माफी मंगवाई जानी चाहिए थी पर वह तो उल्टा जसप्रीत सिंह को ही ड्यूटी कैसे की जाए इसका ढंग सिखाने लगे। उधर किसानी बिल का विरोध कर सरकार से अपने हकों की मांग कर रहे किसानों को भी कुछ ऐसी ही सोच वाले लोगों के द्वारा खालिस्तानी और ना जाने क्या क्या कहकर सम्बोधित किया जा रहा है। 1984 के दशक में यह आम बात थी स्कूल कॉलेजों में अध्यापक तक सिख बच्चों को उग्रवादी कहकर संबोधित करते थे। सरकारी कार्यालयों, पब्लिक प्लेस, सड़कों पर सिखों को इसी नज़रिये से देखा जाता था क्योंकि उस समय की तत्कालीन सरकार ने सिखों की छवि ही ऐसी बना दी थी जिसे प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपाई और अब नरेन्द्र मोदी के द्वारा सुधारते हुए सिखों को उनका बनता मान सम्मान दिया जा रहा है। ऐसे लोगों को एक बात अच्छे से समझनी होगी कि सिखों ने देश के बंटवारे के समय जब ब्रिटिश हकूमत थाली में परोसकर अलग राष्ट्र भाव खालिस्तान दे रही थी उन्होंने तब नहीं लिया तो अब क्या ही लंगे। कुछ मुठ्ठी भर लोग कट्टरवादियों के बहकावे में आकर ऐसी सोच भले ही रखते हो मगर इसके लिए समूची सिख कौम को खालिस्तानी नहीं कहा जा सकता। उनकी देश भक्ति पर कतई सन्देह नहीं किया जा सकता। सरकारों के पास अनेक एजेन्सियां मौजूद रहती हैं जो ऐसे लोगों की पड़ताल कर सकती हैं। निश्चित तौर पर अगर कोई देश के खिलाफ बगावत करता है तो उसे सजा दी जाए पर पूरे सिख जगत को बदनाम करना ठीक नहीं होगा।
फौज में सिखों की कमी
एक समय था जब सिख युवा वर्ग फौज में भर्ती होकर देश की रक्षा करना अपना सौभाग्य समझता था मगर समय के साथ-साथ हालात बदलते गये और आज देखा जाए तो फौज में सिखों की गिनती दिन प्रतिदिन कम होती जा रही है। उच्च पदों पर तो सिख बहुत ही कम देखने को मिलते हैं। इसका एक कारण यह भी है कि आज पंजाब का युवा वर्ग विदेशों में जाने को उतावला रहता है। दूसरा सरकार की नीतियों में हुए बदलाव के चलते भी इसमें कमी पाई जा रही है। पहले फौजी अपने पारिवारिक सदस्यांे को भी फौज में भर्ती होने के लिए प्रेरित किया करता था। ऐसी ही कहानी है कर्नल मोहिन्दर सिंह जी की। जिनका जन्म 82 वर्ष पूर्व पाकिस्तान के सरगोधा में 25 फरवरी 1942 को पिता सरन सिंह एवं माता सभराई कौर के घर हुआ। 3 वर्ष बाद देश का विभाजन होने पर परिवार हरियाणा के मुस्ताबाद में आकर बस गया। बचपन से ही वह पढ़ाई में काफी तेज थे। मोहिन्दर सिंह ने कड़ी मेहनत करते हुए अपनी पढ़ाई पूरी कर दूरसंचार विभाग में करीब एक साल नौकरी करने के पश्चात् फौज में 01 जुलाई 1963 को ओटीएस पुणे में सेकेंड लेफ्टिनेंट के पद पर भर्ती होकर छठी बटालियन 11 गोरखा राइफल्स में कमीशन प्राप्त किया और उन्हें पदभार भी उनके प्रेरणास्त्रोत रहे उनके मामाजी कर्नल उत्तम सिंह राज के द्वारा सौंपा गया। काबिल अफसर होेने के चलते 1970-1974 में 5 वर्षों के लिए प्रधान मंत्री और राष्ट्रपति के प्रोटोकॉल आफिसर रहे। सभी साथियों के साथ प्रेमभाव से पेश आना और अपनी ड्यूटी को जिम्मेवारी से निभाना उनकी तरक्की का कारण था। फौज में रहते हुए भी उन्होंने धार्मिक गतिविधियों में भी अहम भूमिका निभाई और रिटायर्मेंट के बाद लखनऊ में रहकर 4 गुरुद्वारों में पदाधिकारी के तौर पर कार्य करते हुए युवा वर्ग को धर्म, मातृ भाषा और देश भक्ति की प्रेरणा देते रहे। मुझे भी साल 1984 में उनके साथ करीब 6 महीने बिताने का समय मिला उस समय वह मुम्बई में ड्यूटी पर थे। घर में ही उन्हांेने गुरु ग्रन्थ साहिब का प्रकाश किया हुआ था और दिनचर्या की शुरुआत पाठ पूजा से करते और शाम को घर आकर सभी बच्चों को साथ बिठाकर पाठ किया करते। बीते दिनों वह आत्मिक तौर पर भले इस संसार को अलविदा कह गये मगर उनकी यादें हमेशा हमारे बीच रहकर हमें धर्म और देश भक्ति की प्रेरणा देती रहेंगी।
दिल्ली के एेतिहासिक गुरुद्वारे
देश की राजधानी दिल्ली का सिख इतिहास से गहरा नाता है क्योंकि सिखों ने कई बार दिल्ली को जालिमों के कब्जे से मुक्ति करवाकर इतिहास कायम किया। कई सिख गुरु साहिबान के कदम दिल्ली की धरती पर पड़े और अनेक एेतिहासिक गुरधाम भी स्थापित हैं जिनके दर्शन करने के लिए सिख ही नहीं गैर सिख भी देश विदेश से आते हैं पर शायद इस इतिहास की जानकारी बहुत कम लोगों को होगी। इसी के चलते अमरीका निवासी बाबा दलजीत सिंह शिकागो वालों ने एक पुस्तक दिल्ली के गुरधामों पर लिखी है जिसमें कविताओं के रुप में इतिहास को दर्शाया गया है। आम तौर पर देखा जाता है जब भी कोई लेखक कोई पुस्तक लिखता है तो उसकी सोच रहती है कि उसे इससे कितना मुनाफा होगा। मगर बाबा दलजीत सिंह जी के द्वारा यह पुस्तक बिना किसी शुल्क के घर-घर तक पहुंचाने की सोच रखते हुए इसके सभी अधिकार दिल्ली गुरुद्वारा कमेटी को सौंप दिये हैं। कमेटी अध्यक्ष हरमीत सिंह कालका के द्वारा ही इसका विमोचन भी करवाया गया। इसी तरह से अगर अन्य लेखक भी आगे आकर इतिहास से जुड़ी पुस्तकें निकालें तो निश्चित तौर पर प्रचार को बढ़ावा मिलेगा।
तरलोचन सिंह को सम्मान
स. तरलोचन सिंह जिन्हें अनेक प्रधानमंत्रियों, मुख्यमंत्रियों के साथ कार्य करने का मौका मिला। देश के राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के सलाहकार के रुप में सेवा निभाई। उसके बाद राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग में बतौर प्रथम सिख चेयरमैन के पद पर नियुक्ति होकर समूचे सिख समुदाय को सम्मान दिलाया। उनके द्वारा हाल ही में एक पुस्तक ‘‘हिस्टोरिक जर्रनी’’ का विमोचन किया गया जिसमें उन्होंने अपने जीवन से जुड़े तथ्यों को विस्तारपूर्वक दर्शाया है जो आज की युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणास्त्रोत बनेंगे। उन्होंने बताया है कि कैसे एक मामूली से बच्चे ने अपनी मेहनत और लग्न के साथ कार्य करते हुए इस मुकाम को हासिल किया। अनेक सिख नेता उनके मार्गदर्शन से ही कार्य करते आए हैं। बीते दिनों पंजाबी बाग क्लब में गुरिन्दर सिंह राजू व उनकी टीम ने स. तरलोचन सिंह एवं भाजपा नेता मनजिन्दर सिंह सिरसा को उनके किये कार्यों के लिए सम्मानित किया। दिल्ली कमेटी के अधीन चल रहे खालसा कालेज में भी बतौर चेयरमैन रहते उन्होंने कई तरह के सुधार किये। खास तौर पर मातृ भाषा पंजाबी के प्रचार पर जोर देते हुए सभी पंजाबियों को अपने घरों में बच्चों से बातचीत का माध्यम पंजाबी अपनाने की अपील की गई। उनका मानना है कि केवल हर साल मातृ भाषा दिवस मनाकर अपनी जिम्मेवारी से नहीं भाग सकते इसका लाभ तभी है जब हम अपने घरों से इसकी शुरुआत करके स्कूलों, कालेजों और सरकारी कार्यालयों में भी इसे अपनाएं।

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