Adil Mansuri Poetry: आदिल मंसूरी की कलम से 8 चुनिंदा शेर

Khushi Srivastava

मेरे टूटे हौसले के पर निकलते देख कर
उस ने दीवारों को अपनी और ऊंचा कर दिया

किस तरह जमा कीजिए अब अपने आप को 
काग़ज़ बिखर रहे हैं पुरानी किताब के

ज़रा देर बैठे थे तन्हाई में
तिरी याद आंखें दुखाने लगी

कोई ख़ुद-कुशी की तरफ़ चल दिया
उदासी की मेहनत ठिकाने लगी

मुझे पसंद नहीं ऐसे कारोबार में हूं
ये जब्र है कि मैं ख़ुद अपने इख़्तियार में हूं

जीता है सिर्फ़ तेरे लिए कौन मर के देख
इक रोज़ मेरी जान ये हरकत भी कर के देख

सोए तो दिल में एक जहां जागने लगा
जागे तो अपनी आंख में जाले थे ख़्वाब के

फूलों की सेज पर ज़रा आराम क्या किया
उस गुल-बदन पे नक़्श उठ आए गुलाब के