Khushi Srivastava
किस तरह किनारों को है सीने से लगाए
ठहरे हुए पानी की अदा तुम भी तो देखो
आहट पे कान दर पे नज़र इस तरह न थी
एक एक पल की हम को ख़बर इस तरह न थी
चाहते तो किसी पत्थर की तरह जी लेते
हम ने ख़ुद मोम की मानिंद पिघलना चाहा
अक्स हर रोज़ किसी ग़म का पड़ा करता है
दिल वो आईना कि चुप-चाप तका करता है
मैं कहां जाऊं कि पहचान सके कोई मुझे
अजनबी मान के चलता है मुझे घर मेरा
बहते पानी की तरह दर्द की भी शक्ल नहीं
जब भी मिलता है नया रूप हुआ करता है
आप वो स्याने रस्ते के हर पत्थर को बुत मान लिया
हम वो पागल अपनी राह में आप ही ख़ुद दीवार हुए । (ai generated)