By Bhawana Rawat

Oct 17, 2025

'तू किसी रेल सी गुज़रती है...' दुष्यंत कुमार के खूबसूरत शेर 

shayari

Source: Social Media

वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है  माथे पे उस के चोट का गहरा निशान है 

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कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता एक पत्थर तो तबीअ'त से उछालो यारो

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मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में  सही हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए

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सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मिरा मक़्सद नहीं मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए

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कहां तो तय था चरागां हर एक घर के लिए कहां चराग़ मयस्सर नहीं शहर के  लिए

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तू किसी रेल सी गुज़रती है मैं किसी पुल सा थरथराता हूं 

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पूरा घर अंधियारा, गुमसुम साए हैं कमरे के कोने पास खिसक आए हैं