Javed Akhtar Poetry: “होंटों पे लतीफ़े हैं…” जावेद अख़्तर के खूबसूरत शेर

Khushi Srivastava

ऊंची इमारतों से मकां मेरा घिर गया
कुछ लोग मेरे हिस्से का सूरज भी खा गए

डर हम को भी लगता है रस्ते के सन्नाटे से
लेकिन एक सफ़र पर ऐ दिल अब जाना तो होगा

तब हम दोनों वक़्त चुरा कर लाते थे
अब मिलते हैं जब भी फ़ुर्सत होती है

इन चराग़ों में तेल ही कम था
क्यूं गिला फिर हमें हवा से रहे

जिधर जाते हैं सब जाना उधर अच्छा नहीं लगता
मुझे पामाल रस्तों का सफ़र अच्छा नहीं लगता

धुआं जो कुछ घरों से उठ रहा है
न पूरे शहर पर छाए तो कहना

इस शहर में जीने के अंदाज़ निराले हैं
होंटों पे लतीफ़े हैं आवाज़ में छाले हैं

मैं पा सका न कभी इस ख़लिश से छुटकारा
वो मुझ से जीत भी सकता था जाने क्यूं हारा