Momin Khan Mohin Poetry: मोमिन ख़ाँ मोमिन के बेमिसाल शेर

Khushi Srivastava

ग़ैरों पे खुल न जाए कहीं राज़ देखना
मेरी तरफ़ भी ग़म्ज़ा-ए-ग़म्माज़ देखना

उस नक़्श-ए-पा के सज्दे ने क्या क्या किया ज़लील
मैं कूचा-ए-रक़ीब में भी सर के बल गया

माँगा करेंगे अब से दुआ हिज्र-ए-यार की
आख़िर तो दुश्मनी है असर को दुआ के साथ

मज्लिस में मिरे ज़िक्र के आते ही उठे वो
बदनामी-ए-उश्शाक़ का एज़ाज़ तो देखो

कर इलाज-ए-जोश-ए-वहशत चारागर
ला दे इक जंगल मुझे बाज़ार से

हो गया राज़-ए-इश्क़ बे-पर्दा
उस ने पर्दे से जो निकाला मुँह

इतनी कुदूरत अश्क में हैराँ हूँ क्या कहूँ
दरिया में है सराब कि दरिया सराब में

किसी का हुआ आज कल था किसी का
न है तू किसी का न होगा किसी का

दाग़ दुनिया ने दिए ज़ख़्म ज़माने से मिले 
हम को तोहफ़े ये तुम्हें दोस्त बनाने से मिले