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पूर्वोत्तर में भाजपा की उपलब्धि

भारत के तीन पूर्वोत्तर राज्यों मेघालय, नागालैंड व त्रिपुरा में में जिस प्रकार पुराने सत्तारूढ़ दलों व गठबन्धनों की हाल ही में सम्पन्न चुनावों में पुनः विजय हुई है उससे यह तो स्पष्ट है

भारत के तीन पूर्वोत्तर राज्यों मेघालय, नागालैंड व त्रिपुरा में में जिस प्रकार पुराने सत्तारूढ़ दलों व गठबन्धनों की हाल ही में सम्पन्न चुनावों में पुनः विजय हुई है उससे यह तो स्पष्ट है कि इन राज्यों में केन्द्र में सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा ने स्थानीय क्षेत्रीय दलों के साथ जो गठजोड़ बनाये हैं वे मोटे तौर पर राजनैतिक रूप से सफल हैं। मगर इसके साथ यह भी स्वीकार करना होगा कि इन राज्यों में विपक्षी दल जिस प्रकार तितर-बितर होकर चुनाव लड़े हैं, उनके प्रति भी यहां की जनता में आकर्षण है। मगर इन सब समीकरणों के बीच मेघालय एेसा अपवाद है जहां हम निश्चित रूप से कह सकते हैं कि इस राज्य में स्थानीय देशज क्षेत्रीय पार्टियों का ही वर्चस्व रहा है और चुनावों में उन पर भाजपा के अलग से चुनाव लड़ने का भी कोई असर नहीं पड़ा है। राज्य की 60 सदस्यीय विधानसभा के 59 स्थानों पर चुनाव हुए थे जिनमें से 26 पर श्री कोनराड संगमा की एनपीपी पार्टी की विजय हुई और भाजपा केवल दो स्थान ही जीत सकी। इस प्रदेश के विचित्र समीकरण चुनाव में बने। कोनराड संगमा के पुराने सत्तारूढ़ मेघालय डेमोक्रेटिक मोर्चे के सभी घटक दल एक-दूसरे के खिलाफ जमकर चुनाव लड़े और प्रचार में सभी ने एक-दूसरे के विरुद्ध जमकर आरोप-प्रत्यारोप लगाये। 
भाजपा के नेताओं ने तो पुरानी संगमा सरकार को भ्रष्टतम सरकार कहा जबकि उस सरकार में वह स्वयं भी शामिल थी। इसी प्रकार यूडीपी पार्टी के नेताओं ने भी मुख्यमन्त्री संगमा की आलोचना में कोई कसर नहीं छोड़ी। राज्य में कांग्रेस को पांच व तृणमूल कांग्रेस को भी पांच सीटें मिली जबकि यूडीपी को 11 सीटें मिलीं। अब श्री संगमा ने पुनः मुख्यमन्त्री पद की शपथ ले ली है और उनकी सरकार में भाजपा व यूडीपी समेत एक अन्य क्षेत्रीय दल भी शामिल है। दो विधायकों वाली भाजपा को सरकार में शामिल करना बताता है कि पूर्वोत्तर राज्य आर्थिक रूप से केन्द्र पर निर्भर रहते हैं अतः वे केन्द्र में सत्तारूढ़ पार्टी की उपेक्षा नहीं कर सकते। मगर नागालैंड में स्थिति दूसरी है। यहां एनडीपीपी पार्टी के मुखिया नेफियो रियो के साथ भाजपा का गठबन्धन था और पिछली सरकार भी इसी गठबन्धन की थी। इस गठबन्धन को चुनावों में 37 सीटें मिलीं। जबकि इसके मुख्य विरोधी क्षेत्रीय दल एनपीएफ को केवल दो सीटें ही मिल पायीं जबकि एनडीडीपी का उदय एनपीएफ से ही हुआ था। यहां कांग्रेस का कोई प्रत्याशी नहीं जीता मगर जनता दल (यू), राष्ट्रवादी कांग्रेस, लोक जनशक्ति पार्टी आदि के खाते में भी अच्छी खासी सीटें गईं। श्री शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी सात सीटें जीत गई जबकि जनता दल व लोजपा भी कुछ सीटें जीतने में सफल रहीं। गठबन्धन में भाजपा के 12 विधायक जीते।
इस राज्य की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि पिछली विधानसभा में यहां विपक्ष के नाम पर कोई विधायक था ही नहीं। सभी पार्टियों के जीते हुए विधायकों ने नेफियो सरकार को अपना समर्थन दे रखा था। एेसा इस राज्य की विशेष परिस्थितियों की वजह से ही था क्योंकि श्री नेफियो नगा लोगों के लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में शामिल होने के प्रतीक माने जाते हैं। नगालैंड में अति चरमपंथी विचारधारा के चलते काफी लम्बे अर्से तक अलगाववाद चलता रहा है। यहां भी श्री नेफियो ने पुनः मुख्यमन्त्री पद की शपथ ले ली है। इस राज्य की विधानसभा में विपक्ष का न होना बताता है कि सभी राजनैतिक दल नगालैंड के भारत में सम्पूर्ण व सर्वांगीण एकीकरण के पक्ष में हैं। अब यदि बंगलादेश से सटे राज्य त्रिपुरा को लिया जाये तो इसका इतिहास व भूगोल अन्य पहाड़ी पूर्वोत्तर राज्यों से पूर्णतः अलग है। 
1963 से 1977 तक यहां कांग्रेस की सरकारें चलीं मगर इसके बाद 2018 तक इस राज्य में मार्क्सवादी पार्टी की सरकारें रहीं। इनमें सबसे लम्बे अर्से 25 वर्ष तक श्री माणिक सरकार मुख्यमन्त्री रहे जो पूरे देश में अपनी सादगी और साफगोई के लिए प्रसिद्ध थे परन्तु उनकी सरकार भारत की बदलती परिस्थितियों के साथ कदमताल नहीं कर सकी और 2018 के चुनावों में भाजपा ने इस राज्य में जोरदार तरीके से प्रवेश एक स्थानीय जनजातीय पार्टी के साथ गठजोड़ करके किया और विजय पायी। हालांकि भाजपा ने जिन विप्लव देब को मुख्यमन्त्री बनाया वह पूरी तरह नाकाबिल और बयान बहादुर साबित हुए और अपने अधकचरे ज्ञान के लिए जाने गये जिसकी वजह से भाजपा ने चुनावों से एक वर्ष पहले ही मुख्यमन्त्री बदला और दान्तों के डाक्टर माणिक साहा को मुख्यमन्त्री बनाया। उन्होंने भाजपा सरकार की छवि को बदलने में मदद की जिसकी वजह से 60 सदस्यीय विधानसभा में इस पार्टी को 32 सीटें मिली मगर इसके वोट प्रतिशत में दस प्रतिशत की कमी दर्ज हुई। दूसरी तरफ एक- दूसरे की प्रतिद्वंद्वी माने जाने वाली कांग्रेस व मार्क्सवादी पार्टी ने गठबन्धन किया और मिल कर चुनाव लड़ा मगर सफलता हासिल नहीं हुई और केवल 14 सीटें ही मिल सकीं। जबकि त्रिपुरा के पूर्व महाराजा प्रध्युत देव बर्मन की नई पार्टी टिपरा मोथा को 13 सीटें मिलीं। इस राज्य में भाजपा ने मा​िणक साहा को ही पुनः मुख्यमन्त्री बनाने का फैसला किया है। इससे लगता है कि भाजपा ने स्वतन्त्र रूप से किसी एक पूर्वोत्तर राज्य में अपनी पहचान बनाने में सफलता प्राप्त की है। पूर्वोत्तर में भाजपा की यही उपलब्धि कही जायेगी। 
आदित्य नारायण चोपड़ा
Adityachopra@punjabkesari.com

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