असम-मेघालय खूनी संघर्ष

असम और मेघालय की सीमा पर फिर खूनी टकराव में 6 लोगों की मौत हो गई जिनमें से पांच लोग मेघालय के थे ओर एक असम का वन रक्षक भी है। जैसे ही मेघालय के पांच लोगों के मरने की खबर वायरल हुई उसके बाद राज्य के सात जिलों में हिंसा फैल गई।

असम और मेघालय की सीमा पर फिर खूनी टकराव में 6 लोगों की मौत हो गई जिनमें से पांच लोग मेघालय के थे ओर एक असम का वन रक्षक भी है। जैसे ही मेघालय के पांच लोगों के मरने की खबर वायरल हुई उसके बाद राज्य के सात जिलों में हिंसा फैल गई। यद्यपि यह मामला सीमा से सटे जंगल में तस्करी की लकड़ी ले जा रहे मेघालय के लोगों पर असम पुलिस और वन विभाग में फायरिंग से जुड़ा हुआ है। लेकिन इसकी जड़ में दोनों राज्यों का सीमा विवाद है। असम का पड़ोसी राज्यों से सीमा विवाद वर्षों पुराना है। जिसे लेकर दोनों राज्यों में खूनी संघर्ष देखने को मिलता रहा है। इस बार का संघर्ष जयंतिया हिल्स के मुकरोह इलाके में हुआ है। वर्ष 2010 में भी ऐसी ही एक हिंसक घटना हुई थी तब लांगपिट्ट इलाके में 4 लोगों की मौत हो गई थी। पिछले वर्ष जुलाई महीने में असम और मिजोरम के बीच सीमा विवाद पर खूनी संघर्ष देखने को मिला था जिसमें 6 जवानों की मौत हो गई थी। इसके बाद भड़की हिंसा में 100 से ज्यादा नागरिक और सुरक्षाकर्मी घायल हो गए थे। दोनों राज्यों की पुलिस सीमा पर ऐसे आपस में भिड़ी थी जैसे किसी दो देशों में युद्ध लड़ा जाता है। पिछले कुछ वर्षों से लगातार दोनों राज्यों के बीच समझौते होते रहे हैं। कहा तो यह जाता रहा है कि 20 प्रतिशत क्षेत्रों को लेकर विवाद का निपटारा हो चुका है। वर्ष 2019 में अमित शाह के गृहमंत्री बनने के बाद पूर्वोत्तर क्षेत्र के राज्यों के बीच सीमा विवाद और उग्रवाद की समस्याओं को सुलझाने के लिए कई समझौते किए गए। इसी वर्ष असम और मेघालय के बीच भी समझौता हुआ था। इस समझौते के बाद दोनों राज्यों में 12 में से 6 जगहों का विवाद सुलझाने का दावा किया गया था। समझौते के अनुसार असम 18.51 वर्ग किलोमीटर जमीन अपने पास रखेगा और 18.28 वर्ग किलोमीटर मेघालय को दे देगा। यह जमीनें कुल 36 गांवों में फैली हैं।
असम और मेघालय एक-दूसरे से 885 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करते हैं। 1970 से पहले मेघालय, असम का ही एक हिस्सा हुआ करता था। विभाजन के समय से लेकर अब तक सीमा विवाद बना हुआ है। 12 इलाके ऐसे हैं जिनको लेकर दोनों राज्यों की सरकारों के बीच लंबे समय से चर्चा, समझौतों और प्रस्तावों का दौर चल रहा है। इन सब प्रयासों के बावजूद कई बार हिंसक घटनाएं हो चुकी हैं। दोनों राज्यों के बीच ऊपरी ताराबारी, गजांग रिजर्व फॉरेस्ट, हाहि, लांगपिह, बोरदुआर, बोकलापड़ा, नोन्गवाह, मतामुर, खानपाड़ा-पिलंगकाटा, देशदेमोरेह के ब्लॉक-1 और 2 के साथ-साथ खांडुली और रेटाचेरा में सीमा विवाद है। ताजा विवाद पश्चिमी गारो हिल्स क्षेत्र में बसे लांगपिह (मेघालय) में हुआ है। इस जिले की सीमा असम के कामरूप जिले से लगी हुई है। लंबे समय से यही इलाका विवाद की जड़ है। स्थानीय लोगों के घर बनाने, पेड़ों की कटाई करने या खेती करने को लेकर एक-दूसरे की ओर से आपत्ति दर्ज कराई जाती है। वन क्षेत्र होने की वजह से दोनों राज्यों की वन पुलिस यहां आमने-सामने आ जाती है। पिछली कुछ घटनाओं में पुलिस और वन पुलिस के लोग भी हिंसक संघर्षों में मारे जा चुके हैं।
असम राज्य पूर्वोत्तर के सभी राज्यों से लगा हुआ है। इसकी सीमाएं मेघालय, म​िणपुर, नागालैंड, त्रिपुरा और अरुणाचल से सटी हुई है। इसमें कोई संदेह नहीं कि मोदी सरकार ने पूर्वोत्तर के राज्यों में शांति की स्थापना के लिए बहुत काम किया है। पूर्वोत्तर राज्यों की विविध जातीय परम्परा, सांस्कृतिक और भाषायी विरासत अतुलनीय है। पूर्वोत्तर के सभी राज्य मानव पूंजी, प्राकृतिक संसाधन, जैव विविधता और प्राकृतिक सुंदरता से समृद्ध हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी  बार-बार यह दोहराते हैं कि पूर्वोतर में देश के विकास का ईंजन बनने की क्षमता है। यह काफी सुखद है कि मोदी सरकार ने तेजी से पूर्वोत्तर के राज्यों में विकास की बयार बहाकर सूरत बदल दी। आज़ादी के बाद से ही 6 दशकों तक केन्द्र की सरकारों ने इन राज्यों को नजरअंदाज किया और इन राज्यों के महत्वपूर्ण मुद्दों को समझने और सुलझाने का प्रयास ही नहीं किया। भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, अशांति और पिछड़ेपन के कारण युवाओं ने हथियार भी उठाए। इसी कारण असम, मणिपुर, नागालैंड आदि राज्यों में सशस्त्र विद्रोह देखने को मिला। अब जबकि पूर्वोत्तर के राज्यों में हिंसक घटनाएं मामूली रह गई हैं, तो असम और मेघालय सीमा पर हुई हिंसा काफी दुखद है। सीमा विवाद के अन्य बिंदुओं को सुलझाने के लिए दोनों राज्यों के मुख्यमंत्री इसी महीने के अंत तक बातचीत करने वाले थे लेकिन इस हिंसा में एक बार फिर तनाव की स्थिति पैदा कर दी है। सीमा विवाद को सुलझाने की कोशिशें जारी रहने के बीच सीमा पर जब से लोगों के बसने की गति बढ़ी है तब से इस विवाद के साथ राजनीति भी जुड़ गई है। समझौतों  के बावजूद इन पर काम नहीं होने से ओवरलैप वाले इलाकों में काम नहीं हुआ है। क्योंकि दोनों सरकारें अभी तक अपना दावा छोड़ने को तैयार नहीं है। सीमा विवाद तो महाराष्ट्र, कर्नाटक, हिमाचल, उत्तर प्रदेश बिहार और ओड़िसा जैसे राज्यों में भी चल रहा है, लेकिन पूर्वोत्तर के राज्यों में सीमा ​विवाद अंग्रेजों के जमाने से है। जमीन किस रियासत के पास थी, इसे एक से ज्यादा बार परिभाषित किया गया है। राज्य अपनी सहूलियत से नियम मान रहे हैं। बेहतर यही होगा कि राज्य सरकारें आपस में मिल बैठक कर सीमा विवाद का निपटारा करें और राज्यों के सतत विकास का मार्ग प्रशस्त करें।
आदित्य नारायण चोपड़ा
Adityachopra@punjabkesari.com

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