हिजाब और हिन्दोस्तान

हिजाब काे लेकर कर्नाटक उच्च न्यायालय की पूर्ण त्रिसदस्यीय पीठ के समक्ष जो पक्ष-विपक्ष की सुनवाई चल रही है उसमें यह मुद्दा सतह पर आ रहा है कि मुस्लिम छात्राओं का हिजाब पहनना उनकी धार्मिक स्वतन्त्रता का हिस्सा है जिसकी गारंटी संविधान के अनुच्छेद 25 में दी गई है।

हिजाब काे लेकर कर्नाटक उच्च न्यायालय की पूर्ण त्रिसदस्यीय पीठ के समक्ष जो पक्ष-विपक्ष की सुनवाई चल रही है उसमें यह मुद्दा सतह पर आ रहा है कि मुस्लिम छात्राओं का हिजाब पहनना उनकी धार्मिक स्वतन्त्रता का हिस्सा है जिसकी गारंटी संविधान के अनुच्छेद 25 में दी गई है। इस अनुच्छेद के अनुसार प्रत्येक भारतीय नागरिक को अपने धर्म के अनुसार आचरण करने का अधिकार दिया गया है, बशर्ते उससे किसी प्रकार से जन व्यवस्था (पब्लिक आर्डर) में गड़बड़ी पैदा न हो। सर्व प्रथम विचारणीय यह है कि भारत की धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था में किसी भी नागरिक के अपने धर्म की व्यवस्थाएं क्या होती हैं जिनके पालन से वह हिन्दू या मुसलमान कहलाता है। जाहिर है इनका किसी भी व्यक्ति की पोशाक या पहनावे से कोई मतलब नहीं होता क्योंकि प्रत्येक देश या क्षेत्र की जलवायु के अनुसार ये पहनावे तय होते हैं। 
भारत के विभाजन से पहले पूरे पंजाब प्रान्त के सभी हिन्दू-मुसलमानों का पहनावा एक समान ही होता था और उनकी भाषा भी एक ही पंजाबी ही होती थी। इसी प्रकार बंगाल में सभी बंगालियों का पहनावा और खान-पान भी एक समान ही होता था। मगर पाकिस्तान बनने के बाद जिस प्रकार मुस्लिम उलेमाओं और मुल्ला-मौलवियों ने पाकिस्तान में बंटे भारत के बंगाल व पंजाब के हिस्सों का इस्लामीकरण करना शुरू किया उससे पूर्वी बंगाल व पश्चिमी पंजाब (पाकिस्तान) के लोगों की वेशभूषा को बदलने का भी बाकायदा अभियान चलाया गया जो पंजाब के पाकिस्तान में तो एक सीमा तक आंशिक रूप से सफल हुआ परन्तु पूर्वी बंगाल के लोगों ने इसे पूरी तरह नकार दिया और अपनी बंगाली संस्कृति पर मजहबी इस्लामी कट्टरवाद की छाया नहीं पड़ने दी परन्तु फिर भी इस इलाके में जमाते इस्लामी तंजीमें अपना धार्मिक तास्सुबी एजेंडा जारी रखे रहीं जो कि आज भी स्वतन्त्र बांग्लादेश में एक समस्या बना हुआ है परन्तु आज के पाकिस्तान में कट्टर इस्लामी तंजीमों ने मुल्ला-मौलवियों की मदद से अपनी इस्लामी मीम का शिकार सबसे ज्यादा महिलाओं को ही बनाया और उनके लिबास तक को धार्मिक दायरे में लाकर उन्हें समाज में बराबरी में आने से रोका और कुल मिलाकर पुरुष की सम्पत्ति के रूप में देखा।
इसके बावजूद पंजाब की महिलाओं ने अपनी मूल संस्कृति के अनुसार ऐसे  लादे गये रीति-रिवाजों का विरोध किया और पंजाब की उन्मुक्त स्त्री-पुरुष की बराबरी की संस्कृति का पालन करना कमोबेश नहीं छोड़ा परन्तु इतना होने के बावजूद मुल्ला-मौलवियों ने पाकिस्तान में स्त्रियों को बराबरी पर नहीं आने दिया और उनके आधुनिक व वैज्ञानिक विचारों को इस तरह दबाया कि इस देश की महिलाओं के इंजीनियर, डाक्टर व कम्प्यूटर विशेषज्ञ होने के बाद अधिकतम महिलाओं को घरों में ही कैद होकर रहना पड़ रहा है। यह इस वजह से है कि पाकिस्तान में किशोरावस्था में ही वहां की छात्राओं को धार्मिक पोशाकों का गुलाम बना दिया जाता है और उनके आधुनिक होने को सामाजिक क्षेत्र में ‘बदजात’ होने तक का तगमा लगा दिया जाता है। 
इस बात को कान खोल कर सुना जाये कि भारत किसी भी तौर और तर्ज से पाकिस्तान नहीं है और न ही यहां इस्लामी कट्टरपंथियों को मुसलमान नागरिकों को बरगलाने की इजाजत भारत का संविधान देता है। हम एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र इसी वजह से हैं कि इसके हर सार्वजनिक सामाजिक व आर्थिक क्षेत्र से धर्म को दूर रखा जाये जिससे हर हिन्दू-मुसलमान को हुकूमत एक नजर से देख सके। इसलिए जब कोई मुस्लिम छात्रा किसी विद्यालय में पढ़ने जाती है तो वह केवल एक विद्यार्थी होती है और स्कूल की पुस्तकें ही उसका ईमान होती हैं। (धार्मिक व भाषाई अल्पसंख्यक स्कूलों की स्थिति अलग है जिसकी इजाजत संविधान में है)। अतः आजकल मुस्लिम उलेमा व कुछ अल्संख्यक तंजीमें जिस प्रकार कर्नाटक के उडिपी के स्कूल की एक छात्रा मुस्कान को विद्यालय परिसर के दायरे में ‘अल्लाह-हू-अकबर’ का उद्घोष करने पर ‘हीरो या नायिका’ बनाने की कोशिश कर रही हैं वह पूर्ण रूप से गलत है क्योंकि इससे शिक्षण संस्थाओं में मुस्लिम समाज की छात्राओं की स्थिति अलगाव में रहने की ही बनती है जबकि शिक्षा का उद्देश्य सभी विद्यार्थियों में प्रतिभा भरने का होता है और प्रतिभा यह देख कर नहीं भरी जा सकती कि किसने हिजाब पहना है और किसने नहीं। स्वतन्त्र व धर्म निरपेक्ष भारत में औरत की ‘हया व शर्म’ को ‘धर्म’ का जामा पहनाने से भारतीय नारी की तरक्की को रोकने के उपाय पिछली सदियों की प्रतिगामी सोच है जिसके चलते मुस्लिम समाज में फौरी तीन तलाक जैसी कुप्रथाएं जारी थीं। नागरिकों के मूल अधिकारों के दौर में हम धर्म की भूमिका को कोई भी सजग नागरिक केवल घर तक ही सीमित रखने का हिमायती हो सकता है चाहे वह स्त्री हो या पुरुष । अतः मुस्लिम समाज की महिलाओं को ही ऐसे सभी बन्धनों से मुक्ति पाने की तलाश करनी चाहिए जो धर्म के नाम पर उन्हें तंग रस्मोरिवाज की बेड़ियां पहना कर केवल गुलाम ही बनाये रखना चाहती हैं।  हिजाब के बहाने यह अवसर मुस्लिम समाज में सुधारवादी तहरीक चलाने का है ।
  ‘‘क्या फर्ज है कि सबको मिले एक सा जवाब
  आओ न हम भी सैर करें ‘कोह—ए-तूर’ की।’’
आदित्य नारायण चोपड़ा
Adityachopra@punjabkesari.com

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