चीन की नीयत समझना जरूरी

भारत-चीन के सम्बन्धों के बारे में भारतवासियों की नजर में कहीं कोई गफलत की जगह नहीं है क्योंकि यह वह देश है जिसने 1962 में भारत की पीठ में छुरा घोंपते हुए आक्रमण कर दिया था और अपनी फौजें असम के ‘तेजपुर’ तक भेज दी थीं।

भारत-चीन के सम्बन्धों के बारे में भारतवासियों की नजर में कहीं कोई गफलत की जगह नहीं है क्योंकि यह वह देश है जिसने 1962 में भारत की पीठ में छुरा घोंपते हुए आक्रमण कर दिया था और अपनी फौजें असम के ‘तेजपुर’ तक भेज दी थीं। उस समय इसने भारत के साथ हुए पंचशील समझौते का उल्लंघन करते हुए अपनी ‘सैनिकीय मानसिकता’ का परिचय दिया था और भारत के आपसी शान्ति व भाइचारे की नीति की धज्जियां उड़ाई थीं। चीन के कम्युनिस्ट नेतृत्व ने जिस तरह का व्यवहार सीमा पर 1962 में किया था, ठीक उसी प्रकार की मानसिकता से संलिप्त व्यवहार विगत 30 अप्रैल, 2020 को लद्दाख की गलवान घाटी में सटी भारतीय  सीमा में करते हुए हमारे क्षेत्र में प्रवेश किया और 20 जून 2020 को इसके सैनिकों के साथ भारत के जांबाज लड़ाकू जवानों की मुठभेड़ हुई जिसमें 20 भारतीय रणबांकुरे शहीद हुए।  यह अतिक्रमण भी चीन ने नब्बे के दशक में दोनों देशों के बीच हुए सीमा शान्ति समझौतों को ताक पर रखकर किया गया था। इसके बाद से चीन लगातार लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक की सीमाओं पर तनावपूर्ण वातावरण बनाये रखना चाहता है जिसे लेकर दोनों तरफ के सैनिक कमांडरों के बीच अभी तक 17 बार उच्च स्तरीय वार्ताएं हो चुकी हैं मगर हकीकत यही रहेगी कि अभी तक चीन की सेनाएं 30 अप्रैल, 2020 की स्थिति में नहीं पहुंची हैं और कोई न कोई ऐसा काम जरूर करती रहती हैं जिससे सीमा पर तनाव का वातावरण बना रहे। 
चीन को यह ध्यान रखना होगा कि उसकी विस्तारवादी नीति  भारत के सन्दर्भ में कभी सफल नहीं हो सकती क्योंकि 1962 में उसने जिस अक्साई चिन की 36 हजार वर्ग किलोमीटर भूमि को हड़पा था उसे भी भारत अपनी भूमि मानता है और उससे वापस लेने के लिए प्रतिबद्ध है। भारत की संसद में इस बारे में एकाधिक बार देश के गृहमन्त्री श्री अमित शाह घोषणा कर चुके हैं परन्तु असली मौजू सवाल यह है कि सीमा पर चीन के साथ तनावपूर्ण सम्बन्ध होने की वजह से क्या दोनों देशों के बीच कारोबार सामान्य तरीके से चल सकता है? जाहिर है कि यह मुमकिन नहीं हो सकता कि सीमा पर तो दोनों देशों के सैनिक आमने-सामने तलवारें निकाले डटे हों और कारोबारी आपस में गले मिल रहे हों। सीमा पर बने माहौल का सर्वव्यापी असर पड़ना लाजिमी है और इसी तरह विदेश मन्त्री श्री एस. जयशंकर ने भारत आये हुए चीनी विदेश मन्त्री किन गैंग का ध्यान दिलाया है और स्पष्ट किया है कि यह असामान्य स्थिति है जिसे सामान्य बनाये जाने की जरूरत है। श्री किन आजकल जी-20 संगठन के विदेश मन्त्रियों के सम्मेलन में भाग लेने आये हुए हैं। एस. जयशंकर ने इस सम्मेलन के अवसर पर श्री किन से अलग से बातचीत की और उन्हें भारत की चिन्ताओं की जानकारी दी। वैसे बदलते विश्व घटनाक्रम में यह चीन के ही हित में है कि वह भारत के साथ सभी प्रकार के सीमा विवाद जल्दी से जल्दी दूर करके आपसी सहयोग करके अपने आर्थिक हितों को आगे बढ़ाये। मगर यह काम भारत के सहयोग के बिना बिल्कुल नहीं हो सकता। इसका सबसे ताजा उदारण रूस-यूक्रेन युद्ध है। इस युद्ध की वजह से पूरे यूरोपीय देशों व अमेरिका का रुख रूस को विश्व व्यवस्था से अलग-थलग कर देने का है जिसका विरोध चीन कर रहा है और भारत का रुख भी यूरोपीय देशों के अनुकूल नहीं है जबकि इसके यूक्रेन से सम्बन्ध भी अच्छे और दोस्ताना हैं। 
यही वजह रही कि जी-20 विदेश मन्त्रियों के सम्मेलन के बाद कोई संयुक्त वक्तव्य जारी नहीं हो सका और भारत ने अपने अध्यक्षीय सन्देश को ही शेष देशों के लिए अनुकरणीय बताया। इसका सार तत्व यह भी निकाला जा सकता है कि पूरी दुनिया में केवल भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जो यूक्रेन युद्ध पर दुनिया में बने दो गुटों के बीच सन्तुलन की भूमिका निभा सकता है। परन्तु इससे भारत-चीन के बीच के सीमा विवाद का भी कोई विशेष लेना-देना नहीं है क्योंकि इसका हल केवल द्विपक्षीय आधार पर ही होगा और इसके लिए चीन को अपना टेढे रास्ते को सीधा करना होगा। यह सर्वविदित है कि दोनों देशों के बीच इस समस्या के निदान के लिए एक सर्वोच्च स्तर का वार्ता तन्त्र डा. मनमोहन सिंह की सरकार के दौरान ही गठित हो गया था जिसमें भारत की ओर से इसके राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भाग लेते हैं। इस वार्ता तन्त्र के चलते हुए ही चीन ने 2020 में गलवान घाटी में अतिक्रमण किया जबकि इस तन्त्र की भी अभी तक दो दर्जन के लगभग बैठकें हो चुकी हैं। इससे जाहिर है कि चीन की नीयत में खोट है और वह सैनिकीय मानसिकता के चलते भारत को रक्षात्मक पाले में ही रखना चाहता है जबकि भारत ने 2003 में ही वाजपेयी सरकार ने यह स्वीकार कर लिया था कि तिब्बत चीन का स्वायत्तशासी अंग है। 
बेशक इसे भारत की भयंकर भूल कहा जा सकता है क्योंकि इससे चीन की नीयत में बदलाव नहीं आया और इसके बाद उसने अरुणाचल प्रदेश को ही अपना हिस्सा बताना शुरू कर दिया। अतः चीन के मोर्चे पर हमें सबसे पहले यह विचार करना होगा कि गलवान में अतिक्रमण शुरू करने के बाद उसकी मंशा तिब्बत के साथ लगी भारत की पूरी नियन्त्रण रेखा को ही बदलने की ही है क्योंकि इस रेखा के आसपास के इलाकों से भारतीय सेनाओं की सुरक्षा पंक्तियों को पीछे कर रहा है और इस पर भारी युद्धक निर्माण भी कर रहा है। सीमा पर जब एक लाख सैनिक आमने-सामने खड़े हों तो सम्बन्ध सामान्य कैसे हो सकते हैं। यह बात जयशंकर ने ही चीन के विदेशमन्त्री से कही है। लेकिन विदेशमन्त्री को चीन को भारत के मुकाबले बहुत बड़ी अर्थव्यवस्था बताने से पहले यह भी सोचना चाहिए था कि 1962 में भारत के रणबांकुरों ने द्वितीय विश्व युद्ध में इस्तेमाल किये गये अस्त्र-शस्त्रों के भरोसे ही कई मोर्चों पर दिन में तारे दिखा दिये थे।

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