न्यायमूर्ति चन्द्रचूड का सन्देश

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री डी.वाई. चन्द्रचूड ने बहुत शालीनता और स्पष्टता के साथ भारत की संघीय व्यवस्था में न्यायपालिका की निष्पक्ष भूमिका की व्याख्या करते हुए संविधान प्रदत्त नागरिकों की मूल अधिकारों की सुरक्षा की समीक्षा की है और जाहिर किया है

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री डी.वाई. चन्द्रचूड ने बहुत शालीनता और स्पष्टता के साथ भारत की संघीय व्यवस्था में न्यायपालिका की निष्पक्ष भूमिका की व्याख्या करते हुए संविधान प्रदत्त नागरिकों की मूल अधिकारों की सुरक्षा की समीक्षा की है और जाहिर किया है कि कोई भी फौजदारी कानून इन मूल अधिकारों की अवहेलना नहीं कर सकता है चाहे वह आतंकवाद विरोधी कानून ही क्यों न हो। उन्होंने यह कह कर भारत के संविधान की उस आत्मा के दर्शन कराने का प्रयास किया है जो भारतीय न्यायिक व्यवस्था का मूलाधार है, क्योंकि भारतीय लोकतन्त्र जिन पायों पर टिका हुआ है उसमें ‘असहमति’ समूचे तन्त्र को अधिकाधिक लोकोन्मुख और प्रतिनिधि मूलक बनाती है। अतः न्यायमूर्ति चन्द्रचूड का यह मत कि किसी भी फौजदारी कानून का असहमति को दबाने या लोगों को सताने में प्रयोग नहीं किया जा सकता, पूरी तरह संवैधानिक व्यवस्थाओं का तार्किक मजमून है। भारत का संविधान अनुच्छेद के तहत प्रत्येक नागरिक को जीवन जीने का अधिकार देता है और अनुच्छेद 14 बराबरी का हक देता है। इसके साथ ही लोकतान्त्रिक व्यवस्था प्रत्येक नागरिक को सरकार के नीतिगत फैसलों के बारे में अपनी राय व्यक्त करने या आलोचना अथवा विश्लेषण करने का अधिकार देता है जिसमें असहमति वैचारिक स्वतन्त्रता के मूल भूत अधिकार का अभिन्न अंग होती है अतः किसी भी फौजदारी कानून का दायरा इतना बड़ा नहीं हो सकता कि वह नागरिकों के मूल अधिकारों को ही निगल जाये।
 न्यायमूर्ति चन्द्रचूड ने अमेरिका की बार एसोसिएशन के साथ एक वीडियो कान्फ्रेंसिंग में अपने विचार व्यक्त करते हुए यह भी साफ किया कि भारत में सर्वोच्च न्यायालय का यह दायित्व बनता है कि ‘बहुमतवाद’ के विरुद्ध एक ऐसा संस्थान बने जो आर्थिक व सामाजिक अल्पसंख्यकों को पूर्ण न्याय दे सके। इन अल्पसंख्यकों को न्याय देने की जिम्मेदारी से न्यायपालिका बन्धी हुई है। यदि गौर से देखा जाये तो न्यायमूर्ति चन्द्रचूड उस प्राकृतिक न्याय की ही बात कर रहे हैं जो किसी भी सभ्य समाज में प्रत्येक नागरिक का मानवीय अधिकार होता है। लोकतन्त्र विशेषकर भारत के संविधान में इसी सिद्धान्त को इस प्रकार प्रतिष्ठापित किया गया है कि देश का प्रत्येक सामाजिक व भाषाई अथवा आर्थिक अल्संख्यक समाज संविधान से शक्ति से लेकर अपना चहुंमुखी विकास हर क्षेत्र में कर सके। आर्थिक अल्पसंख्यकों के हितों को ही संरक्षण देने हेतु संविधान ने भारत में ‘लोक कल्याणकारी’ राज की स्थापना का प्रावधान रखा है। इस गुत्थी को हम इस प्रकार समझ सकते हैं कि करोड़ों-अरबों रुपये की लागत से बनने वाली सड़क पर पहला हक पैदल चलने वाले का ही होता है। श्री चन्द्रचूड ने जिस प्रकार भारत की लोकतान्त्रिक प्रणाली में संवैधानिक दखल की व्याख्या की वह आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्ग दर्शिका का काम करेगी। कोरोना संक्रमण के दौर में सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार की वैक्सीन नीति की समीक्षा करते हुए तल्ख टिप्पणियां की थीं और सरकार को वैक्सीन मुहैया कराने की योजना का खाका पेश करने का आदेश दिया था। कुछ कथित विधि जानकारों ने इसे अति न्यायिक उत्साह या न्यायिक दायरे से बाहर तक जाने की गतिविधि बताया था। इन्हीं आलोचनाओं का जवाब भी न्यायामूर्ति चन्द्रचूड ने संवैधानिक दायित्वों के तहत देते हुए साफ कहा कि आम लोगों की जायज मुसीबतों और कष्टों के दौर में न्यायापालिका चुप नहीं बैठ सकती क्योंकि इसका सम्बन्ध मानवीय अधिकारों से था जिनका उल्लेख अनुच्छेद 21 व 14 में है। नागरिक स्वतन्त्रता के मुद्दे को भी विद्वान न्यायाधीश ने खोलते हुए स्पष्ट किया कि हमारी न्यायपालिका ही नागरिक स्वतन्त्रता के अधिकार की रक्षा की पहली पंक्ति है। किसी भी नागरिक को उसके इस अधिकार से यदि एक दिन के लिए भी वंचित किया जाता है तो वह बहुत बड़ी बात है। अतः न्यायाधीशओं को अपने फैसलों के बारे में बहुत दिमाग लगा कर काम करना चाहिए क्योंकि इनका प्रभाव पूरे तन्त्र पर बहुत गहराई से पड़ता है। 
न्यायपालिका, विधायिका व कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्रों की गूढ़ता को भी उन्होंने बहुत सरलता के साथ खोला और बयान किया कि एक-दूसरे से सांमजस्य के तार इस प्रकार जुड़े हुए हैं कि परस्पर निर्भरता और सहयोग के बीच आपसी कार्यप्रणाली की समीक्षा की खिड़की भी खुली रखते हैं। श्री चन्द्रचूड ने दरअसल यह साफ कर दिया है कि भारत में हर परिस्थिति में संविधान का राज इस प्रकार स्थापित है कि प्रत्येक नागरिक अपने मूल अधिकारों के प्रति आश्वस्त रहे और लोकतन्त्र का शासनतन्त्र  निर्भय व निडर होकर असहमति रखने वालों को भी पूरा संरक्षण देता रहे। सत्य तो यह है कि यह असहमति का अधिकार ही होता है जो लोकतन्त्र में हर पांच साल बाद लोगों को सत्ता में परिवर्तन लाने का अधिकार देता है।  अतः असहमति को नकारात्मक बताना लोकतन्त्र की भवना को नकारने के समान ही होता है। न्यायमूर्ति चन्द्रचूड के ये विचार भारत की आने वाली पीढि़यों के लिए इस बात का सबूत बने रहेंगे कि हर हाल में लोकतन्त्र जनता के राज को ही मजबूत करता है और पूरी शासन व संवैधानिक प्रणाली के केन्द्र में आम नागरिक को ही रखता है।  
आदित्य नारायण चोपड़ा
Adityachopra@punjabkesari.com

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