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केरला स्टोरी और बेटियां

भारत में फिल्मों पर विवाद होना कोई नया नहीं है लेकिन फिल्मों को राजनीतिक से जोड़ना पूरी तरह से गलत है। लव जेहाद पर बनी ‘द केरला स्टोरी’ में अगर गायब हुई लड़कियों के आंकड़ों पर न जाएं तो इस विषय पर फिल्म बनाना सचमुच साहस का काम है।

भारत में फिल्मों पर विवाद होना कोई नया नहीं है लेकिन फिल्मों को राजनीतिक से जोड़ना पूरी तरह से गलत है। लव जेहाद पर बनी ‘द केरला स्टोरी’ में अगर गायब हुई लड़कियों के आंकड़ों पर न जाएं तो इस विषय पर फिल्म बनाना सचमुच साहस का काम है। साहित्य समाज का दर्पण होता है तो फिल्में भी समाज की घटनाओं पर ही बनती हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि केरला में 15 साल पहले लव जेहाद की चर्चा हुई थी। ऐसी घटनाओं में हिन्दू लड़कियों को बहला-फुसला कर इस्लाम कबूल करा लिया जाता था और इनमें से कुछ को दुर्दांत आतंकवादी संगठन आईएस के लिए भेज दिया जाता था। फिल्म की कहानी भी ऐसी ही लड़कियों पर आधारित है। कहीं न कहीं ऐसी घटनाओं में समाज का सच ही सामने आया है। यद्यपि 32 हजार के आंकड़े को अतिरंजित ही कहा जा सकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात है कि 15 सालों बाद को फॉलो नहीं किया गया कि अब भी वैसा हो रहा है या इस बात को हम रोक सके या समाप्त कर सके लेकिन मैंने फिल्म देखी है और मेरा मानना है ​कि फिल्म ऐसी ही लड़कियों की दर्दनाक कहानी है, जिसे देखकर दर्शकों की आंखों में आंसू आ जाते हैं।​ साथ ही फिल्म एक बहुत बड़ा सवाल भी उठाती है। यह सवाल ही बच्चोें को संस्कारवान बनाने का है।  वास्तव में आज के दौर में अभिभावक अपने बेटे या बेटियों को धार्मिक, पारिवारिक और सामाजिक संस्कार भलीभांति नहीं देते हैं। ऐसी समस्याएं तब आती हैं जब बच्चों को अपने धर्म के पूर्ण संस्कार नहीं दिए जाते। हम अपनी बेटियों को संस्कारवान बनाएं ताकि कोई उन्हें गुमराह न कर सके। 
अगर सच को टटोलना है तो हमें अपने समाज में गहराई तक उतरना होगा। किसी भी धर्म के बच्चों की आपस में दोस्ती होना अलग बात है लेकिन कोई भी बच्चा अगर अपने धर्म के प्रति संस्कारवान है तो उसे कोई गुमराह कर ही नहीं सकता। आपस में दोस्ती कितनी भी गाढ़ी क्यों न हो हम अपना धर्म छोड़ कर दूसरे का धर्म स्वीकार नहीं कर सकते। हां सब धर्मों को सम्मान दे सकते हैं लेकिन समाज में ​विरोधी तत्व किसी की मजबूरी का लाभ उठाकर संगठित तरीके से अलग गिरोह चला रहे हैं तो यह खेद की बात है। मेरा निजी तौर पर मानना है कि फिल्म कोई भी हो, वह मनोरंजन के लिए बनाई जाती है। अगर आप उसे समाज सुधार की तरह प्रौजेक्ट कर रहे हैं तो ऐसी कोशिश सराहनीय है। 
कुल मिलाकर फिल्मों के मामले में विरोध करना आजकल के हालात में कई बार तो फैशन जैसा लगता है। पहले लोग आपस में अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर लेते ​थे परंतु अब यह हाथोंहाथ सोशल मीडिया के साहारे अपनी बात वह कड़वी हो या तीखी, दूसरे तक तुरंत पहंुचा देते हैं। वायरल का यह सिलसिला बहुत घातक है। यह केवल फिल्मों के मामले में नहीं है। कई और मामलों में ऐसा ही होता है। जिस भारत जैसे देश में बेटियां अपने जीवन-यापन के लिए बैट्री रिक्शा, टैक्सी या बस चला रही हों  या उसी देश की बेटियां ट्रेन चला रही हों और लड़ाकू विमान उड़ा रही हों तो वहां देश के किसी हिस्से में लड़कियों को जबरन धर्म परिवर्तन करके मुस्लिम बनाया जा रहा हो और इसे अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी संगठन से जोड़ दिया जाए तो इसे क्या कहेंगे?
राजनीति मेरा विषय नहीं लेकिन किसी भी स्तर पर चाहे वह राज्य स्तर पर हो या राष्ट्रीय स्तर पर राजनीति नहीं आनी चाहिए। नेता लोग कभी भी कुछ भी कह सकते हैं, यह उनकी निजी राय हो सकती है लेकिन जब वह पब्लिक के बीच में अपनी राय फिल्म को लेकर देंगे तो वह निजी राय कहां रही? यूं तो हमने सैंकड़ों फिल्में देखी हैं जिसके उदाहरण विवाद के तौर पर दिए जा सकते हैं। एक फिल्म अच्छा संदेश भी दे सकती है। यह डायरेक्टर की संवेदनशीलता पर निर्भर करता है कि वह तथ्यों को कैसे प्रस्तुत कर रहा है?
शहीद, उपकार, अवतार, रोटी,कपड़ा और मकान, शोर, पूरब और पश्चिम तथा क्रांति जैैसी फिल्मों के गीत और कहानियां आज भी लोग याद रखते हैं। कश्मीर फाइल को लेकर अगर उसकी संवेदनशीलता को लेकर उसके विवाद को याद रखा जाए तो यह एक दुर्भाग्य है। फिल्म के प्रति मनोरंजन के अलावा राजनीतिक न​जरिया रखना भी दुर्भाग्य है। दु:ख इस बात का है कि जिसने विवाद ढुंढना है तो ढुंढ ही लेना है। सन् 70 के दशक में एक फिल्म में किसी वेश्या का नाम किसी धर्म से जोड़ दिया गया था तो अच्छा खासा विवाद हुआ था। आखिरकार नाम बदला गया। आज की तारीख में यही कहेंगे कि हमें फिल्मों को लेकर सियासत नहीं करनी और तथ्यों को देखकर अपनी प्रतिक्रिया भी ध्यानपूर्वक व्यक्त करनी चाहिए। पब्लिक के साथ-साथ नेताओं को भी और इनके अलावा सामाजिक, धार्मिक  और राजनीतिक संगठनों को भी अपनी जुबान काबू में रखकर धैर्यपूर्वक आचरण प्रस्तुत करना चाहिए। याद रखना चाहिए कि बेटियां सबकी साझी हैं। उनकी अस्मीता की ​सुरक्षा हमारा कर्त्तव्य है और जुबानबंदी भी इस मामले में बहुत जरूरी है।  
मैं समझती हूं कि हमारे देश में बहुत ही पढ़े-लिखे, संस्कारवान और विद्वान मुस्लिम (अब्दुल कलाम, जाकिर हुसैन, बहुत से नेता गुलाम नबी आजाद जैसे बहुत से नाम हैं जिन्हें गिनाना ​मुश्किल है) और ऐसे बहुत से समाज सुधारक हैं, जिन्हें मैं जानती हूं जिनकी वाणी लोगाें के दिलों पर असर करती है। जैसे मौलाना कल्बे रशिद ​रिजवी जो कि नेशनल उलेमा पार्लियामेंट के महासचिव हैं। ऐसे लोगों को आगे आकर ऐसी घटनाओं को रोकने या खत्म करने के लिए बोलना चाहिए। क्योंकि मेरी नजर में यह लोग सब बातों से उठकर मानवता, इंसानियत और देशभक्ति की बात कहते और समझते हैं और समझाते हैं। जब मैंने उनसे बात की तो उन्होंने कई उदाहरण दिए। मैं एक नारी हूं तो नारा लगाना जरूरी समझती हूं। सवाल मजहब का नहीं, सोचिये हमेशा हर हालात में एक लड़की की कुर्बानी क्यों दे। सवाल फिल्म का नहीं ये तो 15 साल पहले हुआ न जाने और कितने मां-बाप से उनकी बच्चियां जुदा हुई होंगी। सिर्फ केरल ही नहीं बल्कि और प्रदेशों में भी ऐसा हुआ,  लेकिन अब नहीं। कम से कम अपनी क्षमता अनुसार लिख कर, बोल कर जितना रोक सकती हूं रोकूं।
मैं समझना चाहती थी लड़ाई कलम से लड़नी है। सोचा पहले समझूं इस्लाम क्या कहता है। जानने के लिए रशीद रिजवी जी से बात की। उनका कहना था, किरण जी इस्लाम में दो मायने वाली रिवायत है। एक रियासत वाले हैं जो जंग में जाते हैं। दूसरे रिसालत वाले हैं जो करबला में इंसानियत के लिए जान देते हैं। कहने  का भाव है कुछ चंद मुस्लिम या आतंकवाद या धर्म परिवर्तन करवाने वाले लोग अपनी सारी कौम को बदनाम न करें। मिलकर बच्चियों और बेटियों को बचाने का सार्थक यत्न करें।

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