संसद चलती रहनी चाहिए!

भारत का लोकतन्त्र दुनिया का सबसे बड़ा लोकतन्त्र इसलिए कहलाता है क्योंकि यह सत्ता में सीधे जनता की भागीदारी को संसद के माध्यम से तय करता है

भारत का लोकतन्त्र दुनिया का सबसे बड़ा लोकतन्त्र इसलिए कहलाता है क्योंकि यह सत्ता में सीधे जनता की भागीदारी को संसद के माध्यम से तय करता है और इस तरह तय करता है कि इस व्यवस्था में संसद के माध्यम से ही लोकतान्त्रिक प्रणाली के चारों पायों (विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका व चुनाव आयोग) के शीर्षतम स्थानों पर बैठे व्यक्तियों के विरुद्ध कार्रवाई  की जा सकती है। परन्तु लोकसभा में जिस सरकार का गठन इस सदन में बहुमत के आधार पर होता है उसके निरंकुश होने को रोकने का मजबूत तन्त्र भी इस प्रणाली  में इस प्रकार अन्तर्निहित है कि संसद के दोनों सदनों के अध्यक्षों को संसद के भीतर वे असीमित अधिकार दिये गये हैं जिनका प्रयोग करके वे किसी भी बहुमत की सरकार को विपक्ष में बैठे अल्पमत के सदस्यों के प्रति पूरी तरह जवाबदेह बना सकें और सुनिश्चित कर सकें कि अन्ततः बहुमत की सरकार भारत के उन सभी मतदाताओं की सरकार है जिन्होंने चुनावों में उसके पक्ष या विपक्ष में वोट दिया है। इस पूरे निजाम की निगेहबानी संविधान के जरिये ही होती है, इसलिए यह कहा जाता है कि भारत में संविधान का राज है क्योंकि संसद सदस्य से लेकर लोकतन्त्र के चारों पायों के शीर्षस्थ प्रशासक इसी संविधान से बंधे होते हैं। यह संविधान ही चारों पायों को ताकत देकर उन्हें अपनी-अपनी भूमिका निभाने के अधिकार देता है। 
यहां यह समझा जाना बहुत जरूरी है कि राष्ट्रवाद और लोकतन्त्र दो अलग-अलग प्रकोष्ठ हैं। संविधान नागरिक मूलक विचार के आधार पर राष्ट्र की परिकल्पना करता है और भारत के हर क्षेत्र या हिस्से में रहने वाले विविध धार्मिक मान्यता रखने वाले व विभिन्न भाषा-भाषी लोगों को भारतीय सत्ता का हिस्सेदार मानता है जिसकी वजह से हमारे संविधान निर्माताओं ने भारतीय संसद को द्विसदनीय सदन बनाया। अतः लोकतन्त्र का सीधा सम्बन्ध मानवीय अधिकारों से जाकर जुड़ता है जिसका फलक असीमित हो सकता है। इस सन्दर्भ में स्वामी विवेकानन्द का 19वीं सदी के अन्त में शिकागो में दिया गया भाषण प्रसंग में लाया जा सकता है। परन्तु आजकल भारत की संसद में जो कुछ भी हो रहा है वह लोकतन्त्र की उस बुनियाद को हिला रहा है जिसे हमारे संविधान निर्माताओं ने बड़े यत्न से तैयार किया था और व्यवस्था की थी कि संसद में बैठे हुए जनता के चुने हुए प्रतिनिधि संवाद व परिचर्चा के माध्यम से उन सभी जटिल समस्याओं को सुलझाने में कामयाब हो सकते हैं जो समय-समय पर देश के लोगों के सामने पैदा होती रहेंगी। परन्तु ऐसा लग रहा है जैसे इसमें बैठे सभी पक्षों के सांसदों ने ही इसकी प्रासंगिकता को अनुपयोगी बनाने की ठान ली है और सभी अपनी-अपनी जिद पर अड़ गये हैं। संसदीय व्यवस्था को कारगर करने के जो नियम हमारे पुरखों ने बनाये थे उनमें सबसे महत्वपूर्ण यह था कि संसद को सुचारू ढंग से चलाने की जिम्मेदारी सत्तारूढ़ पक्ष की ही होगी। मन्त्री पद संभालने वाले सांसद किसी भी प्रकार के शोर-शराबे से दूर रहेंगे और अपने-अपने विभाग से सम्बन्धित कार्यों के प्रति जवाबदेही निभायेंगे। दूसरी तरफ विपक्ष के नेता संसद में बने नियमों के तहत ही अपने विषय इस तरह उठायेंगे कि उन पर सार्थक चर्चा करके सरकार की जवाबदेही तय हो सके। परन्तु पिछले तीन दिन से जो नजारा संसद के दोनों सदनों में पेश हो रहा है उसे देखकर यही लग रहा है सिर्फ नारे के बदले जवाबी नारे उछल रहे हैं।
सत्तारूढ़ पक्ष कांग्रेस नेता श्री राहुल गांधी के लन्दन में दिये गये वक्तव्य को पकड़ कर बैठ गया है और विरोधी पक्ष इसके खिलाफ अपने मुद्दों पर संसद में बहस चाहता है। दोनों ही यह चाहते हैं कि संसद में जो भी बहस हो वह उनके पाले में ही आकर हो जिसकी वजह से गतिरोध बना हुआ है। इस गतिरोध को सिर्फ संवाद से ही तोड़ा जा सकता है जिसके लिए कोई पक्ष पलक झपकाने को तैयार नहीं दिखाई पड़ता है। यह बजट सत्र का दूसरा चरण है जिसमें वित्त विधेयक पारित होना है। इसके पारित होने में किसी को भी शंका नहीं है क्योंकि देश का बजट पारित करना जितनी सरकार की जिम्मेदारी है उतनी ही विपक्ष की भी है। पूर्व में भी हमने देखा है कि किस प्रकार 2004 में मनमोहन सिंह सरकार बनने के बाद बजट बिना किसी बहस के ही पारित हो गया था। उस समय विपक्ष के नेता श्री लालकृष्ण अडवानी मनमोहन मन्त्रिमंडल में कुछ कथित दागी लोगों के शामिल होने को लेकर विरोध कर रहे थे, मगर बजट पारित करते समय सारे विपक्ष ने सहयोग भी किया था। परन्तु मूल प्रश्न संसद की प्रासंगिकता का है ? यदि भारत के लोकविमर्श से संसद की उपयोगिता ही नदारद हो जाती है तो हम हर पांच साल बाद होने वाले चुनावों में भी क्या संसद के झगड़े को ही लेकर जायेंगे? भारत के 90 करोड़ के लगभग मतदाता संसद का चुनाव अपनी व राष्ट्रीय समस्याओं  के निपटारे के लिए करते हैं न कि नारे का जवाब नारे से देने के लिए। 
समाजवादी चिन्तक व जन नेता डा. राममनोहर लोहिया की यह बात हमेशा ध्यान में रहनी चाहिए कि ‘जब संसद गूंगी हो जाती है तो सड़कें आवारा हो जाती हैं’। संसद के भीतर यदि जनसमस्याओं की जगह राजनैतिक दल अपना ही हिसाब-किताब करने में मशगूल हो जाते हैं तो जनता स्वयं अपना ‘राजनैतिक विमर्श’ तैयार कर लेती है और चुनावों के मौके पर सभी राजनैतिक दलों को उसी के प्रति जवाबदेह होना पड़ता है क्योंकि लोकतन्त्र की असली मालिक जनता ही होती है। अतः संसद को निर्बाध रूप से चलते रहना चाहिए और सभी विवादों का अन्त संवाद के जरिये होना चाहिए जिसके लिए संसदीय कार्यमन्त्री की नियुक्ति होती है। यही तथ्य स्वयं में संसद की गतिशीलता की महत्ता को प्रमाणित करता है। 

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