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न्यायपालिका पर गर्व है

निर्भया के दोषियों ने कानूनों का किस तरह मजाक बनाया, दंड से बचने के ​लिए अंतिम क्षणों तक पैंतरे चलते रहे। उनके वकीलों ने सभी विकल्प खत्म होने के बावजूद नए-नए हथकंडे अपनाए लेकिन न्यायपालिका से लेकर राष्ट्रपति भवन तक ने उनके हर हथकंडे को नाकाम कर दिया।

दिसंबर 2012 के निर्भया कांड में चारों दोषियों को शुक्रवार की सुबह साढ़े 5 बजे तिहाड़ जेल में फांसी दे दी गई। इसके साथ ही सात वर्ष बाद निर्भया को इंसाफ मिल गया। निर्भया के माता-पिता, इंसाफ के लिए संघर्ष करने वाले युवाओं और समाज को लड़ाई में जीत हासिल हुई। देश की बेटी को न्याय मिलने पर हम न्यायपालिका पर गर्व कर सकते हैं, हमें देश के मीडिया और सोशल मीडिया पर भी गर्व होना चाहिए। हमें उन युवाओं पर भी गर्व होना चाहिए जिन्होंने कनाट प्लेस के सैंट्रल पार्क से जंतर-मंतर तक अपने आक्रोश का प्रदर्शन किया। इसके बाद जनसैलाव उमड़ पड़ा और उसने राष्ट्रपति भवन के प्रवेश द्वार तक पहुंच कर जनाक्रोश की शक्ति का प्रमाण दिया। पुलिस लाठीचार्ज और पानी की बौछार प्रदर्शनकारियों को डिगा नहीं सकी थी। इस जनाक्रोश से केन्द्र की सत्ता हिल उठी थी। यह शायद पहली बार था कि पूरे देश में नववर्ष 2013 का स्वागत करुणा और संवेदना के साथ किया गया था।
यह मनःस्थिति किसी एक वर्ग, समूह या समुदाय की नहीं बल्कि नीचे से ऊपर तक के सभी ना​गरिकों में सामने आई। ये संवेदनाएं उस निर्भया के लिए थीं जिसको व्यक्तिगत रूप से कम ही लोग जानते थे परन्तु दरिन्दगी की घटना सामने आने के बाद वह सभी के घर की सदस्य की तरह हो गई थी। व्यापक स्तर पर किसी से मानसिक रूप से इस तरह होने वाला जुड़ाव कम ही दिखाई देता है लेकिन जब भी ऐसा होता है तो वह ऐतिहासिक ही होता है। यद्यपि निर्भया अंतहीन पीड़ाओं को झेलते हुए सिंगापुर के अस्पताल में मृत्यु को प्राप्त हो गई, लेकिन उसकी मौत लाखों-करोड़ों महिलाओं की वेदना को मुखर ही नहीं कर गई बल्कि समाज के लिए एक मुद्दा भी बना गई, जिनके बारे में समाज और व्यवस्था सब कुछ जानते हुए भी आंखें मूंदे रहता था। दूसरे की पीड़ा को अनुभव करना आज के समाज में अकल्पनीय माना जाता है लेकिन निर्भया से हुई ​दरिन्दगी ने पूरे समाज को झकझोर दिया। उद्वेलन की यह मशाल जिस तरह से दिलों में जली, वह नई चेतना के संचार के समान थी तथा सत्ता और न्यायपालिका को एक चेतावनी भी थी कि ‘‘अब आगे ऐसा नहीं होगा।’’ 
जंतर-मंतर पर युवा शक्ति निर्णायक तत्व बनकर उमड़ी। उमड़ी भीड़ से संवाद करने की किसी ने पहल नहीं की। सत्ता में बैठे ‘राजकुमार’ और ‘राजकुमारियां’ घरों में दुबक कर बैठ गए। निर्भया के ​लिए इंसाफ की मांग करने वालों ने युवा शब्द की परिभाषा भी इस अर्थ में बदली कि वह उत्साही तो हैं लेकिन साथ ही जिम्मेदार भी हैं। पहली बार औरत का सवाल राजनीति का सबसे केन्द्रीय सवाल बन गया। महिलाओं के प्रति बढ़ती आपराधिक घटनाओं  के ​विरोध में देश और समाज में नई चेतना और व्यवस्था की स्थापना के लिए युवाओं के आंदोलन ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।
निर्भया मामला अपनी क्रूरता में रेयरेस्ट आफ रेयर मामला था और उसी हिसाब से कानून में मौजूद अधिकतम सजा अपराधियों को दी गई। पुलिस जांच और अदालती कार्यवाही के बारे में एक आम धारणा है कि अपराधी छूट जाते हैं या उन्हें जमानत मिल जाती है, सबूत खत्म कर ​दिए जाते हैं लेकिन निर्भया के दोषियों को फांसी ने इस धारणा को तोड़ा है, लोगों का भरोसा भारतीय न्याय व्यवस्था में मजबूत हुआ है और समाज में भी एक संदेश गया कि न्याय में भले ही देर लगती है लेकिन न्याय होकर रहता है।
निर्भया के दोषियों ने कानूनों का किस तरह मजाक बनाया, दंड से बचने के ​लिए अंतिम क्षणों तक पैंतरे चलते रहे। उनके वकीलों ने सभी विकल्प खत्म होने के बावजूद नए-नए हथकंडे अपनाए लेकिन न्यायपालिका से लेकर राष्ट्रपति भवन तक ने उनके हर हथकंडे को नाकाम कर दिया। इस केस ने कानून की खामियों को भी उजागर किया है। निर्भया के माता-पिता को लगातार इतने सालों से कष्ट झेलते, आंसू बहाते देखा है। हर तारीख पर उनकी मौजूदगी एक माता-पिता के धर्म और दायित्व का अहसास करा गई। दूसरी तरफ फांसी की सजा अपराध की जघन्यता को देखते हुए इसी तरह के यौन हिंसा के परिणामों को लेकर अपराधियों में भय पैदा करने में बड़ी भूमिका निभाएगी।
लोगों ने दोषियों को फांसी देने के मौके पर ​ितहाड़ जेल के बाहर एकत्र होकर खुशी मनाई, मिठाइयां बांटीं। किसी की मौत पर उत्सव मनाने पर कुछ लोग सवाल जरूर उठाते हैं लेकिन हमें याद रखना होगा कि पूरा देश रावण की मौत का जश्न विजयदशमी पर्व के रूप में मनाता आया है। हैदराबाद में महिला वैटनरी डाक्टर से गैंग रेप के बाद हत्या और शव जलाने के मामले में सभी चारों आरोपियों को पुलिस ने मुठभेड़ में मार गिराया था तो लोगों ने उत्सव मनाया था। हैदराबाद की इस घटना से पूरा देश उबल रहा था। पीड़िता के परिवार का कहना था कि आरोपियों को जल्द से जल्द सजा मिले। जब चारों आरोपी मारे गए तो लोगों को संतोष मिला क्योंकि जन-जन की मांग भी यही थी।
अब सवाल यह है कि क्या बलात्कार के सख्त कानूनों से ऐसी घटनाएं रुक गई हैं या कम हुई हैं। फिलहाल ऐसी घटनाएं बढ़ रही हैं। समाज है तो पाप भी होगा और पुण्य भी होगा। हमें ऐसे समाज का निर्माण करना होगा जिसमें महिलाओं को सम्मान और स्वतंत्रता ​मिले। उम्मीद है कि भविष्य में ऐसे जघन्यतम कांडों के ​लिए दोषियों को सजा देने में विलम्ब न हो और लोगों को इंसाफ के लिए लम्बा संघर्ष नहीं करना पड़े, इसके लिए कानून की खामियों को दूर किया जाएगा। हम न्याय की इस घड़ी तक पहुंचने के लिए इस मुद्दे पर काम करने वाले सभी लोगों के साहस, सहनशीलता और संघर्ष को सलाम करते हैं।

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