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सिद्धारमैया कर्नाटक के सरताज?

कर्नाटक की राजनीति का यह नया दौर है जिसमें पूर्व प्रधानमन्त्री श्री एच.डी. देवेगौड़ा की क्षेत्रीय पार्टी जनता दल (स) की भूमिका अब हाशिये पर पहुंच चुकी है और उत्तर भारत की हिन्दी पार्टी कहे जाने वाली भाजपा की भूमिका प्रमुखता में आ चुकी है। यह परिवर्तन 1982 के बाद से ही हुआ है

कर्नाटक की राजनीति का यह नया दौर है जिसमें पूर्व प्रधानमन्त्री श्री एच.डी. देवेगौड़ा की क्षेत्रीय पार्टी जनता दल (स) की भूमिका अब हाशिये पर पहुंच चुकी है और उत्तर भारत की हिन्दी पार्टी कहे जाने वाली भाजपा की भूमिका प्रमुखता में  आ चुकी है। यह परिवर्तन 1982 के बाद से ही हुआ है। इस वर्ष कर्नाटक के पड़ोसी राज्य आन्ध्र प्रदेश में स्व. फिल्म अभिनेता एन.टी. रामाराव की क्षेत्रीय पार्टी तेलगूदेशम के अचानक सत्ता में आने पर इस तरह हुआ था कि आजादी के बाद से (1986 में राज्य का पुनर्गठन होने पर) इस पूरे राज्य में 1983 तक कांग्रेस का ही परचम फहराया करता था परन्तु इस वर्ष हुए चुनावों में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई और स्व. रामकृष्ण हेगड़े के नेतृत्व में पंचमेल जनता पार्टी सत्ता में आयी जो वास्तव में स्व. चौधरी चरण सिंह की पार्टी भारतीय लोकदल पार्टी का ही संस्करण थी। तब से लेकर अब 2023 तक यह परिवर्तन हुआ है कि भारतीय जनता पार्टी इस राज्य में प्रमुख राजनैतिक दल बन चुकी है और क्षेत्रीय जनता पार्टी की आवरणों में जनता दल से जनता दल (स) में विभाजित हो चुकी है और कांग्रेस पार्टी पुनः अपने पुराने तेवरों में आ चुकी है। 
कांग्रेस को इसकी जड़ों से जोड़ने में एक जमाने के लोकदल के नेता रहे श्री सिद्धारमैया की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही है जिन्होंने जनता दल के टूटने पर जनता दल (स) का दामन श्री देवेगौड़ा के साथ थामा था और 2004 में जब कांग्रेस व जनता दल(स) की मिलीजुली सरकार स्व. धरम सिंह के नेतृत्व में बनी तो वह उपमुख्यमन्त्री नियुक्त किये गये थे। मगर इस दौरान उनके देवगौड़ा व उनके पुत्र कुमार स्वामी से गंभीर मतभेद हुए और उन्हें मन्त्री पद से हटा दिया गया तो 2005 में उन्होंने बैंगलुुरू में एक विशाल जनसभा करके श्रीमती सोनिया गांधी की उपस्थिति  में कांग्रेस पार्टी की सदस्यता ग्रहण की और तब से वह इस राज्य में कांग्रेस का जनाधार मजबूत करने में लगे हुए हैं। कर्नाटक के हाल के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी की प्रचंड विजय के बाद मुख्यमन्त्री पद पर श्री सिद्धारमैया का बैठना अब निश्चित माना जा रहा है क्योंकि चुने गये 135 विधायकों में अधिसंख्य का मत उनके पक्ष में है परन्तु इस पद के दूसरे दावेदार रहे श्री डी.के. शिवकुमार भी कांग्रेस की राज्य में मजबूती व वर्तमान चुनावों में उसकी विजय के लिए उतने ही श्रेय के भागी हैं जितने कि श्री सिद्धारमैया। 
पार्टी संगठन को पूरे राज्य में मजबूत बनाने में उनकी भूमिका तब बहुत महत्वपूर्ण रही जब पार्टी 2008 से 2013 तक और बाद में 2018 से 2023 तक विपक्ष की भूमिका में रही। श्री शिवकुमार ने अपने स्वयं के ऊपर भारी मुसीबतों का पहाड़ राजनैतिक कारणों से टूट पड़ने के बावजूद पार्टी का हाथ नहीं छोड़ा बल्कि बुरे समय में वह कांग्रेस पार्टी के संकट मोचक बने रहे। श्री शिवकुमार बेशक मुख्यमन्त्री पद के इच्छुक थे मगर उन्होंने पार्टी अनुशासन से बाहर जाकर अपनी इच्छा पूरी करने की कभी नहीं सोची। 2020 में उन्हें कांग्रेस ने अपनी कर्नाटक शाखा का अध्यक्ष बनाया था और इसके बाद उन्होंने पार्टी को मजबूत करने के लिए जो अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किये हैं वे उन कांग्रेसियों के लिए नजीर हैं जो स्वार्थ के लिए या मुसीबतों से घबरा कर पार्टी छोड़ कर दूसरे दलों में चले जाते हैं। वह गांधी परिवार के भी विश्वस्त माने जाते हैं मगर राजनीति में निजी वफादारी पार्टी या राष्ट्रीय अथवा जनता के हितों से ऊपर रख कर नहीं देखी जाती है। 
श्री सिद्धारमैया को कर्नाटक में आम जनता का आदमी माना जाता है वह एक जबर्दस्त वक्ता होने के साथ-साथ गरीब-गुरबा लोगों में लोकप्रिय हैं और साथ ही योग्य व कुशल प्रशासक भी हैं। उनकी राजनीति स्व. चौधरी चरण सिंह व महात्मा गांधी के सिद्धान्तों से प्रेरित मानी जाती है जो सादगी व स्पष्टवादिता को अपना धर्म मानती है। यही वजह है कि 2013 से 2018 तक राज्य के मुख्यमन्त्री रहने के बावजूद उनके दामन पर एक छींटा तक नहीं है। उनका जीवन एक खुली किताब है जो आज के दौर के सभी पार्टियों के नेताओं के लिए उदाहरण माना जा सकता है। वास्तव में कांग्रेस को आज उन जैसे नेताओं की ही जरूरत है जो जनता के बीच अपने आचरण व व्यवहार से राजनीतिज्ञों के प्रति आदर का भाव पैदा कर सकें। जहां तक श्री शिवकुमार का सम्बन्ध है तो वर्तमान दौर की राजनीति का मुकाबला करने के लिए कांग्रेस को उन जैसे कुशल संगठनकर्ता की आवश्यकता है जिससे पार्टी के सिद्धान्तों और नीतियों के बारे में संगठन सर्वदा जन विमर्श के सकारात्मक पहलू में दिखाई पड़े। श्री शिवकुमार के बारे में कहा जा रहा था कि उन्हें उपमुख्यमन्त्री बनाया जा सकता है। मगर पार्टी अध्यक्ष का पद कोई छोटा पद नहीं होता और सत्ताधारी दल के सन्दर्भ में तो इसकी महत्ता मुख्यमन्त्री से भी कम नहीं होती है। 
पार्टी अध्यक्ष के पास अपनी पार्टी की सरकार की नीतियों को जन मूलक बनाये रखने के लिए निर्देश देने का अधिकार होता है हालांकि वर्तमान दौर में केवल सत्ता पर काबिज लोगों को ही प्रमुखता देने की परंपरा विकसित हो चुकी है परन्तु संसदीय लोकतन्त्र में पार्टी अध्यक्ष का रुतबा बहुत ऊंचा होता है क्योंकि उसके नजदीक मुख्यमन्त्री भी पहले एक साधारण पार्टी सदस्य ही होता है। दूसरे कांग्रेस ने सिद्धान्त बना दिया है कि एक व्यक्ति केवल एक पद पर ही रह सकता है अतः उपमुख्यमन्त्री पद श्री शिवकुमार के लिए पार्टी हित में कोई मायने नहीं रखता है। 2024 के लोकसभा चुनावों को सामने रखते हुए कांग्रेस ने श्री सिद्धारमैया को मुख्यमन्त्री बनाने का निश्चय किया है यह हकीकत श्री शिवकुमार को भी पता है। जब विधायकों का बहुमत ही श्री सिद्धारमैया के साथ है तो लोकतन्त्र में मुख्यमन्त्री बनने का भी उनका ही हक है। 

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