बच्चों की सुरक्षा से अनदेखी कब तक?

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सतेन्द्र त्रिपाठी निजी स्कूलों पर उठ रहे सवाल? निदा फाजली के बेहतरीन शेर ‘बच्चों के छोटे हाथों को चांद सितारे छूने दो’ की तर्ज पर भले ही अभिभावक अपने बच्चों को महंगे से महंगे स्कूल में पढ़ाकर उनके सपनों को उड़ान देने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन निजी स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा से खिलवाड़ किया  जा रहा। अब यह अभिभावकों के लिए चिंता का सबब बन गया है। आज के दौर में जबकि सरस्वती मंदिर में लक्ष्मी का बोलबाला हो गया है, कुछ मूलभूत सवाल ऐसे हैं, जिसका जवाब आज देश का हर अभिभावक चाहता है। सवाल ये…

सतेन्द्र त्रिपाठी

निजी स्कूलों पर उठ रहे सवाल?

निदा फाजली के बेहतरीन शेर ‘बच्चों के छोटे हाथों को चांद सितारे छूने दो’ की तर्ज पर भले ही अभिभावक अपने बच्चों को महंगे से महंगे स्कूल में पढ़ाकर उनके सपनों को उड़ान देने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन निजी स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा से खिलवाड़ किया  जा रहा।

अब यह अभिभावकों के लिए चिंता का सबब बन गया है। आज के दौर में जबकि सरस्वती मंदिर में लक्ष्मी का बोलबाला हो गया है, कुछ मूलभूत सवाल ऐसे हैं, जिसका जवाब आज देश का हर अभिभावक चाहता है। सवाल ये है कि शिक्षा के नाम पर व्यापार में लिप्त निजी स्कूल, क्या परिसर के अंदर मासूमों की सुरक्षा के लिए भी चिंतित हैं या फिर उन्हें सिर्फ मुनाफे से ही मतलब है।

दरअसल बुधवार को नोएडा के एक नामी स्कूल में 15 वर्षीय बच्चे की खेलने के दौरान हुई मौत ने निजी स्कूलों की इमरजेंसी से निपटने की तैयारी की पोल खोल कर रख दी है। इसी तरह पिछले साल एक स्कूल में शिक्षक दिवस के कार्यक्रम के दौरान छठी कक्षा की छात्रा की मौत हो गई थी, लेकिन एक साल बाद भी हालात में कोई खास बदलाव नहीं आया है।

ड्रेस से लेकर किताब, कॉपी, पेंसिल, पेन, बैग तक हर चीज की कीमत वसूलने वाले निजी स्कूलों के संचालक बच्चों की सुरक्षा को लेकर इतने लापरवाह क्यों हैं ? क्यों किसी आपात स्थिति होने पर स्कूल की पूरी व्यवस्था बेबस हो जाती है। आखिर स्कूल ऐसे हालात से निपटने की तैयारी क्यों नहीं करते? दिल्ली-एनसीआर के स्कूलों में छात्रों की सुरक्षा के भले ही तमाम दावे किए जाते हैं, मगर हकीकत यह है कि निजी स्कूल सिर्फ फीस व कमाई की चिंता करते हैं, उन्हें न तो छात्रों की सुरक्षा से कोई वास्ता है और न ही उनकी परेशानी से।

जिन स्कूलों में लाखों की फीस चुका कर अभिभावक अपने बच्चों के भविष्य के सुनहरे सपने देखते हैं, वही स्कूल बच्चों की सुरक्षा को जरा भी फिक्रमंद नहीं हैं। लिहाजा अभिभावकों के जिगर के टुकड़े इन निजी स्कूल वालों के लिए केवल आमदनी का साधन मात्र हैं, अक्सर यही देखने में आ रहा है कि अनेक हादसों में स्कूल प्रशासन का ढुलमुल रवैया माता-पिता के जिगर के टुकड़ों के प्राण ले गया। बच्चे की मौत के बाद कितने ही आयोग बनें, जांच हों, लेकिन हमेशा के लिए मौत की नींद सो चुका बच्चा एक दर्दनाक मौत का किस्सा मात्र बनकर रह जाता है।

सवाल जिनके जवाब चाहिए?

क्या कोई भी निजी स्कूल अपने यहां के इमरजेंसी रिस्पॉन्स प्रोटोकॉल (आपातकालीन स्थिति में कार्रवाई के तरीके) के बारे में बता सकता है? ऐसी घटनाओं के बाद क्या निजी स्कूल बदलाव के लिए तैयार होंगे? क्या ऐसी परिस्थिति से निपटने के लिए स्कूलों में शिक्षकों, सपोर्ट स्टाफ या दूसरे सदस्यों को कोई ट्रेनिंग दी जाती है या नहीं ? क्या सरकारें स्कूलों में सुरक्षा को लेकर कोई इंडिपेंडेंट ऑडिट करवाती हैं ?

ये कुछ ऐसे सवाल हैं, जिन्हें अब नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए और हर स्कूल संचालक को ऐसी कोई भी घटना होने पर जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। हादसे के बाद अब दिल्ली का हर अभिभावक ये पूछ रहा है कि क्या स्कूलों में इमरजेंसी रिस्पॉन्स सिस्टम है ?

अभिभावकों की चिंता अब सिर्फ इस एक मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि वे यह भी जानना चाहते हैं कि क्या स्कूल के पास सभी बच्चों की सुरक्षा के लिए पारदर्शी और मजबूत इमरजेंसी सिस्टम मौजूद हैं या फिर इन स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा भगवान भरोसे ही है। वैसे ये कोई पहली घटना नहीं है, इससे पहले भी स्कूलों में कई ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं, लेकिन हालात बदलते नहीं दिख रहे हैं।

आज के दौर में पढ़ाई को लेकर अभिभावक पहले से ज्यादा जागरूक हैं और वे अपने बच्चों को अच्छी से अच्छी शिक्षा देना चाहते हैं और इसके लिए अपनी जेब भी ढीली करने को तैयार हैं। न केवल मध्य वर्ग, बल्कि सामान्य अभिभावक भी अपने बच्चों की शिक्षा के लिए प्राइवेट स्कूलों को प्राथमिकता देने लगा है और अपने सामर्थ्य अनुसार वह फीस भी चुकाने को तैयार है, लेकिन क्या मोटी फीस लेने वाले ये स्कूल बच्चों की सुरक्षा को चाक चौबंद बनाने को तैयार हैं?

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Avinay