आजकल एशियन गेम्स चल रहे हैं। भारत और वेस्टइंडीज के बीच क्रिकेट सीरीज भी चल रही है। रेडियो पर कमेंट्री आती है। दूरदर्शन पर आती है। निजी टीवी चैनलों पर भी आती है। मैच देखते हुए आवाज साथ चलती है। पर सुनने का आनंद अब कम रह गया है। भाषा ढीली पड़ गई है। खेल का गहरा ज्ञान भी कम दिखता है। वाक्य अधूरे रहते हैं। आंकड़े गलत निकलते हैं। उत्साह नारेबाजी बन जाता है। समझ पीछे रह जाती है।
हमारे बचपन में लाजवाब कमेंट्री सुनने को मिलती थी, जसदेव सिंह, सुशील दोषी, मुरली मनोहर मंजुल, मेलविल डिमेलो, रवि चतुर्वेदी, अभय चतुर्वेदी, नोवी कपाड़िया, जोगा राव, बी.पी. ओझा, रिची बेनो आदि। आज ये आवाजें गुल हो गईं और नए अदाकार उस ढंग से आंखों देखा हाल आवाज़ के इन जादूगरों की भांति पेश नहीं कर पाते, क्योंकि न तो वह आवाज है, न अंदाज़ है और न ही ज्ञान ही है!
एक दौर और था। उस दौर में लोग रेडियो से दूर नहीं होते थे। टीवी से भी नहीं उठते थे। सुशील दोषी और रवि चतुर्वेदी कमेंट्री करते थे। बी.पी. ओझा भी कमेंट्री करते थे। आवाज शांत होती थी। वाक्य पूरे होते थे। खेल की समझ साफ होती थी। श्रोता मैदान को आंखों से देख लेता था, भले वह घर में बैठा हो। रवि चतुर्वेदी दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते थे। पढ़ाई और खेल दोनों उनके पास थे। बी.पी. ओझा भारत सरकार में आला अधिकारी थे। वे केवल माइक के पीछे नहीं बैठे थे। वे मैदान भी जानते थे। वे राज्य स्तर के फुटबॉल खिलाड़ी रहे थे।
दिल्ली हॉकी लीग भी खेली थी। रेफरी भी रहे थे। इसलिए उनकी कमेंट्री में केवल शब्द नहीं होते थे। अनुभव होता था। अभय चतुर्वेदी लाजवाब रहे। कमेंट्री की और वे देश, विदेश में कमेंट्री किया करते थे, जिसमें वे क्रिकेट इतिहास से सटीक जानकारी अपनी मुहावरेदार भाषा में पेश किया करते थे। ओझा ने कमेंट्री 1978 में शुरू की। उसके बाद कई बड़े आयोजन उनके हिस्से आए। उन्होंने डीसीएम और डूरंड फुटबॉल कप के कई फाइनल देखे। रोवर्स कप देखा। संतोष ट्रॉफी देखी। आईएफए शील्ड के फाइनल देखे। 1984 में सिंगापुर में एशिया कप फुटबॉल कवर किया। 1986 का हॉकी विश्व कप देखा। 1988 के सियोल ओलंपिक देखे। 1982 के दिल्ली एशियाई खेल देखे। 1987 का रिलायंस विश्व कप क्रिकेट देखा। मुंबई में भारत-इंग्लैंड का सेमीफाइनल भी उसी शृंखला में था। अनेक टेस्ट मैच कवर किए। वनडे भी किए। ईडन गार्डंस में भारत-दक्षिण अफ्रीका का ऐतिहासिक वनडे भी उन्हीं की आवाज में आया। जवाहरलाल नेहरू गोल्ड कप के फाइनल देखे। इंदिरा गांधी गोल्ड कप हॉकी के कई फाइनल देखे। 1986 का फुटबॉल विश्व कप दूरदर्शन के स्टूडियो से कवर किया। यह सूची लंबी है। पर सूची से बड़ी बात यह है कि एक ही व्यक्ति हॉकी, फुटबॉल और क्रिकेट तीनों खेलों में माहिर था। आज ऐसा कमेंटेटर खोजना कठिन है। एक खेल में भी पकड़ अधूरी रहती है।
तीन खेलों में पकड़ तब और दुर्लभ थी। ओझा के पास वह पकड़ थी। क्योंकि वे मैदान से आए थे। केवल स्टूडियो से नहीं आए थे। जसदेव सिंह भी उच्च स्तरीय थे। उनकी आवाज पहचान बन गई थी। ओलंपिक और बड़े आयोजनों, विशेष रूप से हॉकी के मैचों में, में वे घर-घर पहुंचे। टीवी के आने के बाद उन पर सवाल भी उठे। नई माध्यम की मांग अलग थी। कैमरा सब दिखा देता था। कमेंटेटर से अब वर्णन कम, अर्थ अधिक चाहिए था। हालांकि उनकी आवाज़ का जादू सर पर चढ़ कर बोलता था, मगरकुछ लोग मानते थे कि जसदेव सिंह पुरानी शैली में अटके रहे। कुछ मानते थे कि टीवी ने अपेक्षाएं बदल दीं। विवाद रहा। पर यह नहीं कहा जा सकता कि वह पीढ़ी बिना तैयारी के माइक पर बैठती थी। आज भाषा टूट गई है, आज की शिकायत इससे आगे की है। हिंदी में अंग्रेजी के अधूरे शब्द घुस आए हैं। क्रिकेट में हर गेंद पर एक ही प्रकार के शब्दों में उत्साह दोहराया जाता है। हॉकी में मैदान की समझ कम दिखती है। फुटबॉल में नियम अधूरे बताए जाते हैं। एशियन गेम्स जैसे बड़े मंच पर भी यही हाल है। कई बार कमेंटेटर खेल की बारीकी से ज्यादा खुद को सामने रखते हैं। दर्शक थक जाता है। कान ऊब जाते हैं। पुरानी कमेंट्री में संयम था। चुप्पी भी भाषा का हिस्सा होती थी। जब स्ट्रोक लगे तो शब्द कम होते थे। जब विकेट गिरे तो वाक्य साफ होता था। जब गोल हुआ तो आवाज उठती थी। पर अर्थ नहीं खोता था। ओझा और चतुर्वेदी के यहां खेल पहले आता था। व्यक्ति बाद में। अब सवाल यह है कि ऐसी आवाजें क्यों कम हो गईं। एक जवाब बार-बार आता है। रेडियो और टीवी कमेंट्री में भाई-भतीजावाद जम गया। जो मैदान जानते थे, उन्हें जगह नहीं मिली। जो अंदर के गलियारे जानते थे, वे माइक तक पहुंच गए। योग्यता पीछे रह गई। पहचान आगे आ गई। नए चेहरे आए। पर नई तैयारी नहीं आई। खेल का पाठ अधूरा रहा। भाषा का अभ्यास अधूरा रहा।
कमेंट्री कोई हल्की कला नहीं है। आंख से देखना होता है। दिमाग से जोड़ना होता है। फिर सरल वाक्य में कहना होता है। रवि चतुर्वेदी और अभय चतुर्वेदी, दोनों अध्यापक थे। इसलिए उनकी भाषा साफ थी। ओझा अधिकारी थे और खिलाड़ी भी थे। इसलिए उनका विवरण ठोस था। वे फुटबॉल के मैदान से आए थे। हॉकी के फैसले भी कर चुके थे। क्रिकेट को भी पढ़ा था। तीनों खेल एक आवाज में समा जाते थे। यह संयोग नहीं था। यह मेहनत थी। इन तमाम बातों के साथ एक मज़ेदार बात यह भी थी कि किसी न किसी स्तर पर इन आंखों देखा हाल सुनाने वालों ने इन खेलों को प्रैक्टिकली खेल भी था, जिसके कारण वे कमेंट्री की नोक, पलक को सटीक जानकारी और अंदाज़-ए-बयान के साथ पेश करते थे।
आज निजी चैनल ज्यादा हैं। घंटे ज्यादा हैं। मैच ज्यादा हैं। मात्रा बढ़ी, स्तर, जिसका नतीजा है कि संतोष कम है। एशियन गेम्स चल रहे हैं। कई खेल एक साथ दिख रहे हैं। दर्शक को गाइड चाहिए। नियम समझाने वाला चाहिए। इतिहास याद दिलाने वाला चाहिए। केवल शोर नहीं चाहिए। क्रिकेट सीरीज में भी यही जरूरत है। गेंद की लाइन बताना काफी नहीं। मैच का प्रवाह बताना जरूरी है।
पुरानी पीढ़ी पूर्ण नहीं थी। उन पर भी आलोचना हुई। जसदेव सिंह पर टीवी युग में सवाल उठे। यह स्वाभाविक है। समय बदलता है। शैली बदलती है। पर मूल बात नहीं बदलनी चाहिए। मूल बात खेल की समझ है। भाषा की साफगोई है। दर्शक के प्रति सम्मान है। ओझा की विशेषता यही सम्मान था। वे मैदान का सम्मान करते थे। खिलाड़ी का सम्मान करते थे। श्रोता का भी सम्मान करते थे। इसलिए उनकी कमेंट्री में दिखावा कम था। तथ्य ज्यादा थे। वे फाइनल मैचों में बैठे। विश्व कप देखे। ओलंपिक देखे। एशियाई खेल देखे। फिर भी आवाज में संयम रहा। यह संयम आज गायब है।
अगर भाई-भतीजावाद न होता तो शायद और ओझा सामने आते। मैदान के रेफरी आते। राज्य स्तर के खिलाड़ी आते। अध्यापक आते। अधिकारी आते। जिनकी जिंदगी खेल के पास रही हो। केवल कैमरे के पास नहीं रही हो। कमेंट्री तब फिर से सुनने लायक बनती। जरूरत नए चेहरों की नहीं है। जरूरत पुरानी कसौटी की है। कसौटी वही रहनी चाहिए। खेल जानो। भाषा संभालो। दर्शक को एंगेज रखो, साथ रखो। एशियन गेम्स इसी कसौटी पर चल रहे हैं। क्रिकेट सीरीज भी इसी कसौटी पर चल रही है। माइक खुला है। पर कान संतुष्ट नहीं हैं। यही अफसोस है। और यही याद भी है। एक समय था जब रवि चतुर्वेदी, अभय चतुर्वेदी और बी.पी. ओझा बोलते थे तो लोग रेडियो के पास बैठे रहते थे या ट्रांज़िस्टर ख़रीद कमेंट्री के चटखारे लेते। टीवी के पास बैठे रहते थे। वह समय लौट सकता है। अगर योग्यता को भाई – भतीजावाद से ऊपर रखा जाए।
जब खेल कमेंट्री होती थी सुनने लायक
Summary :
आजकल एशियन गेम्स चल रहे हैं। भारत और वेस्टइंडीज के बीच क्रिकेट सीरीज भी चल रही है। रेडियो पर कमेंट्री आती है। दूरदर्शन पर आती है। निजी टीवी चैनलों पर भी आती है। मैच देखते हुए आवाज साथ चलती है। पर सुनने का आनंद अब कम रह गया है। भाषा ढीली पड़ गई है। खेल का गहरा ज्ञान भी कम दिखता है। वाक्य अधूरे रहते हैं। आंकड़े गलत निकलते हैं। उत्साह नारेबाजी बन जाता है। समझ पीछे रह जाती है। हमारे बचपन में लाजवाब कमेंट्री सुनने को मिलती थी, जसदेव सिंह, सुशील दोषी, मुरली मनोहर मंजुल, मेलविल डिमेलो, रवि चतुर्वेदी,…


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