सर्वोच्च न्यायालय की न्यायाधीश न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने भारतीय संविधान में निहित संवैधानिक स्वतन्त्र संस्थाओं की लोकतन्त्र में महत्ती भूमिका को रेखांकित करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में जिस राजनीतिक अधिकार सम्पन्नता को प्राधिकृत किया गया है उसका संचालन स्थापित संवैधानिक संस्थाओं के ‘अराजनैतिक’ स्वरूप को बरकरार रखते हुए ही नागरिक अधिकारों की प्राप्ति के लिए किया जा सकता है। इस सन्दर्भ में उन्होंने चुनाव आयोग, लेखा महानियन्त्रक व वित्त आयोग जैसी संस्थाओं का नाम लिया और कहा कि इनका कार्य निष्पादन बिना किसी राजनीतिक प्रभाव के किया जाना बहुत जरूरी है जिससे भारत का लोकतन्त्र सही मायनों में जवाबदेह और जिम्मेदार हो सके। श्रीमती नागरत्ना पटना के राष्ट्रीय विधी विश्वविद्यालय में आयोजित राजेन्द्र प्रसाद व्याख्यानमाला का प्रथम भाषण दे रही थीं। उन्होंने चुनाव आयोग के हर हालत में निष्पक्ष व तटस्थ बने रहने को पूरे लोकतन्त्र के लिए बहुत जरूरी बताया और कहा कि आयोग को अपना कार्य राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाओं की परवाह किये बगैर पूरी पवित्रता और निष्ठा के साथ करना चाहिए।
उनका मत है कि उपरोक्त इन तीनों संस्थाओं को अपने दायित्वों का निर्वाह चुनावी नतीजों के राजनीतिक प्रभावों से मुक्त रहते हुए करना चाहिए। न्यायमूर्ति नागरत्ना के अनुसार इन तीनों संस्थाओं का असल कार्यक्षेत्र वहीं से शुरू होता है जहां से राजनीतिक कार्यक्षेत्र की तटस्थता पर सन्देह का प्रारम्भ होता है। जाहिर है कि चुनाव आयोग समेत वित्त आयोग व लेखा महानियन्त्रक के कार्यालय भारत में राजनीतिक प्रशासन तन्त्र के भीतर ही काम करते हैं परन्तु संविधान में इन तीनों संस्थाओं को ही स्वतन्त्र व स्वायत्तशासी का दर्जा दिया गया है जिससे ये अपना कार्य राजनीतिक दलों की बनने वाली किसी भी सरकार से निरपेक्ष रहते हुए बेखौफ होकर कर सकें। इनमें से चुनाव आयोग का सम्बन्ध सीधे आम नागरिकों के साथ रहता है क्योंकि प्रत्येक भारतीय नागरिक को मतदाता बनने का अधिकार यह आयोग ही देता है। एेसा करके वह अपने उस संवैधानिक दायित्व को निभाता है जिस पर देश का पूरा लोकतन्त्र टिका हुआ है क्योंकि भारत में विभिन्न सरकारों का गठन आम नागरिक ही अपने मताधिकार का प्रयोग करके करता है। यहां यह भी बताना बहुत आवश्यक है कि बाबा साहेब अम्बेडकर ने भारत को जो चौखम्भा राज दिया था उनमें न्यायपालिका, कार्यपालिका व विधायिका के अलावा चुनाव आयोग भी शामिल था। इनमें से न्यायपालिका व चुनाव आयोग सरकार के अंग नहीं बनाये गये थे जिससे भारत में सही अर्थों में लोगों की इच्छा के अनुसार सरकारों का गठन हो सके और ये सरकारें संविधान के अनुरूप ही काम कर सकें। यह देखने का कार्य मूल रूप से न्यायपालिका को दिया गया था। अतः न्यायमूर्ति नागरत्ना का यह कहना कि आधारभूत तरीके से स्वतन्त्र संवैधानिक संस्थाओं की तटस्थता संविधान में निहित है, पूरी तरह शाश्वत सत्य है परन्तु जहां तक विशिष्ट रूप से चुनाव आयोग का सम्बन्ध है तो वर्तमान में मुख्य चुनाव आयुक्त श्री ज्ञानेश कुमार के कार्यकलापों को लेकर देश की विपक्षी पार्टियों में भारी रोष है जिसकी वजह से उन्होंने संसद के दोनों सदनों में उन्हें पदमुक्त करने का प्रस्ताव भी दाखिल कर रखा है। हम सभी जानते हैं कि चुनाव आयोग ने जिस तरह से पूरे देश में मतदाता सूचियों की पुनरीक्षण कराने का फैसला किया, उसकी प्रक्रिया को लेकर विपक्षी दलों में भारी बेचैनी है जिसकी वजह से यह मामला सर्वोच्च न्यायालय तक में पहुंचा परन्तु न्यायमूर्ति नागरत्ना के विचार भारतीय लोकतन्त्र की उस मूलभूत व्यवस्था को लेकर है जिसकी स्थापना संविधान में लोकमूलक प्रशासन की गरज से की गई है। वित्त आयोग की भूमिका के बारे में उनका यह मत कि वित्तीय निर्भरता राजनीतिक निर्भरता को जन्म दे सकती है, अतः वित्त आयोग को अपना कार्य राज्यों की राजनीतिक संरचना से निरपेक्ष रहते हुए ही करना चाहिए, हर तरीके से तार्किक है क्योंकि वित्त या अर्थ और राजनीति व्यावहारिक दुनिया में एक-दूसरे से बंधे हुए ही होते हैं। इसकी वजह यह है कि भारत के संसदीय ढांचे में विभिन्न राज्यों के जो चुनाव होते हैं उनकी राजनीतिक वरीयताएं राष्ट्रीय चुनावों से पूरी तरह भिन्न होती हैं जिसकी वजह से हम अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग राजनीतिक दलों की सरकारें भी देखते हैं। आज भी भारत के दस राज्यों में गैर भाजपा दलों की सरकारें काबिज हैं जबकि केन्द्र में पिछले तीन चुनावों से भाजपा की सरकार चल रही है। अतः इस विविधीकृत राजनीतिक प्रशासनिक प्रणाली में राज्यों के समुचित विकास के लिए पर्याप्त धन स्रोतों की सुलभता से बंधा वित्त आयोग अपना दायित्व पूर्णतः निष्पक्ष व तटस्थ होकर तभी निभा पायेगा जब वह राजनीतिक आग्रहों से मुक्त रहेगा।
इसी प्रकार लेखा महानियन्त्रक का कार्यालय भी राजनीतिक प्रभाव क्षेत्र की सीमाओं से परे जाकर ही अपना कार्य पूर्ण पवित्रता व निष्ठा के साथ कर सकेगा। अतः न्यायमूर्ति नागरत्ना का यह कहना कि स्वतन्त्र संवैधानिक संस्थाओं की तटस्थता को नजरअन्दाज करके हम संवैधानिक वैधता को कायम नहीं रख सकते हैं। यदि हम एेसा करते हैं तो संवैधानिक ढांचे के सही सलामत रहने के बावजूद संवैधानिक व्यवस्था चरमरा सकती है जबकि हमारे संवैधानिक अधिकार भी बाकायदा बने रहते हैं। एेसा इन संस्थाओं के खोखलेपन की वजह से ही होता है। उनके अनुसार हमारे संविधान में जो संस्थागत ढांचा खड़ा किया गया है वह शक्तियों के सम्यक बंटवारे के आधार पर इस प्रकार है जिससे समस्त अधिकार एक ही स्थान पर केन्द्रीभूत होकर न रहें क्योंकि बिना सत्ता के विकेन्द्रीकरण के ताकत पर अंकुश नहीं लग सकता है और बिना अंकुश के कोई भी संविधान नागरिक स्वतन्त्रता व उसके अधिकारों का संरक्षण नहीं कर सकता। अतः लोकतन्त्र में संवैधानिक संस्थागत ढांचे का मजबूत होना बहुत जरूरी होता है।























