भारत में स्वास्थ्य क्षेत्र में चल रही खुली लूट की कहानियां एक के बाद एक सामने आ रही है। देश का सरकारी हैल्थ सैक्टर बीमार है और निजी अस्पताल मौत का कारोबार कर रहे हैं। अस्पतालों में इलाज मरीजों को दर्द दे रहा है। कार्पोरेट अस्पतालों में उपचार के नाम पर होने वाली अत्यधिक वसूली एक गम्भीर और व्यापक समस्या बन चुकी है। सुप्रीम कोर्ट ने निजी अस्पतालों में कैंसर की दवाओं के मूल्य से 10 गुणा अधिक दाम वसूले जाने पर चिन्ता जताते हुए इसे लूट करार दिया है और सभी दवाओं पर एक समान 16 फीसदी मार्जिन की हिमायत की है। शीर्ष अदालत ने केन्द्र सरकार से अस्पतालों द्वारा अपनी ही फार्मेसी से दवाइयां खरीदने को अनिवार्य बनाने के मुद्दे पर गौर करने का निर्देश देते हुए कहा कि इस व्यवस्था से आम आदमी को बहुत नुक्सान हो रहा है। 2700 रुपए में मिल रही कैंसर की दवा को 27000 में बेचा जा रहा है। 6-7 रुपए में मिलने वाली सिरिंज को 60 रुपए में, 29 रुपए में मिलने वाला कैथेटर 310 रुपए में, एक आईवीएन फ्यूजन सैट की कीमत केवल 11 रुपए है लेकिन मरीज को 325 रुपए में दिया गया। किसी अस्पताल में उपचाराधीन मरीज जब बीमारी से जंग लड़ रहा होता है तो वह उपचार में इस्तेमाल किए जाने वाले उपकरणों और दवाइयों के मूल्य की परवाह नहीं करता। दवा कम्पनियां अस्पतालों को लुभाने के लिए दवा की वास्तविक लागत और एमआरपी में बड़ा फर्क रखती हैं। जिसके चलते मरीजों से मनमानी कीमत वसूली जा रही है। िनजी अस्पताल किसी को भी नहीं बख्शते। अगर तीमारदार बिल नहीं चुकाते तो अस्पताल वाले शव भी नहीं ले जाने देते। मानवता नाम की कोई चीज नहीं बची। कई नामी-गिरामी अस्पतालों से ऐसी खबरें भी आ चुकी हैं कि मर चुके व्यक्ति को ही वेंटीलेटर लगाकर उसका इलाज दिखाया जा रहा था ताकि लाखों का बिल वसूला जा सके। प्राइवेट अस्पतालों में मेडिकल माफिया किस तरह से काम करता है यह बातें किसी से छिपी हुई नहीं हैं। यहां यह कहना गलत नहीं होगा कि लगभग पांच सितारा होटल्स जैसी सुविधाएं उपलब्ध करवाने वाले इन अस्पतालों का खर्च उठा पाना किसी साधारण व्यक्ति के वश की बात नहीं है। इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि ऐसे अस्पताल केवल उन मरीज़ों के लिए ही अपनी सेवाएं देते हैं जो इन अस्पतालों द्वारा मरीज़ की बीमारी से संबंधित भारी-भरकम बिल का बोझ उठा सके। ऐसे अस्पतालों में आमतौर पर कोई छोटा ऑप्रेशन अथवा मध्यम श्रेणी की बीमारी का इलाज भी लाखों रुपये में हो पाता है। इसमें कोई शक नहीं कि देश में लाखों संपन्न मरीज़ ऐसे हैं जो इन या इन जैसे दूसरे बड़े अस्पतालों से अपना इलाज करवा कर स्वास्थ्य लाभ ले रहे हैं लेकिन यदि पता चले कि पांच सितारा होटल जैसे अस्पताल में खुलेआम डकैती डाली जा रही है तो यह किसी कलंक से कम नहीं है।
भारत की बड़ी आबादी सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के कारण निजी स्वास्थ्य सेवाओं पर निर्भर है। देश में 60 प्रतिशत से अधिक स्वास्थ्य संबंधी खर्च बीमार को खुद वहन करना पड़ा है। कुल स्वास्थ्य खर्च में आउट आफ पाकेट खर्च भारत में गरीबी का एक बड़ा कारण है। कई सालों से सार्वजनिक स्वास्थ्य में भारत का बजट निवेश बहुत कम रहा है। देश में स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े सभी लेन-देन में से 80 प्रतिशत निजी क्षेत्र में होता है। सरकारी अस्पतालों में बिस्तरों की उपलब्धता के मामले में भारत दुनिया के 167 देशों में 155वें स्थान पर है। इसमें कोई संदेह नहीं कि देश में निजी नर्सिंग होम और निजी सुपर स्पैशलिटी अस्पतालों की बाढ़ आई हुई है। यह बताने की जरूरत नहीं है कि हजारों, करोड़ों रुपए की लागत से अस्पताल बनाने वाले कोई साधारण व्यक्ति तो नहीं होंगे।
बड़े कार्पोरेट घराने निजी मेडिकल क्षेत्र में छलांग लगा चुके हैं और मेडिकल क्षेत्र एक बड़ी इंडस्ट्री बन चुका है। जिसमें विशुद्ध मुनाफे का धंधा चल रहा है। मेडिकल माफिया की पहुंच बहुत ऊपर तक होती है। दवाओं की कीमतों के नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय स्तर पर नियामक संस्थाएं भी हैं। हर दवा आवश्यक वस्तु अधिनियम के दायरे में आती है। एनपीपीए और फार्मेसी विभाग भी है। चिकित्सा संस्था पंजीयन और पर्यावेक्षण अधिनियम भी है जो निजी स्वास्थ्य सेवाओं की नीतियों को नियंत्रित करने का ढांचा प्रदान करते हैं लेिकन इन्हें अब तक प्रभावी रूप से लागू नहीं किया गया। दवाओं की कीमतों का मामला तो महत्वपूर्ण है ही और उसके बाद डाक्टरों के नैतिक तौर-तरीकों का भी मामला है। आज अधिकतर दवाएं सीलिंग प्राइस के नियम के दायरे से बाहर हैं। गैर शड्यूल दवाओं की कीमत तय करने वाला कोई कानून नहीं है। कीमत तय करने के लिए एक पारदर्शी और नियमों पर आधारित सिस्टम होना चाहिए। सस्ती और अच्छे गुणवत्ता की दवाएं उपलब्ध होनी चाहिए। केन्द्र सरकार को और राज्य सरकारों को इस दिशा में उचित कार्रवाई करनी चाहिए और साथ ही यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि अस्पताल में मरीजों के उपचार में काम आने वाले समान की स्पष्ट बिलिंग हो। स्वास्थ्य सेवा एक मौलिक अधिकार है न कि एक विशेषाधिकार। हर भारतीय को सस्ती आैर नैतिक चिकित्सा सेवा प्राप्त होनी चाहिए। मानवीकृत नीतियों को लागू करके और रोगियों के अधिकारों की रक्षा करके ही देश एक न्यायपूर्ण, समान और सुलभ स्वास्थ्य सेवा प्रणाली की ओर बढ़ सकता है।
प्राइवेट अस्पतालों की खुली डकैती
Summary :
भारत में स्वास्थ्य क्षेत्र में चल रही खुली लूट की कहानियां एक के बाद एक सामने आ रही है। देश का सरकारी हैल्थ सैक्टर बीमार है और निजी अस्पताल मौत का कारोबार कर रहे हैं। अस्पतालों में इलाज मरीजों को दर्द दे रहा है। कार्पोरेट अस्पतालों में उपचार के नाम पर होने वाली अत्यधिक वसूली एक गम्भीर और व्यापक समस्या बन चुकी है। सुप्रीम कोर्ट ने निजी अस्पतालों में कैंसर की दवाओं के मूल्य से 10 गुणा अधिक दाम वसूले जाने पर चिन्ता जताते हुए इसे लूट करार दिया है और सभी दवाओं पर एक समान 16 फीसदी मार्जिन की हिमायत…


Download Android App
Download iOS App



