भारत में ट्रैफिक जाम, प्रदूषण और पार्किंग का संकट आज शहरी जीवन की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बन चुका है। इन सब समस्याओं का कारण यह है कि लोग सार्वजनिक परिवहन सेवा का कम इस्तेमाल करते हैं। हाल ही में दिनों दिन गंभीर होती इस समस्या के संबंध में नेशनल स्टेटिस्टिक्स ऑफिस की ओर से देश में पहली बार किए गए नेशनल हाउसहोल्ड ट्रैवल सर्वे के परिणाम चौंकाने वाले और चिंता में डालने वाले भी हैं। सर्वे के अनुसार हमारे देश में सिर्फ 15 प्रतिशत लोग ही काम पर आवागमन के लिए सार्वजनिक परिवहन सेवा का उपयोग करते हैं।
बाकी लगभग 50 प्रतिशत कार या दुपहिया वाहन का उपयोग करते हैं और शेष 35 फीसदी पैदल या साइकिल से चलते हैं। इस असंतुलन के कारण हमारे शहर ट्रैफिक जाम, प्रदूषण और पार्किंग के गंभीर संकट से जूझ रहे हैं। जमीनी सच्चाई किसी से छिपी नहीं है। आज देश में महानगरों से लेकर छोटे शहर ट्रैफिक और पार्किंग संकट की लाइलाज बीमारी से जूझ रहे हैं। हर साल वाहनों की तेज गति से बढ़ती रफ्तार हमारे शहरों को ट्रैफिक की समस्या से तो रूबरू करा ही रही है, बढ़ता प्रदूषण भी बड़ी समस्या के रूप में सामने आ रहा है।
इकोनॉमिक सर्वे 2025-26 के अनुसार, देश के सिर्फ चार प्रमुख महानगरों दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और कोलकाता में ट्रैफिक जाम की वजह से हर साल करीब 1.47 लाख करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान हो रहा है, जिसमें लोगों का कीमती समय, ईंधन की बर्बादी और उत्पादकता में गिरावट शामिल है। इकोनॉमिक सर्वे 2026 में कहा गया है कि परिवहन शहरों की रक्त धारा, रीढ़ और मांसपेशियां है, जो लोगों, वस्तुओं और विचारों के प्रवाह को आगे बढ़ाता है। अगर यह तंत्र कमजोर होता है तो ट्रैफिक जाम, प्रदूषण और उत्पादकता में गिरावट शहरों की नियति बन जाते हैं।
एक और अध्ययन बताता है कि देश के प्रमुख चार मेट्रो शहर जाम की वजह से सालाना अरबों डॉलर गंवा रहे हैं। अगर इस अनुमान को राष्ट्रीय स्तर पर लागू किया जाए तो आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि इससे देश की आर्थिक वृद्धि दर किस हद तक प्रभावित हो रही है। इस समस्या की जड़ में एक बड़ी वजह है- निजी गाड़ियों पर बढ़ती निर्भरता। भारत की तुलना में अधिक समृद्ध देश जैसे ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, हॉलैंड, स्पेन, इटली, जापान और सिंगापुर इस मामले में हमसे बहुत आगे हैं।
इन देशों में 90 फीसदी से अधिक लोग काम पर जाने के लिए सार्वजनिक परिवहन सेवाओं का इस्तेमाल करते हैं। दक्षिण कोरिया के सियोल में भी कभी ऐसी ही स्थिति थी, लेकिन उसने सड़कें बढ़ाने के बजाय बस-मेट्रो नेटवर्क मजबूत किया और 6-लेन एक्सप्रेस वे तक हटा दिया। लगभग 60 लाख की आबादी वाला सिंगापुर, भारतीय शहरों में बेहतर आवागमन का आकलन करने के लिए एक अच्छा पैमाना है। यह समृद्ध द्वीप-देश शहरीकरण की सफलता को यात्रा के समय में कमी (यानी क्या कोई यात्री अभी की तुलना में तेजी से एक जगह से दूसरी जगह पहुंच सकता है) के आधार पर मापता है।
टेक्नोलॉजी पर ध्यान देने वाले सिंगापुर का लक्ष्य है कि 2030 तक पीक-आवर (सबसे ज़्यादा भीड़भाड़ वाले समय) में 75 फीसदी यात्राएं पब्लिक ट्रांसपोर्ट से हों और 2040 तक यात्रा का अधिकतम समय 45 मिनट हो जाए, जो अभी 60 मिनट है। सिंगापुर सरकार की नीतियां निजी कार रखने को हतोत्साहित करती हैं, पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बढ़ावा देती हैं और पैदल चलने व साइकिल चलाने के लिए अच्छी सुविधाएं देकर उस तक पहुंच बेहतर बनाती हैं। बस और मेट्रो रेल का इस्तेमाल करने वालों को अलग-अलग तरह के ट्रांसपोर्ट को मिलाकर यात्रा करने पर कम किराया देना पड़ता है।
ऐसे में सहज ही यह सवाल पूछा जा सकता है कि जब दुनिया के तमाम देश मेट्रो बस अथवा अन्य साधनों का इस्तेमाल करते हैं तो हम क्यों नहीं? क्या हमारी सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था सुदृढ़ नहीं है अथवा हमें अपने वाहनों का इस्तेमाल करना अधिक सुविधाजनक लगता है। कारण एक नहीं दोनों हैं। दूसरे देशों की तुलना में 145 करोड़ जनसंख्या वाले हमारे देश में सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था उतनी मजबूत नहीं है। वहीं, जिस गति से देश में वाहनों की संख्या बढ़ रही है, वह भविष्य की तस्वीर को लेकर चिंता पैदा करने वाली है।
इससे निपटने के ठोस उपाय अभी तलाशने पड़ेंगे। आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय ने वर्ष 2022 में एक सर्वे के माध्यम से यह पता लगाया है कि लोग पब्लिक ट्रांसपोर्ट के इस्तेमाल से परहेज क्यों करते हैं। सर्वे में पता लगा कि पब्लिक ट्रांसपोर्ट की अविश्वसनीय सेवा, लंबे समय इंतजार, यात्रा में देरी, बसों और बस स्टॉप में भीड़ लोगों को पब्लिक ट्रांसपोर्ट से दूर रखती है। ये सर्वे 46 शहरों में रहने वाले 2 लाख से ज्यादा लोगों पर किया गया। इनमें से 64 फीसदी लोगों को पब्लिक ट्रांसपोर्ट सेवाओं पर भरोसा नहीं था। वहीं, 68 फीसदी लोगों ने कहा कि बसों और बस स्टॉप पर भीड़ भाड़ रहती है।
सबसे बेहतर विकल्प तो यही है कि शहरों में सार्वजनिक परिवहन के लिए बस सेवाओं और मेट्रो नेटवर्क को मजबूत बनाया जाए। दूसरा उपाय स्कूलों, दुकानों और सरकारी-निजी कार्यालयों के समय भी शिफ्टों में किए जा सकते हैं। इससे सुबह और शाम के समय लगने वाले जाम से मुक्ति मिल सकती है। इसके साथ-साथ प्रदूषण से भी मुक्ति मिल सकती है। वहीं निजी वाहनों के इस्तेमाल को हतोत्साहित करने के लिए पार्किंग शुल्क बढ़ाना और पैदल चलने तथा साइकिल चलाने के लिए बेहतर बुनियादी ढांचा तैयार करना होगा। वहीं इलेक्ट्रिक वाहनों और कार पूलिंग को बढ़ावा देकर प्रदूषण और सड़कों की भीड़ को कम किया जा सकता है।
दुनिया के दूसरे देशों की सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था का अध्ययन करके उससे भी कुछ सीख ली जाए तो देश एक बड़ी समस्या के निदान की तरफ सकारात्मक कदम उठा सकता है। यह बात भी अहम है कि सार्वजनिक परिवहन नेटवर्क को केवल बड़ा करना ही काफी नहीं है, बल्कि इसे आधुनिक और विश्वसनीय बनाना भी जरूरी है। इसके लिए नए रिहायशी और औद्योगिक क्षेत्रों को मुख्य नेटवर्क से जोड़ना होगा। मेट्रो या बस स्टैंड से घर तक पहुंचने के लिए ई-रिक्शा, पैदल पथ और साइकिल इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने की जरूरत है।
वहीं डिजिटल डिस्प्ले, लाइव ट्रैकिंग, वाई-फाई और महिलाओं की सुरक्षा के लिए सीसीटीवी व पैनिक बटन जैसी आधुनिक सुविधाएं बढ़ाने से सार्वजनिक परिवहन के प्रति विश्वास मजबूत होता है। यदि सरकारें और स्थानीय प्रशासन इस दिशा में सार्वजनिक निवेश को बढ़ावा देते हैं, तो यह न केवल हमारे शहरों को रहने लायक बनाएगा बल्कि 2047 तक भारत के विकसित राष्ट्र बनने के संकल्प को भी गति देगा।


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