भारतीय ओटीटी फिल्म ‘हीरामंडी’

इन दिनों भारतीय ओटीटी फिल्म ‘हीरामंडी’ को लेकर पाकिस्तान में तीखी प्रतिक्रियाएं हो रही हैं। वहां का फिल्म जगत और वहां का मीडिया ‘हीरामंडी’ की पहचान को विकृत करने का आरोप भारतीय फिल्मकारों पर लगा रहा है। पाक-मीडिया का कहना है कि यह लाहौर व ‘हीरामंडी’ की छवि को बदनाम करने की साजि़श है। चलिए, थोड़ा इसके विस्तार में चलें। कई बार कुछ शेअरों का पहला या दूसरा मिसरा इतना लोकप्रिय हो जाता है कि अपने साथ जुड़े मिसरे के वजूद का पता ही नहीं चलने देता। मसलन एक मिसरा बेहद प्रचलित है, ‘यह देखने की चीज़ है, इसे बार-बार देख’ इसी मिसरे का दूसरा हिस्सा एक स्थान से जुड़ा है, ‘टिब्बी में चलके जलवा-ए-परवरदिगार देख’ अब इसे पूरा पढ़ें तो मामला समझ में आता है-
‘टिब्बी में चलके जलवा-ए-परवरदिगार देख।
यह देखने की चीज़ है, इसे बार-बार देख।।’
इसी टिब्बी का दूसरा नाम है हीरामंडी। कुछ लोग इसे देह व्यापार से जोड़ते हैं मगर वे शायद इस जगह की तहज़ीब से कतई परिचित नहीं हैं। बहरहाल, यह भी एक हकीकत है कि ‘हीरामंडी’ का नाम ज़ुबान पर आते ही अक्सर कुछ लोगों के चेहरों पर शरारत खेलने लगती है। यहां आने वालों में बूढ़े भी शामिल रहते थे और जवान भी। विवाहित भी यहां आते थे और कुंवारे भी। यह कहना भी वाजिब न होगा कि हीरामंडी जहां एक ओर ठुमरी, ख्याल और गज़ल- गायकी और क्लासिक संगीत की मह​िफलों का केंद्र रहा है, वहां रावी रोड और टकसाली गेट के रास्ते भट्टी गेट व हीरामंडी की ओर लपकती पेशावरी घोड़ा-बग्घियों में सज-धज कर आने वाले महज़ ठुमरी व ख्याल की गायकी के लिए नहीं आते थे। कई लोग चौकचकियां, लोहारी मंडी आदि की तरफ से पैदल ही चले आते इस ‘सुकून-गाह’ की तरफ।
मगर यह भी एक हकीकत है कि पीढ़ी दर पीढ़ी संगीत को सम्भालने, संवारने व संजोने का काम हीरामंडी में ही हुआ। यहां बसने वालियों को फिल्मों व रेडियो में भी खूब तरजीह मिली। ‘मेरा सलाम ले जा’ जैसे लोकप्रिय गाने को आवाज़ देने वाले उमरा जि़या का पता यही होता था। वैसे मुगलिया सल्तनत के बाद सिख-साम्राज्य में भी इसका ‘सम्मानजनक’ रुतबा बरकरार रहा, मगर अंग्रेजों के शासन में थोड़ा ठहराव आया। फिर भी पायल और सुरों की खनक का सिलसिला टूटा नहीं। विभाजन से पहले हीरामंडी की ‘रौनकें’ अमृतसर के लालाओं की मिजाज़पुर्सी के लिए वहां भी जाती थी। तब की पंजाब असैम्बली के दूरदराज़ से आने वाले मैम्बरान भी, जब सेशन के दिनों में लाहौर आते तो हीरामंडी जाना, उनकी शामों में शुमार रहता।
हीरामंडी के साथ जुड़ी अनेक घटनाएं अब भी चर्चा का विषय बन जाती हैं। इन दिनों पाकिस्तान के एक प्रख्यात चित्रकार एवं पेंटर का नाम भी इन्हीं चर्चाओं में शामिल हो गया था। यह चित्रकार यहीं जन्मा था और अब भी वहीं रहता है। इनमें डबकलां के नवाब मुहम्मद नवाज खान का किस्सा भी शामिल है। नवाब लाहौर में खुले दिल वाली शख्सियत के रूप में जाना जाता था। उसके दोस्तों में सभी जातियों व धर्मों के लोग शामिल थे। हीरामंडी की गायिकाओं पर खूब दौलत लुटाना उसका शगल था। नवाब की शादी उस समय पंजाब के शिक्षा मंत्री मियां फजले-हुसैन की बेटी से हुई थी। मगर औरत और शराब के प्रति उसकी दीवानगी कायम रही। जब जेबें और खज़ाने खाली होने लगे तो नवाब की जायदादें भी धीरे-धीरे कुर्बान होने लगीं। उसी नवाब पर हीरामंडी की 15 वर्ष की शमशाद बाई के कत्ल का आरोप लगा। उसे सेशन अदालत ने मुजरिम करार दिया। अभी हाईकोर्ट में उसकी अपील पर सुनवाई जारी थी कि वह खुद भी चल बसा। वैसे हीरामंडी का शाब्दिक अर्थ है, ‘हीरों का बाज़ार। मगर कहा तो यह भी जाता है कि महाराजा रणजीत सिंह के एक सरदार हीरा सिंह के नाम पर इस क्षेत्र का नामकरण हुआ था। रूमानी शायरों ने इसका जि़क्र बाज़ारे-हुश्न’ के नाम से किया है। वैसे इस क्षेत्र में दर्जनभर बाज़ार हैं, लेकिन इन दिनों मुजरों व उनकी आड़ में चलते देह व्यापार की गतिविधियां छह बाज़ारों तक सीमित है। इस क्षेत्र को ‘शाही-मुहल्ला’ के नाम से भी जाना जाता है। इस सम्बन्ध में एक महिला रिसर्च स्कालर फौजि़या सईद ने एक पूरा शोध-प्रबंध भी लिखा है, जो इस क्षेत्र की पीड़ा को भी दर्शाता है। वह लिखती हैं, ‘इस मुल्क में महिला-उत्पीड़न का यह एक प्रामाणिक विवरण है। फौजिया सईद मिनिसोटा यूनिवर्सिटी से जुड़ी रही है और ‘उसने मेरे शहर व मेरे मुल्क में महिलाओं के शोषण’ को लेकर अनेक तथ्य उजागर किए हैं। जो कुछ यहां होता है, वही भारत के कोलकाता, दिल्ली व मुम्बई में ही होता है। वहां भी ‘रैड लाइट’ इलाके हैं और देह व्यापार का सिलसिला सैकड़ों बरसों तक जारी रहा। बहरहाल, अब यहां भी जागरूकता आई है। सरकारी दखल का सिलसिला चला है। देह-व्यापार के खिलाफ हर जगह संघर्ष हुए, कानून भी बने, पाबंदियां भी लगीं। ये सिलसिले िफरोजशाह तुगलक के वक्त में भी शुरू हुए थे। बाद में औरंगजेब ने भी इस दिशा में पहलकदमी की थी। उसके बाद आज़ाद पाकिस्तान में राष्ट्रपति जि़या-उल-हक ने भी कुछ सख्त कानून बनाए। मगर अभी भी बंद नहीं हो पाएगा। पाकिस्तान के मुस्लिम समाज में भी औरत ‘पीर’ को पेश किए जाने का रिवाज़ था। ऐसी औरत को ‘पीर की ऊंटनी’ कहा जाता था। एक शर्त यह थी कि वह कच्ची उम्र की हो, कुंवारी हो और पीर के साथ सोने के बाद वह किसी और से निकाह नहीं कर सकती थी। उसके लिए एक अलग कमरा दिया जाता था। सोने के लिए एक चटाई मिलती थी और पढ़ने के लिए कुरान की एक प्रति। मगर धीरे-धीरे वक्त बदल रहा है। अब यह सब नहीं चलता, मगर उत्पीड़न व शोषण अब रूप बदलकर जारी है। यह समस्या न तो मज़हब से जुड़ी है, न ही सियासत से और न ही इस्लामी शरीया से। यह विशुद्ध (खालिस) सामाजिक मसला है और ज्यों-ज्यों जागरूकता आएगी, बेहतर दिन करवट ले लेंगे। दरअसल कहानी काफी पुरानी है, मुग़लों के दौर में पाकिस्तान की ‘हीरामंडी’ का नाम ‘शाही मोहल्ला’ होता था। इसे ‘अदब का मोहल्ला’ भी कहा जाता था क्योंकि यहां मौजूद तवायफों के कोठे में शाही घरानों के शहजादों को अदब-अंदाज की शिक्षा जो दी जाती थी। हालांकि बाद में ये उनके मनोरंजन केंद्र बनते गए। फिर इस इलाके में आक्रमण हुआ अफगानिस्तान के अहमद शाह अब्दाली का और उसके बाद अफगान और उज्बेक देशों से लाई औरतों को यहां रख दिया गया। इसी के साथ यहां ‘जिस्मफरोशी’ का धंधा शुरू हो गया लेकिन काफी सालों के बाद जब महाराजा रणजीत सिंह ने ‘पंजाब स्टेट’ की नींव डाली तब इस क्षेत्र की किस्मत पलट गई।
हीरामंडी बन गई ‘अनाज मंडी’
महाराजा रणजीत सिंह के दरबार में उनके सबसे करीबी लोगों में एक थे राजा ध्यान सिंह डोगरा। उनके सबसे बड़े बेटे का नाम था हीरा सिंह डोगरा, जिन्हें सिख राज के दौर में लाहौर एरिया का प्राइम मिनिस्टर बनाया गया। वर्ष 1843 से 1844 के बीच ही उन्होंने ‘शाही मोहल्ला’ को ‘हीरामंडी’ का मौजूदा नाम दिया। उस दौर में इसे अनाज का थोक बाजार बना दिया गया। इस तरह देखते ही देखते ये पाक पंजाब की सबसे बड़ी अनाज मंडियों में से एक बन गई। दिन के उजाले में यहां व्यापारी बैठने लगे और अनाज का कारोबार करने लगे। पंजाब की जमीन हमेशा से खेती का गढ़ रही है।

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