
Parama Ekadashi Vrat Katha in Hindi: परमा एकादशी की कहानी

परमा एकादशी की पौराणिक कथा के अनुसार, काम्पिल्य नगरी में सुमेधा नाम का एक ब्राह्मण और उसकी पत्नी रहते थे। दोनों बहुत धार्मिक और अच्छे स्वभाव के थे, लेकिन पिछले जन्म के पापों के कारण बहुत गरीब थे। कभी-कभी भिक्षा न मिलने पर उन्हें भूखे पेट भी सोना पड़ता था।
एक दिन ब्राह्मण ने पत्नी से कहा, “बिना धन के घर चलाना मुश्किल है। लोग भी मदद नहीं करते। अगर तुम कहो, तो मैं कमाने के लिए परदेस चला जाऊं?” पत्नी ने कहा, “हे स्वामी! भगवान सबको अन्न देते हैं। मैं आपके बिना नहीं रह सकती और पति के बिना स्त्री का कहीं सम्मान नहीं होता। इसलिए आप यहीं रहें, जो भाग्य में होगा यहीं मिल जाएगा।”
पत्नी की बात मानकर ब्राह्मण वहीं रुक गया। कुछ समय बाद उनके घर कौण्डिन्य ऋषि आए। दोनों पति-पत्नी ने उनका आदर-सत्कार किया और उन्हें भोजन कराया। फिर ब्राह्मण की पत्नी ने ऋषि से कहा, “हे ऋषिवर! मैंने अपने पति को परदेस जाने से रोका है। कृपा करके हमें गरीबी दूर करने का कोई उपाय बताइए। मुझे विश्वास है कि आपके आने से हमारा दुख दूर हो जाएगा।”
कौण्डिन्य ऋषि ने कहा, “मलमास के कृष्ण पक्ष की ‘परमा एकादशी’ का व्रत करने से सभी पाप और गरीबी दूर हो जाती है। इस व्रत से इंसान धनवान बनता है। कुबेर देव ने भी यह व्रत किया था जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें धन का देवता बना दिया। राजा हरिश्चंद्र को भी इसी व्रत से अपना परिवार और राज्य वापस मिला था।”
ऋषि ने व्रत की विधि बताते हुए कहा, “परमा एकादशी से पांच दिनों का ‘पंचरात्रि व्रत’ शुरू करना चाहिए। इन पांच दिनों में निर्जला व्रत रखने, एक समय खाने, ब्राह्मणों को भोजन कराने, या तिल, घी और घोड़े का दान करने से बहुत पुण्य मिलता है और स्वर्ग की प्राप्ति होती है। इन दिनों ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। तुम दोनों भी यह व्रत करो, तुम्हें सफलता और स्वर्ग अवश्य मिलेगा।”
ऋषि के कहे अनुसार दोनों ने पांच दिनों तक यह व्रत किया। व्रत पूरा होते ही उनके घर एक राजकुमार आया। उसने ब्रह्माजी की प्रेरणा से दंपती को हर सुख-सुविधा से भरा एक घर और रहने के लिए एक पूरा गांव दे दिया। इस तरह उनकी गरीबी दूर हो गई और जीवन के बाद उन्हें विष्णु लोक में स्थान मिला।


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