Sharad Purnima Vrat Katha 2026: क्या वाकई शरद पूर्णिमा की रात चांद से बरसता है अमृत? जानें व्रत की पौराणिक कथा

Summary :

शरद पूर्णिमा, जिसे कोजागरी पूर्णिमा भी कहा जाता है, इस दिन चंद्रमा और देवी लक्ष्मी की पूजा का विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने और कथा सुनने से चंद्र देव का आशीर्वाद मिलता है। पौराणिक कथा के अनुसार, एक साहूकार की दो बेटियाँ थीं। बड़ी बहन पूरी श्रद्धा और विधि-विधान से पूर्णिमा का व्रत करती थी, जिससे उसे स्वस्थ संतानें प्राप्त हुईं। वहीं, छोटी बहन बिना मन और श्रद्धा के व्रत करती थी, जिसके कारण उसके बच्चे जन्म लेते ही मर जाते थे।

Sharad Purnima Vrat Katha 2026: आज शरद पूर्णिमा का पर्व है। शरद पूर्णिमा को कोजागरी पूर्णिमा, रास पूर्णिमा और कौमुदी पूर्णिमा भी कहा जाता है। इस दिन चांद की पूजा की जाती है और रात में खीर बनाकर चांद की रोशनी में रखने की पुरानी परंपरा है। इस दिन मां लक्ष्मी की पूजा का भी खास महत्व है। मान्यता है कि इस दिन सच्चे दिल से पूजा करने और व्रत रखने से चंद्र देव का आशीर्वाद मिलता है। साथ ही, इस त्योहार पर व्रत की कथा पढ़ना या सुनना भी बहुत शुभ माना जाता है। आइए, अब शरद पूर्णिमा से जुड़ी पौराणिक कथा के बारे में जानते हैं।

शरद पूर्णिमा व्रत कथा

Sharad Purnima Vrat Katha 2026
Sharad Purnima Vrat Katha 2026 (AI Generated)

पुरानी कथा के अनुसार, एक समय की बात है, एक गांव में एक साहूकार रहता था जिसकी दो बेटियां थीं। दोनों बहनें पूर्णिमा का व्रत रखती थीं, लेकिन व्रत को लेकर दोनों की सोच अलग-अलग थी। बड़ी बहन पूरी श्रद्धा के साथ शरद पूर्णिमा का व्रत करती थी और शाम को चंद्रमा को जल देने के बाद ही अपना व्रत पूरा करती थी। वहीं दूसरी तरफ, छोटी बहन बस नाम के लिए व्रत करती थी और बिना व्रत पूरा किए ही उसे बीच में ही तोड़ देती थी।

समय बीतने के साथ दोनों बहनें बड़ी हो गईं और साहूकार ने उनकी शादी कर दी। बड़ी बहन के स्वस्थ बच्चे हुए, लेकिन छोटी बहन की कोई संतान नहीं हुई। उसके जितने भी बच्चे हुए, वे जन्म लेते ही मर जाते थे। इससे छोटी बहन बहुत दुखी रहने लगी और अपने दुखों का हल खोजने एक संत के पास गई। संत ने उसके दुखों का कारण समझाते हुए बताया कि वह बिना किसी मन और भक्ति के पूर्णिमा का व्रत करती थी, इसीलिए उसके साथ ऐसा हो रहा है। संत ने उसे सलाह दी कि अगर वह पूरी श्रद्धा से इस व्रत को करेगी, तो चंद्र देव की कृपा से उसका बुरा समय खत्म हो जाएगा।

संत के कहने पर छोटी बहन ने आने वाली शरद पूर्णिमा का व्रत पूरी श्रद्धा और सही विधि से किया। इससे उसे एक संतान हुई, लेकिन बच्चे के जन्म के बाद ही उसकी मृत्यु हो गई। छोटी बहन जानती थी कि उसकी बड़ी बहन पर चंद्र देव की विशेष कृपा है और उसकी बहन उसके बच्चे को फिर से जीवित कर सकती है। इसलिए, उसने एक योजना बनाई और बच्चे के शव को एक कपड़े से ढककर एक छोटे से बिस्तर पर लिटा दिया।

इसके बाद उसने अपनी बड़ी बहन को घर बुलाया और उसी बिस्तर पर बैठने को कहा जहां बच्चे का शरीर रखा था। जैसे ही बड़ी बहन उस बिस्तर पर बैठने लगी, उसके कपड़े उस बच्चे को छू गए। छूते ही बच्चा जिंदा हो गया और रोने लगा। बड़ी बहन हैरान रह गई और उसने छोटी बहन को इस लापरवाही के लिए बहुत डांटा। तब छोटी बहन ने उसे बताया कि जन्म के बाद ही बच्चे की मृत्यु हो गई थी, लेकिन बड़ी बहन के छूने से वह फिर से जीवित हो गया। यह सब चंद्र देव की कृपा और पूर्णिमा के व्रत के असर से हुआ था। कहा जाता है कि तभी से शरद पूर्णिमा पर व्रत रखने की परंपरा शुरू हुई।

Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक ग्रंथियों, कहानियों या मान्यताओं पर आधारित है। पंजाब केसरी इसकी सत्यता की पुष्टि नहीं करता है।

Khushi Srivastava

खुशी श्रीवास्तव मीडिया इंडस्ट्री में करीब 3 साल का अनुभव रखती हैं। वायरल कंटेंट, लाइफस्टाइल, हेल्थ और वास्तु शास्त्र टिप्स पर प्रमुखता से काम किया है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज से मास्टर ऑफ मास कम्यूनिकेशन की पढ़ाई के बाद पहली बार पत्रकारिता के श्रेत्र में कदम रखा। इसके बाद अमर उजाला प्रिंट (प्रयागराज) में इंटर्नशिप की। फिलहाल खुशी, पंजाब केसरी दिल्ली के डिजिटल प्लैटफॉर्म के लिए कंटेंट राइटिंग का काम करती हैं।