एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में, सर्वोच्च न्यायालय ने शुक्रवार को ज्ञानवापी मस्जिद परिसर में कथित शिवलिंग का भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) से सर्वेक्षण कराने की मांग वाली याचिका पर मुस्लिम पक्ष को नोटिस जारी किया। यह याचिका हिंदू पक्ष की ओर से न्यायालय में दायर की गई थी। इस पर सुनवाई के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने मुस्लिम पक्ष को नोटिस जारी कर दो सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है।
2023 में, सुप्रीम कोर्ट ने ‘वुज़ूखाना’ क्षेत्र को छोड़कर, जहाँ ‘शिवलिंग’ पाए जाने का दावा किया गया था, गैर-आक्रामक प्रक्रिया के माध्यम से मस्जिद के एएसआई सर्वेक्षण की अनुमति दी। अप्रैल 2024 में, न्यायालय ने मस्जिद में नमाज़ अदा करने और तहखाना में हिंदू अनुष्ठानों पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था।
वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने पीठ को यह भी बताया कि उन्होंने सभी मुकदमों को एकीकृत करने और उन्हें वाराणसी जिला न्यायालय से इलाहाबाद उच्च न्यायालय में स्थानांतरित करने के लिए एक आवेदन दायर किया है। हालाँकि, वह आवेदन आज सूची में नहीं था।
मस्जिद समिति की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता हुजेफा अहमदी ने दलील दी कि मस्जिद समिति द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका, पर प्राथमिकता के आधार पर सुनवाई की जानी चाहिए। जिसमें उपासना स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 के तहत वर्जित मुकदमों की स्वीकार्यता पर सवाल उठाया गया है, पर
वह SLP (जिसे आज सूचीबद्ध नहीं किया गया) इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस निर्णय के विरुद्ध दायर की गई है, जिसमें सीपीसी के आदेश 7 नियम 11 के तहत मस्जिद समिति की याचिका को खारिज कर दिया गया था, जिसमें 1991 अधिनियम के तहत प्रतिबंध के कारण मुकदमों को खारिज करने की मांग की गई थी।
अहमदी ने यह भी बताया कि ASI सर्वेक्षण के लिए उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली मस्जिद समिति की SLP भी आज सूचीबद्ध नहीं है। उन्होंने सुझाव दिया कि सभी मामलों पर एक साथ निर्णय लिया जाना चाहिए, जिसमें प्राथमिकता इस मुद्दे को दी जानी चाहिए कि क्या मुकदमे पूजा स्थल अधिनियम के तहत प्रतिबंधित हैं। दीवान ने सुझाव पर सहमति जताते हुए कहा कि इस मुद्दे पर निर्णय लिया जाना चाहिए। पीठ ने सभी मामलों को 17 दिसंबर को एक साथ पोस्ट करने पर सहमति जताई। सुनवाई के बाद, न्यायमूर्ति कांत ने मौखिक रूप से दीवान से कहा कि वे इस पर विचार करें कि क्या मामलों को जिला न्यायालय के समक्ष ही समेकित किया जा सकता है, ताकि उच्च न्यायालय को अपीलीय मंच के रूप में रखा जा सके।
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