गुरुग्राम, 30 सितंबर (आईएएनएस)। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के गुरुग्राम जोनल ऑफिस ने वाटिका लिमिटेड (वाटिका ग्रुप) के चेयरमैन-सह-मैनेजिंग डायरेक्टर अनिल भल्ला और प्रमोटर गौतम भल्ला को गिरफ्तार कर लिया। यह गिरफ्तारी मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम (पीएमएलए) 2002 की धारा 19 के तहत की गई।
ईडी ने मेसर्स वाटिका लिमिटेड, उसके प्रमोटर-डायरेक्टर अनिल भल्ला, गौतम भल्ला, गौरव भल्ला और अन्य के खिलाफ पीएमएलए के तहत ईसीआईआर दर्ज की थी। यह ईसीआईआर दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) द्वारा विभिन्न धराओं के तहत दर्ज कई एफआईआर के आधार पर है, जिसमें धोखाधड़ी, रिहायशी प्लॉट न देने और अन्य संबंधित अपराधों का आरोप है।
ईडी की जांच में खुलासा हुआ कि 2010 से 2012 के बीच सात खरीदार कंपनियों ने गुरुग्राम के वाटिका इंडिया नेक्स्ट (सेक्टर 84/85) और वाटिका इंडिया नेक्स्ट-2 (सेक्टर 88ए) प्रोजेक्ट में रिहायशी प्लॉट के लिए पूरी बिक्री राशि के तौर पर करीब 260 करोड़ रुपये एडवांस में मेसर्स वाटिका लिमिटेड को दिए थे। इसके बाद 2014 और 2015 में प्लॉट-वाइज एग्रीमेंट भी किए गए।
हालांकि बाद में प्रोजेक्ट के लेआउट में बदलाव कर दिया गया। पहले से अलॉट किए गए प्लॉटों के नंबर बदल दिए गए और उन्हें दूसरी जगह शिफ्ट कर दिया गया। वहीं, प्रोजेक्ट की जमीन को लगातार दूसरे खरीदारों को अलॉट और बेचा जाता रहा।
वाटिका इंडिया नेक्स्ट-2 में लगभग 90 करोड़ रुपये में खरीदे गए करीब 1.10 लाख वर्ग गज में से एक भी प्लॉट 14 साल बाद भी डिलीवर नहीं किया गया है जबकि वाटिका इंडिया नेक्स्ट में भी सिर्फ आंशिक डिलीवरी ही हुई है। इस तरह आज भी लगभग 140.73 करोड़ रुपये मूल्य के प्लॉट अधूरे पड़े हैं।
जांच में सामने आया है कि अनिल भल्ला ने जांच के दायरे में आए लेन-देन के सभी अहम फैसलों की खुद निगरानी की है जबकि गौतम भल्ला ग्रुप के प्रमुख प्रमोटर हैं जिन्होंने अहम एग्रीमेंट साइन किए, जमीन वाली कंपनियों में डायरेक्टरशिप संभाली और उन पर नियंत्रण रखा। जांच में मिले सबूत बताते हैं कि बड़े फैसले इन दोनों ने मिलकर लिए थे।
यह भी पता चला कि प्रोजेक्ट की जमीन करीब 22 ग्रुप कंपनियों के जरिए रखी गई थी। इन कंपनियों में कोई कर्मचारी नहीं था और न ही उनका कोई अलग बिजनेस था। इनका इस्तेमाल मुख्य रूप से कॉर्पोरेट गारंटी देने और लैंड बैंक को मैनेज करने के लिए किया जाता था जिसमें जमीन को वित्तीय संस्थानों के पास गिरवी रखना भी शामिल है।
मेसर्स वाटिका लिमिटेड के बैंक खातों की जांच में पता चला कि खरीदारों से लिया गया पैसा सिर्फ उन्हीं प्रोजेक्ट में इस्तेमाल नहीं हुआ जिसके लिए वह लिया गया था। पैसा दूसरी ग्रुप कंपनियों और प्रमोटर से जुड़ी संस्थाओं में ट्रांसफर कर दिया गया जो इन प्रोजेक्ट का हिस्सा भी नहीं थीं।
एक अन्य मामले में 2024 में स्केलर वेंचर्स ने एक एग्रीमेंट टू सेल और बाय-बैक एग्रीमेंट के तहत 473.18 करोड़ रुपये का भुगतान किया। इसमें से केवल 165 में से 15 प्लॉट ही वापस खरीदे गए। इसके बाद बचे हुए 150 में से 14 प्लॉट को स्केलर की जानकारी या सहमति के बिना तीसरे पक्ष को करीब 13.62 करोड़ रुपये में बेच दिया गया। इस तरह इस केस में अब तक अपराध से हुई कमाई करीब 154.36 करोड़ रुपये आंकी गई है।
इससे पहले ईडी ने पीएमएलए की धारा 17 के तहत सात ठिकानों पर तलाशी ली थी। एक आरोपी के घर से मर्सिडीज-बेंज जीएलसी 300, 1.3 किलो से ज्यादा सोने और हीरे के गहने जिनकी कीमत करीब 1.55 करोड़ रुपये है और करीब 3.04 करोड़ रुपये के बैंक खाते और एफडीआर (फिक्स्ड डिपॉजिट रसीद) बरामद कर फ्रीज किए गए थे।
गिरफ्तारी के बाद दोनों आरोपियों को 29 सितंबर को गुरुग्राम की स्पेशल पीएमएलए कोर्ट में पेश किया गया, जहां से उन्हें 3 अक्टूबर तक ईडी की कस्टडी में भेज दिया गया है। मामले में आगे की जांच जारी है।
–आईएएनएस
वीकेयू/पीएम
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