पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (पीओके) में हाल के दिनों में बढ़ते तनाव और मानवाधिकारों से (PoK Human Rights Violations) जुड़े मुद्दों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ा दी है। क्षेत्र में संचार सेवाओं पर रोक, प्रदर्शनकारियों की गिरफ्तारियां और प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर कई देशों में सवाल उठाए जा रहे हैं। इसी बीच ब्रिटेन के 30 से अधिक सांसदों ने इस मामले को गंभीर बताते हुए ब्रिटिश सरकार से हस्तक्षेप करने की मांग की है। ब्रिटेन के सांसदों के इस कदम से पाकिस्तान सरकार नाराज दिखाई दे रही है। पाकिस्तान ने इन टिप्पणियों को अपने आंतरिक मामलों में दखल बताया है और ब्रिटेन से ऐसे बयानों को रोकने की मांग की है।
British MPs Letter to Pakistan: ब्रिटिश सांसदों ने विदेश मंत्री को लिखा पत्र
ब्रिटेन की लेबर पार्टी के सांसद इमरान हुसैन के नेतृत्व में सांसदों के एक समूह ने ब्रिटिश विदेश मंत्री को पत्र भेजकर पीओके (Pakistan Occupied Kashmir News) की स्थिति पर चिंता व्यक्त की है। सांसदों ने कहा कि उन्हें क्षेत्र से लगातार ऐसी खबरें मिल रही हैं जिनमें इंटरनेट और अन्य संचार सेवाओं के बाधित होने, लोगों की गिरफ्तारी और बढ़ते तनाव का उल्लेख किया गया है।
पत्र में कहा गया कि इन घटनाओं को लेकर ब्रिटेन में रहने वाले कश्मीरी समुदाय और मानवाधिकार संगठनों के बीच चिंता बढ़ रही है। सांसदों ने ब्रिटिश सरकार से आग्रह किया कि वह पाकिस्तान से स्थिति की पूरी जानकारी मांगे और तनाव कम करने के लिए जरूरी कदम उठाने का दबाव बनाए।
पाकिस्तान ने बताया आंतरिक मामला

ब्रिटिश सांसदों की प्रतिक्रिया के बाद पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने कड़ा बयान जारी किया। मंत्रालय ने कहा कि कुछ लोगों द्वारा अधूरी और भ्रामक जानकारी के आधार पर की गई टिप्पणियां चिंता का विषय हैं। पाकिस्तान ने स्पष्ट किया कि जम्मू-कश्मीर और पीओके से जुड़े मामलों को वह अपना आंतरिक विषय मानता है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि दूसरे देशों में रहने वाले पाकिस्तानी मूल के लोगों को उन देशों के विकास और स्थानीय मुद्दों पर अधिक ध्यान देना चाहिए, न कि पाकिस्तान के घरेलू मामलों में हस्तक्षेप करना चाहिए।
पीओके में मौजूदा तनाव का एक बड़ा कारण जम्मू-कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) (JAAC Protest PoK) और क्षेत्रीय प्रशासन के बीच चल रहा विवाद है। हाल ही में प्रशासन ने JAAC को आतंकवाद विरोधी कानूनों के तहत प्रतिबंधित संगठन घोषित कर दिया था। इस फैसले के बाद क्षेत्र में विरोध प्रदर्शन और तेज हो गए। संगठन के समर्थकों का कहना है कि उनकी मांगें लोकतांत्रिक और राजनीतिक अधिकारों से जुड़ी हैं। वहीं प्रशासन का दावा है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए यह कदम उठाया गया है।
ब्रिटिश सांसद इकबाल मोहम्मद ने भी जताई चिंता

ब्रिटेन के सांसद इकबाल मोहम्मद ने भी सोशल मीडिया के माध्यम से पीओके की स्थिति पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि उनके निर्वाचन क्षेत्र के कई लोगों ने शिकायत की है कि वे पीओके में रहने वाले अपने रिश्तेदारों और परिवार के सदस्यों से संपर्क नहीं कर पा रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि गिरफ्तारियों की खबरें चिंताजनक हैं और इनमें कुछ ब्रिटिश नागरिकों के शामिल होने की भी जानकारी मिली है। इसके अलावा संचार सेवाओं पर प्रतिबंध और दोनों पक्षों के बीच बातचीत का रुक जाना स्थिति को और गंभीर बना रहा है।
प्रतिबंध लगाए जाने के बावजूद JAAC ने अपना आंदोलन जारी रखने का फैसला किया है। संगठन ने पूरे क्षेत्र में हड़ताल का आह्वान भी किया है। JAAC की प्रमुख मांगों में क्षेत्रीय विधानसभा की उन 12 सीटों को समाप्त करना शामिल है जो 1947 के बाद जम्मू-कश्मीर से पाकिस्तान के मुख्य भाग में जाकर बसे लोगों के लिए आरक्षित हैं। संगठन का आरोप है कि इन सीटों का उपयोग अक्सर पीओके की राजनीति और सरकार गठन को प्रभावित करने के लिए किया जाता है।
संवाद और अधिकारों की बहाली की मांग
इकबाल मोहम्मद ने कहा कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संचार सेवाओं तक पहुंच किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के महत्वपूर्ण आधार हैं। उनका मानना है कि ऐसे अधिकारों की रक्षा से ही जनता का विश्वास कायम रहता है और तनावपूर्ण परिस्थितियों में स्थिरता बनी रहती है। उन्होंने पाकिस्तान के अधिकारियों से अपील की कि संचार सेवाओं को बहाल किया जाए, लगाए गए प्रतिबंध हटाए जाएं और प्रभावित लोगों के साथ सार्थक बातचीत शुरू की जाए ताकि समस्या का शांतिपूर्ण समाधान निकल सके।
पाकिस्तानी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, हालिया घटनाओं में कम से कम चार पुलिसकर्मियों की मौत हुई है जबकि करीब 20 अन्य घायल हुए हैं। इसके अलावा कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया है। इन घटनाओं के बाद पीओके की स्थिति पर अंतरराष्ट्रीय नजर बनी हुई है। मानवाधिकार संगठनों और विदेशी नेताओं की ओर से लगातार पारदर्शिता, संवाद और नागरिक अधिकारों के सम्मान की मांग की जा रही है।
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